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अफ्रीका से भारत में अधिमानव कैसे आए ? The Complete Story Of The Early Humans Of India (Documentary) 32:39

अफ्रीका से भारत में अधिमानव कैसे आए ? The Complete Story Of The Early Humans Of India (Documentary)

DOCUMENTARY INDUSTRIES · May 11, 2026
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Transcript ~5264 words · 32:39
0:00
50 मिलियन [संगीत] साल पहले भारत वैसा
0:02
नहीं था जैसा हम आज जानते हैं। यहां ना
0:05
कोई शहर था, ना खेती, ना सभ्यता। लेकिन
0:09
इसी जमीन पर कभी किसी ने पहला कदम [संगीत]
0:11
रखा था। वे ना हड़प्पा के लोग थे, ना
0:13
वैदिक रशी बल्कि उससे भी पहले हमारे
0:16
पूर्वज होमोसेपियंस। [संगीत] सवाल यह है
0:19
वे भारत में कब आए? कहां से आए? और क्या
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0:22
वे भारत के पहले इंसान थे? और सबसे बड़ा
0:24
सवाल क्या उन्हीं के वंशजों ने आगे चलकर
0:27
हड़प्पा [संगीत] जैसी रहस्यमई और उन्नत
0:29
सभ्यता को जन्म दिया? इन्हीं सवालों
0:32
[संगीत] के जवाब के लिए वीडियो को अंत तक
0:34
देखिएगा और अगर आप ऐसी रोचक और रिसर्च की
0:36
हुई डॉक्यूमेंट्री पसंद करते हैं तो चैनल
0:39
को सब्सक्राइब जरूर करिए क्योंकि ऐसी
0:41
डॉक्यूमेंट्री बनाने में हमें घंटों मेहनत
0:44
और रिसर्च करनी पड़ती है। एक ऐसी दुनिया
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0:46
की कल्पना कीजिए जहां इंसान तो क्या हमारे
0:50
पूर्वजों [संगीत] का भी कोई नामोनिशान
0:51
नहीं था। उस समय जिस जमीन पर आज हम और आप
0:55
खड़े हैं, वह एशिया का हिस्सा नहीं थी।
0:58
हमारा भारत एक टूटा हुआ, अकेला और वीरान
1:02
जमीन का टुकड़ा था। यह अपने परिवार
1:05
अफ्रीका से बिछड़ चुका था और हजारों
1:08
किलोमीटर दूर एक विशाल समंदर के बीचों-बीच
1:11
तैर रहा था। लाखों सालों तक भारत एक विशाल
1:15
जहाज की तरह पानी को चीरता हुआ उत्तर दिशा
1:18
की तरफ बढ़ता रहा। इसके सामने एक बहुत
1:20
बड़ा समंदर था। टेथिस सागर। लेकिन इस जमीन
1:24
[संगीत] के नीचे कुदरत की एक अदृश्य ताकत
1:27
काम कर रही थी। जमीन के अंदर मैग्मा उभर
1:30
रही थी जो भारत को [संगीत] इतनी तेज
1:32
रफ्तार दी कि यह रुका नहीं और फिर वह घड़ी
1:36
आई [संगीत] जिसने दुनिया का नक्शा हमेशा
1:38
के लिए बदल दिया। भारत इस समुद्र को पार
1:41
करते हुए सीधे यूरेशियन प्लेट तरफ परा और
1:45
फिर वह महा टकराव कोजन हुआ। यह टक्कर इतनी
1:49
भयानक थी कि इसने बीच के समंदर को ही निगल
1:52
लिया। दो विशाल जमीनी प्लेटें आपस में
1:55
भिड़ गई। दबाव इतना ज्यादा था कि धरती का
1:58
सीना फट गया। चट्टाने [संगीत] टूटने के
2:01
बजाय ऊपर की तरफ मुड़ने लगी। मलबा उठता
2:04
गया और उठता ही गया जब तक कि उसने बादलों
2:07
को नहीं छू लिया। यही था कुदरत की सबसे
2:10
बड़ी दीवार। हिमालय का जन्म। इस नई दीवार
2:14
ने सब कुछ बदल दिया। जो हवाएं पहले सीधी
2:17
निकल जाती थी। हिमालय ने उन्हें रोक लिया।
2:20
नतीजा भारत की प्यासी जमीन पर मानसून की
2:23
पहली बारिश हुई। हिमालय की बर्फ पिघली और
2:26
गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियां इस धरती
2:30
को सिंचने लगा। देखते ही देखते लाखों
2:33
सालों का यह उथल-पुथल शांत हुआ। जो जमीन
2:36
कल तक पथरीली और वीरान थी। वो अब घने
2:39
जंगलों, मीठे पानी और हरियाली से भर गई।
2:42
करोड़ों साल तक मौसम में उतार-चढ़ाव के
2:45
बाद भारत अब एक स्वर्ग बन चुका था। स्टेज
2:48
पूरी तरह सज चुका था। इंसानों की स्वागत
2:50
के लिए जंगल खामोश थे। नदियां बह रही थी,
2:54
हवाएं चल रही थी। लेकिन इस जन्नत में अभी
2:58
एक चीज की कमी थी। जीवन की अभी हम यानी
3:02
आधुनिक इंसान पैदा भी नहीं हुए थे। तो फिर
3:05
आखिर कौन थे वो अनजान मेहमान जो हमसे
3:08
लाखों साल पहले [संगीत] इस भारत के पहले
3:10
मालिक बने। चलिए उस गहरे राज से पर्दा
3:14
उठाते हैं। भारत अब बदल चुका था। जिस जमीन
3:18
पर कल तक समंदर की लहरें [संगीत] टकराती
3:20
थी, वहां अब मीठे पानी की नदियां बह रही
3:23
थी। जिस जमीन पर सिर्फ पत्थर थे, [संगीत]
3:26
वहां अब ऐसा घना जंगल उग आया था जिसे भेद
3:29
पाना सूरज की किरणों के लिए [संगीत] भी
3:31
नामुमकिन था। यह वो भारत नहीं है जिसे आज
3:34
आप जानते हैं। ना यहां कोई शहर था, ना
3:36
[संगीत] गांव और ना ही आज जैसा कोई इंसान।
3:39
यह एक अलग ही दुनिया थी। इस दुनिया में
3:42
कानून सिर्फ एक था। जिसकी [संगीत] लाठी,
3:44
उसकी भैंस नहीं बल्कि जिसका जबड़ा उसका
3:47
राज। उस समय भारत की धरती पर इंसानों का
3:50
नहीं बल्कि दानवों जॉइंट्स [संगीत] का
3:53
राज्य था। अगर आप उस समय के जंगल में चलते
3:55
तो आपका सामना आज के हाथियों से नहीं
3:58
बल्कि उनके परदादाओं से होता। स्टिगोडन एक
4:01
ऐसा विशालकाय जीव जिसके दांत 10 फीट तक
4:04
लंबे होते थे। जब यह चलता था [संगीत] तो
4:07
जमीन कांपती थी। नदियों में आज के मगरमच्छ
4:10
नहीं बल्कि हेक्सा प्रोटोोडन तैरते थे। यह
4:13
दरियाई घोड़े जैसा जानवर था। लेकिन इसका
4:15
आकार किसी ट्रक से कम नहीं था। इसके जबड़े
4:18
इतने मजबूत [संगीत]
4:19
थे कि यह पत्थर को भी चबा सकता था। यह
4:22
दुनिया ताकतवर जानवरों की थी। कमजोर के
4:24
लिए यहां कोई जगह नहीं थी। हर झाड़ी के
4:27
पीछे मौत छिपी थी। लेकिन इन्हीं विशाल
4:30
जानवरों के भारी पैरों के बीच घास के अंदर
4:33
एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। लाखों साल
4:36
पहले अफ्रीका की जमीन पर एक नई मानव
4:39
प्रजाति उभरी। इस प्रजाति का नाम था होमो
4:42
इरेक्टस। यही वह इंसान था जिसने पहली बार
4:46
पूरी तरह दो पैरों पर चलना शुरू किया। यह
4:48
ना तो वानर थे और ना ही हम यानी
4:51
होमोसेपियंस। यह घुमंतु थे। भोजन की तलाश
4:55
में चलते-चलते यह अफ्रीका से बाहर निकले।
4:58
रास्ते [संगीत] अनजान थे। ना कोई नक्शा था
5:00
ना कोई मंजिल। बस पेट की आग थी जो उन्हें
5:04
आगे धकेल रही थी और आज से करीब [संगीत] 15
5:06
से 20 लाख साल पहले इन्हीं निडर यात्रियों
5:09
के एक समूह ने भारत की धरती पर अपना पहला
5:12
कदम रखा। यह सिर्फ एक कल्पना कहानी
5:15
[संगीत] नहीं बल्कि इसका सबूत हमें अपने
5:17
देश भारत में मिलता है। चेन्नई के पास एक
5:20
जगह है अतिरम पक्कम। यहां जमीन के [संगीत]
5:23
नीचे वैज्ञानिकों को पत्थरों का एक खजाना
5:26
मिला। यह साधारण पत्थर नहीं थे। इन्हें
5:29
तराशा गया था। इनके किनारे धारदार थे।
5:32
वैज्ञानिकों ने जब [संगीत] इनकी उम्र पता
5:34
की तो वे सन्न रह गए। यह औजार 15 लाख साल
5:37
[संगीत] पुराने थे। यानी आधुनिक इंसान के
5:40
पैदा होने से बहुत पहले। यहां कोई [संगीत]
5:43
ऐसा था जो दिमाग का इस्तेमाल करना जानता
5:46
था। और सबूत सिर्फ पत्थरों तक सीमित नहीं
5:48
है। 1982 मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के
5:52
हथनोरा [संगीत] गांव में एक
5:54
आर्कियोलॉजिस्ट अरुण सोनाकिया को एक
5:57
खोपड़ी [संगीत] का हिस्सा मिला। यह भारत
5:59
के इतिहास की सबसे बड़ी खोज थी। यह खोपड़ी
6:02
[संगीत] किसी जानवर की नहीं थी। यह एक
6:04
मानव पूर्वज की थी। इसे नाम दिया गया।
6:07
नर्मदा मानव यह लोग कैसे दिखते थे? इनका
6:10
माथा हमसे छोटा था। यानी दिमाग थोड़ा कम
6:13
विकसित था। लेकिन इनका जबड़ा बहुत मजबूत
6:16
था। इनकी आइब्रास बाहर की तरफ निकली हुई
6:19
थी। इनका शरीर किसी एथलीट जैसा गठीला था।
6:23
इनके पास हमारी तरह भाषा नहीं थी। इनकी
6:26
भाषा थी इशारे और आवाजें। इनका सबसे बड़ा
6:29
हथियार था। [संगीत] हैंड एक्स एक नाशपाती
6:32
के आकार का पत्थर जिसे यह अपनी मुट्ठी में
6:35
पकड़ते थे। यही इनका चाकू था। यही इनका
6:38
हथौड़ा था। बिना बंदूक, बिना लोहे के
6:41
हथियार के। सिर्फ पत्थरों के दम पर यह लोग
6:44
विशाल हाथियों और दरियाई घोड़ों का शिकार
6:46
करते थे। यह डरते नहीं थे। इन्होंने भारत
6:49
के हर कोने को छान मारा था। उत्तर से
6:52
दक्षिण तक। नर्मदा के [संगीत] तट से लेकर
6:55
गोदावरी के जंगलों तक इन्हीं का राज था।
6:58
लाखों सालों [संगीत] तक। भारत के जंगलों
7:01
में इन्हीं की हुंकार गूंजती रही। इन्हें
7:03
लगा कि यह इस धरती के मालिक हैं। इन्होंने
7:06
बाढ़ को हराया था, सूखे को हराया था और
7:09
बड़े-बड़े जानवरों [संगीत] को हराया था।
7:11
ऐसा लग रहा था कि इनका वंश अमर रहेगा।
7:15
लेकिन उन्हें खबर नहीं थी। कुदरत अपनी
7:18
आस्तीन में एक खंजर छिपाए बैठी थी। हजारों
7:21
मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के एक
7:25
द्वीप पर धरती के नीचे एक दानव जाग रहा
7:29
था। यह एक ऐसा टाइम बम था जिसकी टिकटिक
7:32
शुरू हो चुकी थी और जब यह फटने वाला था तो
7:35
यह इन ताकतवर [संगीत] आदिमानवों की पूरी
7:37
दुनिया को सिर्फ राख के ढेर में बदलने
7:40
वाला था। वो क्या चीज थी जिसने भारत के
7:43
पहले मालिकों को इतिहास के पन्नों से मिटा
7:46
दिया और कैसे उस विनाश ने हमारे यानी
7:50
[संगीत] आधुनिक इंसान के लिए रास्ता खोला
7:53
जो आज खुद को हम भारतीय कहते हैं। हजारों
7:55
मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के
7:59
सुमात्रा द्वीप पर धरती का सीना फटने वाला
8:02
था। एक पहाड़ नहीं बल्कि एक राक्षस जाग
8:06
चुका था। टोबा सुपर वोल्केनो की धमाका
8:09
इतना जोरदार था कि इसकी आवाज 3000
8:12
किलोमीटर दूर भारत तक सुनाई दी होगी।
8:15
हिमालय की चोटियां भी कांप उठी होंगी।
8:17
लेकिन असली खतरा वो आवाज नहीं थी। असली
8:20
खतरा वो था जो हवा के साथ उड़कर आ रहा था।
8:24
कुछ ही घंटों में भारत का नीला आसमान गायब
8:27
हो गया। दोपहर के वक्त रात जैसा गुप
8:31
अंधेरा छा गया और फिर आसमान [संगीत] से
8:33
गिरने लगी। सफेद मौत यह बर्फ नहीं थी। यह
8:37
राख वोल्केनिक ऐश थी। कल्पना कीजिए।
8:40
[संगीत] जब उन आदिमानवों ने सांस ली होगी
8:42
तो उनका दम घुटने लगा होगा। नदियां जो कल
8:45
तक जीवन देती थी। अब कीचड़ और जहर बन चुकी
8:48
थी। पेड़-पौधे मर गए। जंगल वीरान हो गए।
8:52
भारत जो एक गर्म देश था। अचानक बर्फ जैसा
8:55
ठंडा पड़ गया। इसे विज्ञान कहता है
8:58
वोल्केनिक विंटर। अब यहां एक बहुत बड़ा
9:00
सवाल उठता है। वो आदिमानव जो लाखों सालों
9:04
से यहां के बेताज बादशाह थे। वो इस मुसीबत
9:07
से क्यों हार गए? वे तो बहुत ताकतवर थे।
9:10
फिर उनका वंश क्यों मिट गया? उनकी मौत का
9:13
कारण कोई और नहीं बल्कि उनका अपना शरीर और
9:17
दिमाग बन गया। देखिए उनके हारने की तीन
9:20
बड़ी वजह थी। पहली वजह उनके शरीर की बनावट
9:24
उनका शरीर पहलवानों जैसा भारी और गठीला
9:27
था। यह शरीर एक बड़ी गाड़ी की तरह था जिसे
9:31
चलने के लिए बहुत ज्यादा पेट्रोल यानी
9:33
एनर्जी चाहिए थी। जब तक जंगल हरेभरे थे सब
9:38
ठीक था। लेकिन जब खाना खत्म हुआ तो उनका
9:41
बड़ा शरीर ही उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन
9:43
गया। वे कम खाने में जिंदा नहीं रह सकते
9:47
थे। उनकी ताकत ही उनकी कमजोरी बन गई।
9:50
दूसरी वजह थी उनके पुराने हथियार। कड़ी
9:53
सर्दी और बदलाव के बाद जंगलों [संगीत] से
9:56
बड़े जानवर खत्म हो गए। लेकिन उनके हाथों
9:59
में अब भी भारी पत्थर के हथियार ही थे
10:01
[संगीत] जो सिर्फ बड़े जानवरों के लिए बने
10:04
थे। छोटे जानवरों के सामने यह हथियार
10:07
बेकार हो गए। और तीसरी सबसे बड़ी वजह कल
10:11
की चिंता ना करना दिक्कत यह थी कि वे
10:13
सिर्फ आज में जीते थे। उनके पास हम जैसा
10:17
दिमाग नहीं था जो मुसीबत आने से पहले
10:19
प्लानिंग कर सके। उन्हें [संगीत] खाना जमा
10:22
करना नहीं आता था। उन्हें यह समझ नहीं आया
10:24
कि कल क्या होगा और देखते ही देखते एक
10:28
पूरी प्रजाति जो कल तक भारत की मालिक थी
10:31
वो भूख ठंड और अंधेरे में घुटघुट कर खत्म
10:35
हो गई। यह विनाश अंत नहीं था। [संगीत] यह
10:37
एक नई शुरुआत की तैयारी थी। राख से ढकी इस
10:40
भारत की धरती पर अब एक नई प्रजाति कदम
10:43
रखने वाली थी। एक ऐसी प्रजाति जिससे आज हम
10:46
सब जुड़े हैं होमोसेपियंस।
10:51
टोबा का महाविस्फोट सिर्फ भारत को ही नहीं
10:54
झुलसा गया था। सैकड़ों साल बाद भी उसकी
10:57
[संगीत] राख और सर्दी की मार अफ्रीका तक
11:00
पहुंची ही चुकी। जिस धरती ने लाखों सालों
11:03
से इंसान को पाला [संगीत] था, वही धरती अब
11:06
उसे बोझ लगने लगी थी। जंगल सूख रहे थे और
11:10
इसी धरती पर एक प्रजाति [संगीत] अब सांस
11:12
लेने के लिए भी संघर्ष कर रही थी।
11:14
होमोसेपियंस।
11:15
जरा उस समय के इंसान के बारे में सोचिए।
11:18
वह कोई योद्धा या विजेता नहीं था। वह बस
11:21
एक पिता था जो सुबह शिकार पर निकलता और
11:24
शाम को खाली हाथ झुकी हुई नजरों के साथ
11:27
लौटता था। वह एक मां थी जो अपने बच्चे की
11:31
प्यास बुझाने के लिए बूंदबूंद पानी के लिए
11:33
[संगीत] तरस रही थी।
11:38
अफ्रीका उनका अपना घर अब उन्हें पाल नहीं
11:41
सकता था। उनके पास दो ही रास्ते थे। या तो
11:45
यहीं [संगीत] रुक कर धीरे-धीरे इतिहास से
11:47
मिट जाएं या फिर उस अनजान क्षितिज की ओर
11:49
बढ़े जहां शायद मौत हो। लेकिन शायद
11:52
[संगीत] जिंदगी की एक उम्मीद भी और फिर
11:55
भूख ने उन्हें वह फैसला लेने पर मजबूर
11:57
[संगीत] कर दिया जो शायद इंसानियत के
12:00
इतिहास का सबसे बढ़ा फैसला था। एक पूरा
12:03
जनसमूह बच्चे, बूढ़े, जवान अपना सब कुछ
12:07
समेट कर चल पड़े। चलते-चलते वे जमीन के
12:10
आखिरी छोर पर आ गए। सामने लाल सागर था
12:13
जहां पानी ही पानी और आगे कुछ भी नजर नहीं
12:16
आ रहा था। विज्ञान कहता [संगीत] है कि उस
12:18
समय हिमयुग आइस एज के कारण समंदर का स्तर
12:22
नीचे था। अफ्रीका और अरब के बीच की दूरी
12:25
आज के मुकाबले [संगीत] बहुत कम थी। लेकिन
12:28
उन लोगों के पास ना कोई नक्शा था, ना कोई
12:30
बड़ी नाव। उनके लिए वह छोटी सी दूरी भी
12:33
मौत के कुएं जैसी थी। इसे आज हम बाब अल
12:36
मंदब कहते हैं।
12:42
कल्पना कीजिए उस डर की जब उन्होंने सूखी
12:45
लकड़ियों और बांस से बने डगमगाते राफ्टर्स
12:47
पर पहली बार अपने बच्चों को बैठाया होगा।
12:50
ना जाने कितने पिता ना जाने कितनी माताएं
12:53
उस सफर में लहरों में समा गई। ना जाने
12:56
कितनों का हाथ अपनों से छूट गया जो बच गए।
12:59
वे लहरों से लड़कर अरब के तट आज का यमन पर
13:02
पहुंच गए। वे जिंदा तो थे लेकिन वे अब
13:04
बेघर थे। उनका घर अफ्रीका हमेशा के लिए
13:07
पीछे छूट चुका था।
13:11
पर उनका इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ था।
13:14
अरब की जमीन भी सूखी और पथरीली थी।
13:17
रेगिस्तान उन्हें निगलने के लिए तैयार
13:19
खड़ा था। इसलिए उन्होंने एक समझदारी
13:22
दिखाई। वे जमीन के अंदर नहीं गए। वे समंदर
13:25
के किनारे-किनारे चलते रहे। इसे हम तटीय
13:28
प्रवास कोस्टल माइग्रेशन कहते हैं। समंदर
13:32
जिसने उनके अपनों को छीना था। अब वही उनका
13:36
सहारा बन गया। उसने उन्हें खाना दिया।
13:39
मछलियां, केकड़े, सीपियां वे चलते रहे।
13:42
[संगीत] एक साल नहीं, 100 साल नहीं बल्कि
13:44
हजारों सालों तक यह सफर एक पीढ़ी की नहीं
13:47
कई पीढ़ियों तक पूर्व दिशा की ओर चलते
13:50
रहे। बस एक ही उम्मीद में कि कहीं तो ऐसी
13:53
जमीन होगी जो घर जैसी लगे। और फिर आज से
13:57
लगभग 65,000 [संगीत] साल पहले, उन
13:59
यात्रियों के वंशजों को हवा में एक बदलाव
14:02
महसूस हुआ। यह धूल की आंधी [संगीत] नहीं
14:04
थी। यह ठंडी हवा थी। वे भारत की दहलीज पर
14:08
खड़े थे। टोबा की [संगीत] राख जिसने
14:10
हजारों साल पहले यहां जीवन खत्म कर दिया
14:12
था। अब वही राख उपजाऊ मिट्टी बन चुकी थी।
14:16
कुदरत ने अपने घाव भर लिए थे। सूखे पेड़ों
14:19
की जगह हरेभरे जंगलों ने ले ली थी। नदियां
14:23
मीठे पानी से लबालब बह रही थी। जब उन थके
14:26
हुए यात्रियों ने सिंधु और सरस्वती की
14:28
[संगीत] उस हरीभरी धरती पर पहला कदम रखा
14:31
होगा।
14:36
कहानी का सुखद अंत अभी नहीं हुआ था।
14:39
उन्हें लगा कि उन्हें स्वर्ग मिल गया है।
14:42
लेकिन उन्हें खबर नहीं थी कि यह स्वर्ग भी
14:45
उनकी एक कड़ी [संगीत] परीक्षा लेने वाला
14:47
था। अफ्रीका के खुले मैदानों में वे दूर
14:50
तक [संगीत] देख सकते थे। खतरे को भांप
14:52
सकते थे। लेकिन भारत भारत के जंगल [संगीत]
14:56
घने थे। मिस्टीरियस थे। यहां हर झाड़ी के
14:59
पीछे मौत छिपी थी। यहां के विशालकाय हाथी
15:02
और दुनिया के सबसे खूंखार बाघ [संगीत] उन
15:05
अजनबियों को घूर रहे थे। रात होते ही यह
15:08
जंगल एक भूल भुलैया बन जाता था। खुले
15:11
आसमान [संगीत] के नीचे सोना नामुमकिन था
15:13
तो सवाल यह है उस पहली रात उस अनजान जंगल
15:17
[संगीत] में हमारे पूर्वज जिंदा कैसे रहे?
15:19
और भारत की जमीन पर इंसान [संगीत] ने अपनी
15:22
पहली सुरक्षा कैसे बनाई? अफ्रीका से मीलों
15:24
पैदल चलकर आए उन थके हुए यात्रियों के
15:27
लिए। भारत का घना जंगल किसी मौत के कुएं
15:30
से कम [संगीत] नहीं था। यहां खुले आसमान
15:32
के नीचे सोने का मतलब था सीधे मौत [संगीत]
15:35
को दावत देना। उन्हें एक ऐसी जगह चाहिए थी
15:38
जहां दीवारें हो लेकिन दरवाजा ना हो और
15:41
मध्य भारत के [संगीत] जंगलों में कुदरत ने
15:44
उन्हें अपना सबसे नायाब तोहफा दिया।
15:47
भीमबेट [संगीत] का यह साधारण गुफाएं नहीं
15:49
थी। यह पत्थर के प्राकृतिक महल थे। इन
15:52
विशाल चट्टानों ने उन्हें मूसलाधार बारिश
15:54
से बचाया। कड़ाके की ठंड से [संगीत] बचाया
15:57
और सबसे जरूरी रात के अंधेरे में उन
16:01
खूंखार जानवरों से बचाया।
16:04
इतिहास में पहली बार इंसान को घर शब्द का
16:08
असली मतलब समझ आया था। यह गुफा सिर्फ
16:11
पत्थरों का ढेर नहीं थी। यह इंसानियत का
16:14
पहला [संगीत] किला थी। जरा कल्पना कीजिए।
16:18
आज से 60 हजार [संगीत] साल पहले की एक
16:20
सुबह की तब कोई अलार्म क्लॉक नहीं थी।
16:23
चिड़ियों की चहचहाट और सूरज की पहली किरण
16:26
ही उनकी घड़ी थी। जैसे ही आंख खुलती थी तो
16:30
सबसे पहला विचार क्या आता होगा? शायद यही
16:33
क्या हम सब जिंदा हैं? दिन की शुरुआत चाय
16:36
या कॉफी से नहीं होती थी। सबसे पहली जरूरत
16:40
थी पानी। लेकिन उस दौर में नदी तक जाना भी
16:43
एक फौजी मिशन जैसा था। कबीले के मर्द पहले
16:46
बाहर निकलकर मुआयना करते थे कि कहीं
16:49
झाड़ियों में कोई तेंदुआ तो घात लगाकर
16:51
नहीं बैठा। जब रास्ता साफ होता तभी
16:54
महिलाएं और बच्चे पानी के लिए नीचे उतरते
16:57
थे। हर सुबह जिंदगी और मौत के बीच का एक
17:01
जुआ थी। लेकिन रात के अंधेरे में उनका
17:04
सबसे बड़ा रक्षक कोई इंसान नहीं था। वो थी
17:07
आग। आग सिर्फ [संगीत] खाना पकाने के लिए
17:10
नहीं थी। यह उनकी सिक्योरिटी गार्ड थी। जब
17:13
तक गुफा के द्वार पर आग जलती रहती थी।
17:15
जंगल का कोई भी जानवर अंदर आने की हिम्मत
17:18
नहीं करता था। और यही आग उनका सोशल
17:20
[संगीत] मीडिया भी थी। शाम को शिकार के
17:23
बाद पूरा कबीला इसी आग के चारों तरफ बैठता
17:26
था। यही कहानियां सुनाई जाती थी। यहीं दुख
17:29
सुख [संगीत] बांटे जाते थे। इस आग की
17:31
गर्मी ने इंसान को एक दूसरे से जोड़ दिया
17:34
था। लेकिन भारत बहुत विशाल था। जैसे-जैसे
17:37
इंसान फैला उसे अलग-अलग चुनौतियों का
17:40
सामना करना पड़ा। विंध्य और हिमालय के पास
17:42
रहने वालों को ठंड का सामना करना पड़ा।
17:45
इसलिए वे गहरी गुफाओं [संगीत] में रहते थे
17:47
और आग पर ज्यादा निर्भर थे। वहीं जो लोग
17:50
साउथ [संगीत] इंडिया में कर्नाटक आंध्र की
17:52
तरफ गए वहां मौसम गर्म था। वहां उन्हें
17:56
गहरी [संगीत] गुफाओं की जरूरत नहीं थी। वे
17:58
ग्रेनाइट की पहाड़ियों के नीचे या कभी-कभी
18:01
खुले में झोपड़ियां बनाकर रहते थे। वहां
18:03
जीवन थोड़ा खुला था। लेकिन खतरा वहां भी
18:06
कम [संगीत] नहीं था। उस दौर में कोई राजा
18:09
नहीं था। कोई नौकर नहीं था। सब बराबर थे।
18:12
अगर कोई बीमार पड़ता तो पूरा समूह उसकी
18:14
देखभाल करता। अगर कोई बच्चा [संगीत] अनाद
18:17
हो जाता तो पूरा कबीला उसे गोद ले लेता।
18:19
वे समझ चुके थे कि इस खतरनाक दुनिया में
18:22
अकेला इंसान कमजोर है। लेकिन एक समूह अजय
18:25
है। [संगीत] यही एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत
18:28
थी। उनके पास घर था। उनके पास आग थी। उनके
18:32
पास एक दूसरे का साथ था। लेकिन एक चीज की
18:35
कमी थी। पेट की भूख। भारत के जानवर तेज
18:38
थे। और उनके पुराने भारी हथियार अब काम के
18:42
नहीं रहे थे। तो फिर सवाल है उन्होंने खुद
18:44
की अस्तित्व बचाए रखने के लिए भारी
18:46
पत्थरों से आगे बढ़कर पहला तेज ब्लेड
18:49
[संगीत] कैसे बनाया और उनकी वह मिसाइल
18:52
टेक्नोलॉजी क्या था जो पल भर में जानवरों
18:54
को खत्म कर देता था। आखिर कैसे? पत्थरों
18:58
को तोड़ने वाले इंसान [संगीत] ने दुनिया
19:00
का पहला ब्लेड बनाया। समय बदल रहा था।
19:03
भारत के जंगल बदल रहे थे। अब वो विशाल और
19:06
सुस्त जानवर जैसे स्टेगोडन [संगीत] इतिहास
19:09
बन चुके थे। उनकी जगह ले ली थी। बिजली की
19:12
रफ्तार से दौड़ने वाले हिरणों, चालाक
19:15
खरगोशों और आसमान में उड़ने वाले पक्षियों
19:18
ने। हमारे पूर्वजों [संगीत] के हाथ में जो
19:20
भारीभरकम पत्थर के हथियार थे, वो इन नए
19:24
जानवरों के सामने खिलौने [संगीत] बन चुके
19:26
थे। जरा सोचिए क्या एक भारी पत्थर से
19:29
उड़ती चिड़िया को मारा जा [संगीत] सकता
19:31
है? नामुमकिन रोज शाम को जब शिकारी खाली
19:35
हाथ थके हारे गुफा में लौटते तो वहां
19:38
सन्नाटा [संगीत] छा जाता।
19:41
कबीले का लीडर अपनी भूखी नस्ल को देखता
19:43
होगा तो उसकी आंखों में सिर्फ एक ही डर
19:46
होता होगा। अगर हमने बदलने में देर की तो
19:50
हमारा इतिहास यहीं खत्म हो जाएगा।
19:53
इंसान को जिंदा रहने के [संगीत] लिए एक
19:56
तकनीकी क्रांति टेक रिवॉल्यूशन की जरूरत
19:59
थी। और फिर संकट की उसी घड़ी में इंसान के
20:03
दिमाग की बत्ती जली। उसने सोचा हथियार का
20:07
बड़ा होना जरूरी नहीं। उसका तेज और सटीक
20:10
होना जरूरी है। उसने पत्थरों को तोड़ना
20:13
बंद किया और उन्हें तराशना शुरू किया।
20:16
उसने बनाए माइक्रोलथित इंच भर के छोटे
20:19
ब्लेड जैसे धारदार टुकड़े। पुरातत्व
20:22
विज्ञान [संगीत] इसे सिर्फ पत्थर कहता है।
20:24
लेकिन असल में यह उस जमाने की मिसाइल
20:26
टेक्नोलॉजी थी। उन्होंने इन नन्हे जानलेवा
20:29
पत्थरों को लकड़ियों और हड्डियों की नोक
20:31
पर चिपकाया। अब उनके हाथ में भाला था। तीर
20:35
और कमान था। अब वे झाड़ियों में छिपकर
20:38
मीलों दूर से बिना आहट किए तेज रफ्तार
20:41
हिरण का सीना चीर सकते थे।
20:45
यह सिर्फ कहानी नहीं है। आज भी राजस्थान
20:48
के बाघोर और मध्य प्रदेश के आदमगढ़
20:50
[संगीत]
20:51
की मिट्टी में दबे यह हजारों साल पुराने
20:53
नन्हे हथियार गवाही देते हैं कि इंसान ने
20:56
अपने बाहुबल से नहीं बल्कि अपनी अक्ल से
20:59
अपनी भूख को हरा दिया था। क्या आप मान
21:03
सकते हैं कि आज का सूखा महाराष्ट्र कभी
21:05
शुतुरमुर्गों ऑस्ट्रीचेस का घर था? जी
21:08
हां, महाराष्ट्र के पाटनी गांव में हमें
21:11
शुतुरमुर्ग के अंडों के 25,000 साल पुराने
21:14
छिलके मिले हैं। एक शुतुरमुर्ग का अंडा
21:18
मुर्गी के 24 अंडों के बराबर होता था।
21:20
सोचिए एक अंडा और पूरे परिवार का पेट भर
21:24
गया। यह उनका सबसे बड़ा खजाना था। वे ना
21:27
सिर्फ इसे खाते थे बल्कि इसके मजबूत
21:30
छिलकों को पानी पीने के प्याले बोल्स की
21:32
तरह इस्तेमाल करते थे। लेकिन जंगल में
21:35
सिर्फ शिकार नहीं चल रहा था। गुफाओं के
21:38
बाहर महिलाओं [संगीत] ने एक और मोर्चा
21:40
संभाला हुआ था। जंगल हरियाली से भरा तो था
21:44
लेकिन हर पत्ती [संगीत] खाने लायक नहीं
21:45
थी। हजारों सालों के तजुर्बे से उन्होंने
21:48
सीखा कि कौन सा कंदमूल मीठा है और कौन सा
21:51
जंगली चावल पकाया जा सकता है। यही वो
21:55
सिलेक्शन था जो आगे चलकर खेती एग्रीकल्चर
21:59
की नींव बनने वाला था। वे धीरे-धीरे समझ
22:02
रहे थे कि नेचर की सुपर मार्केट से
22:05
[संगीत] क्या खरीदना है। उस दौर में पैसा
22:07
नहीं था। बैंक नहीं थे। लेकिन एक इकॉनमी
22:11
शुरू हो चुकी थी। यह इकॉनमी भरोसे पर चलती
22:14
थी। नियम कड़ा था। अगर आज शिकार तुम लाए
22:17
हो तो तुम अकेले नहीं खाओगे। तुम बांटोगे।
22:20
क्यों? क्योंकि कल शायद तुम खाली हाथ
22:24
लौटो। तब कोई और तुम्हें अपना निवाला
22:26
देगा। इसे आज हम शेयरिंग कहते हैं। यही वह
22:29
आदत थी जिसने जानवरों की भीड़ को इंसानों
22:32
[संगीत] का समाज बना दिया। लेकिन जंगल का
22:36
सबसे कीमती और ताकतवर खजाना जमीन पर नहीं
22:39
बल्कि हवा में झूलता था। सैकड़ों फीट ऊपर
22:42
ऊंची और जानलेवा सीधी खड़ी चट्टानों पर
22:45
था। शहद भीमबेटका की दीवारों पर मिले
22:47
चित्र हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज
22:50
सिर्फ ताकतवर ही नहीं बल्कि बेहद चालाक भी
22:53
थे। शहद पाना शेर का शिकार करने से भी
22:56
ज्यादा खतरनाक था।
23:00
जरा सोचिए उस आदिमानव के पास आज की तरह
23:03
कोई सेफ्टी गियर नहीं था। वे पेड़ों की
23:06
मजबूत लताओं और रेशों से रस्सियां बनाते
23:09
थे। एक तरफ नीचे हजारों फीट गहरी खाई होती
23:13
थी और दूसरी तरफ हजारों गुस्साए
23:15
मधुमक्खियां। लेकिन इंसान ने दिमाग लगाया।
23:18
वे जानते थे कि मधुमक्खियों से लड़कर नहीं
23:21
जीता जा सकता। इसलिए उन्होंने धुएं स्मोक
23:24
का इस्तेमाल किया। वे मशाल जलाकर धुएं से
23:27
मधुमक्खियों को शांत करते और फिर बहुत
23:30
सावधानी [संगीत] से छत्ते से शहद निकाल
23:32
लेते। यह सिर्फ स्वाद के लिए नहीं था। शहद
23:35
उस दौर का सुपर एनर्जी फूड था। कुदरत का
23:38
दिया हुआ सबसे शुद्ध ग्लूकोस। पेट की आग
23:42
बुझ चुकी थी। लेकिन दिमाग में एक नई हलचल
23:44
शुरू हो गई थी। आज भी मध्य प्रदेश की
23:47
भीमबेटका [संगीत] की चट्टानों पर हजारों
23:49
साल पुराने लाल रंग के निशान मौजूद हैं।
23:52
आखिर क्या बनाया [संगीत] है उन्होंने इन
23:54
दीवारों पर? कहीं शिकार करते हुए इंसान तो
23:58
कहीं नाचते हुए समूह और कहीं अजीबोगरीब
24:01
जानवर क्या यह सिर्फ सजावट थी या फिर
24:04
इंसान [संगीत] के जादू और आत्मा से जुड़ने
24:07
की पहली कोशिश एक रात गुफा के अंदर गहरी
24:10
खामोशी थी। बाहर बारिश हो रही थी। लेकिन
24:13
आग के पास बैठा इंसान कुछ सोच रहा था। वह
24:16
अपने हाथ को देख रहा था। फिर अपने साथी के
24:19
चेहरे को और फिर उस अंधेरी खुरदरी दीवार
24:22
को उसके मन में शिकार और पेट से परे कुछ
24:25
सवाल तैरने लगे। मैं कौन हूं? ये जंगल,
24:29
[संगीत] ये जानवर, ये तारे मुझसे क्या कह
24:32
रहे हैं? इन सवालों का जवाब उस वक्त की
24:35
किसी भाषा में नहीं था। इसलिए उसने एक लाल
24:39
रंग का पत्थर उठाया। उसे पीसा और गुफा की
24:42
दीवार पर एक लकीर खींच दी। यही था इंसान
24:45
का पहला अक्षर। यही [संगीत] थी कला की
24:47
शुरुआत। मध्य प्रदेश की भीमबेटका की
24:50
गुफाओं में आज भी वह चित्र मौजूद है।
24:53
लेकिन जरा सोचिए उन्होंने वो चित्र क्यों
24:55
बनाए? वह कोई आर्ट [संगीत] गैलरी नहीं थी।
24:58
वहां कोई दर्शक आने वाला नहीं था। अंधेरी
25:00
गुफाओं में मशाल की रोशनी में उन्होंने
25:03
जानवरों के चित्र बनाए। नाचते [संगीत] हुए
25:05
इंसानों के चित्र बनाए। शायद यह एक जादू
25:09
था। उनका मानना था कि अगर [संगीत] वे
25:12
दीवार पर शिकार को कैद कर लेंगे तो अगले
25:14
दिन जंगल में भी शिकार उनकी मुट्ठी में
25:16
होगा। यह चित्रकारी उनकी उम्मीद थी, उनकी
25:20
प्रार्थना थी। लेकिन बदलाव सिर्फ दीवारों
25:24
पर नहीं उनके शरीरों पर भी हो रहा था।
25:26
इंसान ने पहली बार खुद को सजाना शुरू
25:29
किया। शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलकों को
25:31
घिसकर उनमें छेद करके उन्होंने मनके बनाए
25:35
और [संगीत] गले में पहन लिया। यह फैशन
25:37
नहीं था। यह पहचान आइडेंटिटी थी। यह
25:41
दुनिया को बताने का तरीका था कि मैं हूं।
25:44
मैं अलग हूं। मेरी एक कहानी है। जानवर
25:48
सिर्फ जीते हैं, लेकिन इंसान अपनी पहचान
25:50
बनाना चाहता था। और फिर उन्होंने जीवन के
25:54
सबसे कड़वे सच का सामना किया। मौत।
25:57
जानवरों की दुनिया में जब कोई मरता है तो
26:00
उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। गिद्ध उसे खा
26:03
जाते हैं। लेकिन हमारे पूर्वजों ने ऐसा
26:05
नहीं किया। जब उनका कोई साथी, कोई बुजुर्ग
26:08
या कोई बच्चा हमेशा के लिए सो गया तो
26:11
उन्होंने उसे जंगल में नहीं फेंका। उत्तर
26:14
प्रदेश के सराय नाहर राय और महादाहा में
26:17
मिली हजारों साल पुरानी [संगीत] कब्रें
26:20
हमें एक भावुक कहानी सुनाती हैं। उन्होंने
26:23
गड्ढा खोदा। अपने प्रियजन [संगीत] को बहुत
26:25
प्यार से उसमें लिटाया।
26:31
और ध्यान दीजिए। उन्होंने उसे खाली हाथ
26:34
नहीं भेजा। उन्होंने उसके साथ उसका
26:37
पसंदीदा भाला रखा, मांस रखा और गहने रखे।
26:41
क्यों? क्योंकि इतिहास में पहली बार इंसान
26:45
यह मान रहा था कि मौत अंत नहीं है। उन्हें
26:48
लगा कि मरने के बाद भी एक सफर है। एक
26:51
दूसरी दुनिया है जहां उसे भूख लगेगी। जहां
26:55
उसे हथियारों की जरूरत होगी। यही आत्मा का
26:58
पहला विचार था। यही धर्म की [संगीत] पहली
27:01
नींव थी। गुफाओं में कहानियां गूंजने लगी।
27:05
बुजुर्ग आग के पास बैठकर बच्चों को बताने
27:07
लगे [संगीत] कि कैसे उन्होंने शेर का
27:09
सामना किया। कैसे उन्होंने नदियां पार की।
27:12
ज्ञान अब [संगीत] एक दिमाग से दूसरे दिमाग
27:14
में जा रहा था। इंसान अब सिर्फ शिकारी
27:17
नहीं था। वह एक चिंतक थिंकर बन चुका था।
27:20
वह सपने देखने लगा था। लेकिन यह घुमंतु
27:24
[संगीत] जीवन, यह शिकार, यह गुफाएं अब
27:27
पीछे छूटने वाली थी। इंसान के इतिहास में
27:29
[संगीत] एक ऐसा मोड़ आने वाला था जो सब
27:32
कुछ बदलने वाला था। वह भोजन उगाने वाला
27:35
था। गुफाओं से निकलकर खुले मैदानों में
27:37
शहर बसने वाले थे। [संगीत] पत्थर की
27:39
नालियां, विशाल स्नान गृह और हड़प्पा जैसी
27:42
अद्भुत सभ्यता जिसे देखकर आज का इंजीनियर
27:46
भी सोच में पड़ जाए। लेकिन कहानी यहीं
27:49
नहीं रुकती। सनौली और हस्तिनापुर की
27:52
खुदाइयों से शाही रथ और हथियार मिले हैं।
27:55
जो महाभारत में वर्णित पांडव कौरव युद्ध
27:58
से मेल खाता है। तो क्या महाभारत सिर्फ एक
28:01
कथा है या सच में इतिहास में घटित हुआ था।
28:05
भारत के इतिहास में आज से लगभग 9000 साल
28:08
पहले एक ऐसा पल आया जिसने इंसान की नियति
28:12
ही बदल दी। लाखों सालों से भोजन के पीछे
28:15
भागते हुए हमारे पूर्वजों ने भागना बंद कर
28:18
दिया। वजह थी एक नन्हा सा बीज। इंसान को
28:22
समझ आ गया था कि पेट भरने के लिए जंगल में
28:24
भटकना जरूरी नहीं। भोजन को अपनी जमीन पर
28:27
उगाया जा सकता है। शिकारी इंसान अब किसान
28:31
बन चुका था। नदियों के किनारे कच्ची
28:33
मिट्टी की दीवारें उठी और इंसान को उसका
28:36
[संगीत] पहला परमानेंट एड्रेस मिल गया।
28:38
समय का पहिया तेजी से घूमा। यह [संगीत]
28:41
छोटे गांव कस्बों में बदलने लगे और फिर
28:45
मेहरगढ़ से [संगीत] शुरू हुआ यह सफर भारत
28:47
के पश्चिमी हिस्से में एक महानगरीय
28:50
विस्फोट में बदल गया। आज से 5000 साल
28:53
[संगीत] पहले जब पूरी दुनिया कबीलों और
28:55
झोपड़ियों में रह रही थी तब भारत में जन्म
28:58
[संगीत] ले रही थी। दुनिया की सबसे आधुनिक
29:00
सभ्यता इंडस वैली सिविलाइजेशन
29:04
जरा कल्पना कीजिए। हजारों साल पहले के वे
29:07
लोग शहरी नियोजन अर्बन प्लानिंग के उस्ताद
29:10
थे। उनकी सड़कें आज के गांवों की तरह
29:13
टेढ़ी-मेढ़ी नहीं थी। वे एक दूसरे को ठीक
29:16
90 डिग्री राइट एंगल पर काटती थी। हड़प्पा
29:20
के शहरों में हर मकान हर गली एक सलीके से
29:23
बनी थी। यहां तक कि मकान बनाने वाली ईंटों
29:26
का अनुपात रेश्यो भी पूरी सभ्यता में 4
29:30
अनुपात 2 अनुपात एक [संगीत] ही रहता था।
29:33
चाहे शहर हजारों मील दूर हो। ईंटों का यह
29:35
स्टैंडर्ड [संगीत] साइज दिखाता है कि उनकी
29:38
शासन व्यवस्था कितनी मजबूत और संगठित थी।
29:41
लेकिन हड़प्पा की सबसे बड़ी गहराई [संगीत]
29:43
उनके महलों में नहीं बल्कि उनकी नालियों
29:46
ड्रेनेज सिस्टम में छिपी थी। हर घर का
29:49
अपना [संगीत] बाथरूम था। गंदा पानी
29:52
निकालने के लिए पक्की और ढकी हुई नालियां
29:54
[संगीत] बनाई गई थी। इन नालियों में
29:57
जगह-जगह पर मैन होल्स छोड़े गए थे
30:00
[संगीत]
30:00
ताकि कचरा साफ किया जा सके। और फिर आता है
30:04
मोहनजोदड़ो का वह विशाल स्नानागार। यह महज
30:07
[संगीत] एक कुंड नहीं था बल्कि प्राचीन
30:10
इंजीनियरिंग का चमत्कार था।
30:13
इसे वाटरप्रूफ [संगीत]
30:14
बनाने के लिए उन लोगों ने ईंटों के ऊपर
30:16
नेचुरल बिटुमेन यानी [संगीत] प्राकृतिक
30:19
डामर की परत चढ़ाई थी। हजारों सालों बाद
30:22
भी वह पानी [संगीत] को रोकने में सक्षम
30:24
था। वहां पानी भरने के लिए अलग कुआमा था
30:27
और गंदा पानी निकालने के लिए एक विशाल
30:30
आउटलेट। यह दिखाता है कि वे पानी के
30:33
प्रबंधन, वाटर मैनेजमेंट के कितने बड़े
30:36
जानकार थे। हड़प्पा के शहरों का
30:38
आर्किटेक्चर दुनिया का पहला स्मार्ट सिटी
30:41
मॉडल था। क्या आप जानते हैं? उनके घरों के
30:44
दरवाजे कभी मुख्य सड़क की तरफ नहीं खुलते
30:47
थे। वे पीछे की गलियों में खुलते थे। यह
30:49
प्राइवेसी और धूल मिट्टी से बचने का एक
30:52
अनोखा [संगीत] तरीका था। हर घर का अपना
30:54
आंगन था रोशनी और ताजी हवा [संगीत] के
30:57
लिए। 5000 साल पहले आधुनिक वेंटिलेशन का
31:00
ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता। हड़प्पा
31:03
के शहरों का आर्किटेक्चर दुनिया का पहला
31:06
स्मार्ट सिटी मॉडल था। और अगर आप हड़प्पा
31:09
सभ्यता [संगीत] के ऐसे ही उन्नत
31:10
आर्किटेक्चर, शहरों की प्लानिंग और उनकी
31:13
चौंकाने वाली तकनीक के बारे और जानना
31:16
चाहते हैं तो कमेंट में अवश्य बताइए।
31:18
[संगीत]
31:18
लेकिन जैसे-जैसे हम सिंधु सभ्यता से गंगा
31:22
के मैदानों की ओर मुड़ते हैं, इतिहास
31:24
[संगीत] एक नया और रोमांचक मोड़ लेता है।
31:28
जहां एक तरफ हड़प्पा में शांति और व्यापार
31:30
था, वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत की जमीन को
31:34
कुरेदने पर कुछ ऐसे राज मिलते हैं जो
31:37
हमारी महाकाव्य में [संगीत] वर्णित
31:39
महाभारत की युद्ध को प्रमाणित करता है। हम
31:42
बात कर रहे हैं सिनोली की। साल 2005 और
31:47
फिर 2018 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
31:50
एईएसआई को यहां जो [संगीत] मिला उसने
31:53
हजारों साल पुराने इतिहास को हिला कर रख
31:56
दिया। जमीन के सीने से निकले [संगीत] हैं
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दो पहियों वाले शाही रथ चैरियट्स।
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इतिहासकार पहले कहते थे कि भारत में रथ और
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घोड़े बाहर से आए। लेकिन सिनोली ने साबित
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कर दिया कि भारत में अपने खुद के रथ थे।
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यह तांबे से मड़े हुए थे जो इनकी मजबूती
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और [संगीत] शाही ठाट को दिखाते हैं। यहां
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से मिली एंटीना स्वर्ड्स तांबे की मुंठ
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[संगीत] वाली आठ विशाल तलवारें जो आज भी
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वैसी ही धारदार लगती हैं। तो दोस्तों आज
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के लिए बस इतना ही। कमेंट करके बताइए कि
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अगले डॉक्यूमेंट्री किस टॉपिक पर होना
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चाहिए और अगर आप भी ऐसा ही वीडियो बनाना
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चाहते हैं तो मेरे WhatsApp कम्युनिटी से
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जुड़े और यह वीडियो आप किस राज्य से देख
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रहे हैं यह भी कमेंट में बताएं।
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