[00:00] 50 मिलियन [संगीत] साल पहले भारत वैसा [00:02] नहीं था जैसा हम आज जानते हैं। यहां ना [00:05] कोई शहर था, ना खेती, ना सभ्यता। लेकिन [00:09] इसी जमीन पर कभी किसी ने पहला कदम [संगीत] [00:11] रखा था। वे ना हड़प्पा के लोग थे, ना [00:13] वैदिक रशी बल्कि उससे भी पहले हमारे [00:16] पूर्वज होमोसेपियंस। [संगीत] सवाल यह है [00:19] वे भारत में कब आए? कहां से आए? और क्या [00:22] वे भारत के पहले इंसान थे? और सबसे बड़ा [00:24] सवाल क्या उन्हीं के वंशजों ने आगे चलकर [00:27] हड़प्पा [संगीत] जैसी रहस्यमई और उन्नत [00:29] सभ्यता को जन्म दिया? इन्हीं सवालों [00:32] [संगीत] के जवाब के लिए वीडियो को अंत तक [00:34] देखिएगा और अगर आप ऐसी रोचक और रिसर्च की [00:36] हुई डॉक्यूमेंट्री पसंद करते हैं तो चैनल [00:39] को सब्सक्राइब जरूर करिए क्योंकि ऐसी [00:41] डॉक्यूमेंट्री बनाने में हमें घंटों मेहनत [00:44] और रिसर्च करनी पड़ती है। एक ऐसी दुनिया [00:46] की कल्पना कीजिए जहां इंसान तो क्या हमारे [00:50] पूर्वजों [संगीत] का भी कोई नामोनिशान [00:51] नहीं था। उस समय जिस जमीन पर आज हम और आप [00:55] खड़े हैं, वह एशिया का हिस्सा नहीं थी। [00:58] हमारा भारत एक टूटा हुआ, अकेला और वीरान [01:02] जमीन का टुकड़ा था। यह अपने परिवार [01:05] अफ्रीका से बिछड़ चुका था और हजारों [01:08] किलोमीटर दूर एक विशाल समंदर के बीचों-बीच [01:11] तैर रहा था। लाखों सालों तक भारत एक विशाल [01:15] जहाज की तरह पानी को चीरता हुआ उत्तर दिशा [01:18] की तरफ बढ़ता रहा। इसके सामने एक बहुत [01:20] बड़ा समंदर था। टेथिस सागर। लेकिन इस जमीन [01:24] [संगीत] के नीचे कुदरत की एक अदृश्य ताकत [01:27] काम कर रही थी। जमीन के अंदर मैग्मा उभर [01:30] रही थी जो भारत को [संगीत] इतनी तेज [01:32] रफ्तार दी कि यह रुका नहीं और फिर वह घड़ी [01:36] आई [संगीत] जिसने दुनिया का नक्शा हमेशा [01:38] के लिए बदल दिया। भारत इस समुद्र को पार [01:41] करते हुए सीधे यूरेशियन प्लेट तरफ परा और [01:45] फिर वह महा टकराव कोजन हुआ। यह टक्कर इतनी [01:49] भयानक थी कि इसने बीच के समंदर को ही निगल [01:52] लिया। दो विशाल जमीनी प्लेटें आपस में [01:55] भिड़ गई। दबाव इतना ज्यादा था कि धरती का [01:58] सीना फट गया। चट्टाने [संगीत] टूटने के [02:01] बजाय ऊपर की तरफ मुड़ने लगी। मलबा उठता [02:04] गया और उठता ही गया जब तक कि उसने बादलों [02:07] को नहीं छू लिया। यही था कुदरत की सबसे [02:10] बड़ी दीवार। हिमालय का जन्म। इस नई दीवार [02:14] ने सब कुछ बदल दिया। जो हवाएं पहले सीधी [02:17] निकल जाती थी। हिमालय ने उन्हें रोक लिया। [02:20] नतीजा भारत की प्यासी जमीन पर मानसून की [02:23] पहली बारिश हुई। हिमालय की बर्फ पिघली और [02:26] गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियां इस धरती [02:30] को सिंचने लगा। देखते ही देखते लाखों [02:33] सालों का यह उथल-पुथल शांत हुआ। जो जमीन [02:36] कल तक पथरीली और वीरान थी। वो अब घने [02:39] जंगलों, मीठे पानी और हरियाली से भर गई। [02:42] करोड़ों साल तक मौसम में उतार-चढ़ाव के [02:45] बाद भारत अब एक स्वर्ग बन चुका था। स्टेज [02:48] पूरी तरह सज चुका था। इंसानों की स्वागत [02:50] के लिए जंगल खामोश थे। नदियां बह रही थी, [02:54] हवाएं चल रही थी। लेकिन इस जन्नत में अभी [02:58] एक चीज की कमी थी। जीवन की अभी हम यानी [03:02] आधुनिक इंसान पैदा भी नहीं हुए थे। तो फिर [03:05] आखिर कौन थे वो अनजान मेहमान जो हमसे [03:08] लाखों साल पहले [संगीत] इस भारत के पहले [03:10] मालिक बने। चलिए उस गहरे राज से पर्दा [03:14] उठाते हैं। भारत अब बदल चुका था। जिस जमीन [03:18] पर कल तक समंदर की लहरें [संगीत] टकराती [03:20] थी, वहां अब मीठे पानी की नदियां बह रही [03:23] थी। जिस जमीन पर सिर्फ पत्थर थे, [संगीत] [03:26] वहां अब ऐसा घना जंगल उग आया था जिसे भेद [03:29] पाना सूरज की किरणों के लिए [संगीत] भी [03:31] नामुमकिन था। यह वो भारत नहीं है जिसे आज [03:34] आप जानते हैं। ना यहां कोई शहर था, ना [03:36] [संगीत] गांव और ना ही आज जैसा कोई इंसान। [03:39] यह एक अलग ही दुनिया थी। इस दुनिया में [03:42] कानून सिर्फ एक था। जिसकी [संगीत] लाठी, [03:44] उसकी भैंस नहीं बल्कि जिसका जबड़ा उसका [03:47] राज। उस समय भारत की धरती पर इंसानों का [03:50] नहीं बल्कि दानवों जॉइंट्स [संगीत] का [03:53] राज्य था। अगर आप उस समय के जंगल में चलते [03:55] तो आपका सामना आज के हाथियों से नहीं [03:58] बल्कि उनके परदादाओं से होता। स्टिगोडन एक [04:01] ऐसा विशालकाय जीव जिसके दांत 10 फीट तक [04:04] लंबे होते थे। जब यह चलता था [संगीत] तो [04:07] जमीन कांपती थी। नदियों में आज के मगरमच्छ [04:10] नहीं बल्कि हेक्सा प्रोटोोडन तैरते थे। यह [04:13] दरियाई घोड़े जैसा जानवर था। लेकिन इसका [04:15] आकार किसी ट्रक से कम नहीं था। इसके जबड़े [04:18] इतने मजबूत [संगीत] [04:19] थे कि यह पत्थर को भी चबा सकता था। यह [04:22] दुनिया ताकतवर जानवरों की थी। कमजोर के [04:24] लिए यहां कोई जगह नहीं थी। हर झाड़ी के [04:27] पीछे मौत छिपी थी। लेकिन इन्हीं विशाल [04:30] जानवरों के भारी पैरों के बीच घास के अंदर [04:33] एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। लाखों साल [04:36] पहले अफ्रीका की जमीन पर एक नई मानव [04:39] प्रजाति उभरी। इस प्रजाति का नाम था होमो [04:42] इरेक्टस। यही वह इंसान था जिसने पहली बार [04:46] पूरी तरह दो पैरों पर चलना शुरू किया। यह [04:48] ना तो वानर थे और ना ही हम यानी [04:51] होमोसेपियंस। यह घुमंतु थे। भोजन की तलाश [04:55] में चलते-चलते यह अफ्रीका से बाहर निकले। [04:58] रास्ते [संगीत] अनजान थे। ना कोई नक्शा था [05:00] ना कोई मंजिल। बस पेट की आग थी जो उन्हें [05:04] आगे धकेल रही थी और आज से करीब [संगीत] 15 [05:06] से 20 लाख साल पहले इन्हीं निडर यात्रियों [05:09] के एक समूह ने भारत की धरती पर अपना पहला [05:12] कदम रखा। यह सिर्फ एक कल्पना कहानी [05:15] [संगीत] नहीं बल्कि इसका सबूत हमें अपने [05:17] देश भारत में मिलता है। चेन्नई के पास एक [05:20] जगह है अतिरम पक्कम। यहां जमीन के [संगीत] [05:23] नीचे वैज्ञानिकों को पत्थरों का एक खजाना [05:26] मिला। यह साधारण पत्थर नहीं थे। इन्हें [05:29] तराशा गया था। इनके किनारे धारदार थे। [05:32] वैज्ञानिकों ने जब [संगीत] इनकी उम्र पता [05:34] की तो वे सन्न रह गए। यह औजार 15 लाख साल [05:37] [संगीत] पुराने थे। यानी आधुनिक इंसान के [05:40] पैदा होने से बहुत पहले। यहां कोई [संगीत] [05:43] ऐसा था जो दिमाग का इस्तेमाल करना जानता [05:46] था। और सबूत सिर्फ पत्थरों तक सीमित नहीं [05:48] है। 1982 मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के [05:52] हथनोरा [संगीत] गांव में एक [05:54] आर्कियोलॉजिस्ट अरुण सोनाकिया को एक [05:57] खोपड़ी [संगीत] का हिस्सा मिला। यह भारत [05:59] के इतिहास की सबसे बड़ी खोज थी। यह खोपड़ी [06:02] [संगीत] किसी जानवर की नहीं थी। यह एक [06:04] मानव पूर्वज की थी। इसे नाम दिया गया। [06:07] नर्मदा मानव यह लोग कैसे दिखते थे? इनका [06:10] माथा हमसे छोटा था। यानी दिमाग थोड़ा कम [06:13] विकसित था। लेकिन इनका जबड़ा बहुत मजबूत [06:16] था। इनकी आइब्रास बाहर की तरफ निकली हुई [06:19] थी। इनका शरीर किसी एथलीट जैसा गठीला था। [06:23] इनके पास हमारी तरह भाषा नहीं थी। इनकी [06:26] भाषा थी इशारे और आवाजें। इनका सबसे बड़ा [06:29] हथियार था। [संगीत] हैंड एक्स एक नाशपाती [06:32] के आकार का पत्थर जिसे यह अपनी मुट्ठी में [06:35] पकड़ते थे। यही इनका चाकू था। यही इनका [06:38] हथौड़ा था। बिना बंदूक, बिना लोहे के [06:41] हथियार के। सिर्फ पत्थरों के दम पर यह लोग [06:44] विशाल हाथियों और दरियाई घोड़ों का शिकार [06:46] करते थे। यह डरते नहीं थे। इन्होंने भारत [06:49] के हर कोने को छान मारा था। उत्तर से [06:52] दक्षिण तक। नर्मदा के [संगीत] तट से लेकर [06:55] गोदावरी के जंगलों तक इन्हीं का राज था। [06:58] लाखों सालों [संगीत] तक। भारत के जंगलों [07:01] में इन्हीं की हुंकार गूंजती रही। इन्हें [07:03] लगा कि यह इस धरती के मालिक हैं। इन्होंने [07:06] बाढ़ को हराया था, सूखे को हराया था और [07:09] बड़े-बड़े जानवरों [संगीत] को हराया था। [07:11] ऐसा लग रहा था कि इनका वंश अमर रहेगा। [07:15] लेकिन उन्हें खबर नहीं थी। कुदरत अपनी [07:18] आस्तीन में एक खंजर छिपाए बैठी थी। हजारों [07:21] मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के एक [07:25] द्वीप पर धरती के नीचे एक दानव जाग रहा [07:29] था। यह एक ऐसा टाइम बम था जिसकी टिकटिक [07:32] शुरू हो चुकी थी और जब यह फटने वाला था तो [07:35] यह इन ताकतवर [संगीत] आदिमानवों की पूरी [07:37] दुनिया को सिर्फ राख के ढेर में बदलने [07:40] वाला था। वो क्या चीज थी जिसने भारत के [07:43] पहले मालिकों को इतिहास के पन्नों से मिटा [07:46] दिया और कैसे उस विनाश ने हमारे यानी [07:50] [संगीत] आधुनिक इंसान के लिए रास्ता खोला [07:53] जो आज खुद को हम भारतीय कहते हैं। हजारों [07:55] मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के [07:59] सुमात्रा द्वीप पर धरती का सीना फटने वाला [08:02] था। एक पहाड़ नहीं बल्कि एक राक्षस जाग [08:06] चुका था। टोबा सुपर वोल्केनो की धमाका [08:09] इतना जोरदार था कि इसकी आवाज 3000 [08:12] किलोमीटर दूर भारत तक सुनाई दी होगी। [08:15] हिमालय की चोटियां भी कांप उठी होंगी। [08:17] लेकिन असली खतरा वो आवाज नहीं थी। असली [08:20] खतरा वो था जो हवा के साथ उड़कर आ रहा था। [08:24] कुछ ही घंटों में भारत का नीला आसमान गायब [08:27] हो गया। दोपहर के वक्त रात जैसा गुप [08:31] अंधेरा छा गया और फिर आसमान [संगीत] से [08:33] गिरने लगी। सफेद मौत यह बर्फ नहीं थी। यह [08:37] राख वोल्केनिक ऐश थी। कल्पना कीजिए। [08:40] [संगीत] जब उन आदिमानवों ने सांस ली होगी [08:42] तो उनका दम घुटने लगा होगा। नदियां जो कल [08:45] तक जीवन देती थी। अब कीचड़ और जहर बन चुकी [08:48] थी। पेड़-पौधे मर गए। जंगल वीरान हो गए। [08:52] भारत जो एक गर्म देश था। अचानक बर्फ जैसा [08:55] ठंडा पड़ गया। इसे विज्ञान कहता है [08:58] वोल्केनिक विंटर। अब यहां एक बहुत बड़ा [09:00] सवाल उठता है। वो आदिमानव जो लाखों सालों [09:04] से यहां के बेताज बादशाह थे। वो इस मुसीबत [09:07] से क्यों हार गए? वे तो बहुत ताकतवर थे। [09:10] फिर उनका वंश क्यों मिट गया? उनकी मौत का [09:13] कारण कोई और नहीं बल्कि उनका अपना शरीर और [09:17] दिमाग बन गया। देखिए उनके हारने की तीन [09:20] बड़ी वजह थी। पहली वजह उनके शरीर की बनावट [09:24] उनका शरीर पहलवानों जैसा भारी और गठीला [09:27] था। यह शरीर एक बड़ी गाड़ी की तरह था जिसे [09:31] चलने के लिए बहुत ज्यादा पेट्रोल यानी [09:33] एनर्जी चाहिए थी। जब तक जंगल हरेभरे थे सब [09:38] ठीक था। लेकिन जब खाना खत्म हुआ तो उनका [09:41] बड़ा शरीर ही उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन [09:43] गया। वे कम खाने में जिंदा नहीं रह सकते [09:47] थे। उनकी ताकत ही उनकी कमजोरी बन गई। [09:50] दूसरी वजह थी उनके पुराने हथियार। कड़ी [09:53] सर्दी और बदलाव के बाद जंगलों [संगीत] से [09:56] बड़े जानवर खत्म हो गए। लेकिन उनके हाथों [09:59] में अब भी भारी पत्थर के हथियार ही थे [10:01] [संगीत] जो सिर्फ बड़े जानवरों के लिए बने [10:04] थे। छोटे जानवरों के सामने यह हथियार [10:07] बेकार हो गए। और तीसरी सबसे बड़ी वजह कल [10:11] की चिंता ना करना दिक्कत यह थी कि वे [10:13] सिर्फ आज में जीते थे। उनके पास हम जैसा [10:17] दिमाग नहीं था जो मुसीबत आने से पहले [10:19] प्लानिंग कर सके। उन्हें [संगीत] खाना जमा [10:22] करना नहीं आता था। उन्हें यह समझ नहीं आया [10:24] कि कल क्या होगा और देखते ही देखते एक [10:28] पूरी प्रजाति जो कल तक भारत की मालिक थी [10:31] वो भूख ठंड और अंधेरे में घुटघुट कर खत्म [10:35] हो गई। यह विनाश अंत नहीं था। [संगीत] यह [10:37] एक नई शुरुआत की तैयारी थी। राख से ढकी इस [10:40] भारत की धरती पर अब एक नई प्रजाति कदम [10:43] रखने वाली थी। एक ऐसी प्रजाति जिससे आज हम [10:46] सब जुड़े हैं होमोसेपियंस। [10:51] टोबा का महाविस्फोट सिर्फ भारत को ही नहीं [10:54] झुलसा गया था। सैकड़ों साल बाद भी उसकी [10:57] [संगीत] राख और सर्दी की मार अफ्रीका तक [11:00] पहुंची ही चुकी। जिस धरती ने लाखों सालों [11:03] से इंसान को पाला [संगीत] था, वही धरती अब [11:06] उसे बोझ लगने लगी थी। जंगल सूख रहे थे और [11:10] इसी धरती पर एक प्रजाति [संगीत] अब सांस [11:12] लेने के लिए भी संघर्ष कर रही थी। [11:14] होमोसेपियंस। [11:15] जरा उस समय के इंसान के बारे में सोचिए। [11:18] वह कोई योद्धा या विजेता नहीं था। वह बस [11:21] एक पिता था जो सुबह शिकार पर निकलता और [11:24] शाम को खाली हाथ झुकी हुई नजरों के साथ [11:27] लौटता था। वह एक मां थी जो अपने बच्चे की [11:31] प्यास बुझाने के लिए बूंदबूंद पानी के लिए [11:33] [संगीत] तरस रही थी। [11:38] अफ्रीका उनका अपना घर अब उन्हें पाल नहीं [11:41] सकता था। उनके पास दो ही रास्ते थे। या तो [11:45] यहीं [संगीत] रुक कर धीरे-धीरे इतिहास से [11:47] मिट जाएं या फिर उस अनजान क्षितिज की ओर [11:49] बढ़े जहां शायद मौत हो। लेकिन शायद [11:52] [संगीत] जिंदगी की एक उम्मीद भी और फिर [11:55] भूख ने उन्हें वह फैसला लेने पर मजबूर [11:57] [संगीत] कर दिया जो शायद इंसानियत के [12:00] इतिहास का सबसे बढ़ा फैसला था। एक पूरा [12:03] जनसमूह बच्चे, बूढ़े, जवान अपना सब कुछ [12:07] समेट कर चल पड़े। चलते-चलते वे जमीन के [12:10] आखिरी छोर पर आ गए। सामने लाल सागर था [12:13] जहां पानी ही पानी और आगे कुछ भी नजर नहीं [12:16] आ रहा था। विज्ञान कहता [संगीत] है कि उस [12:18] समय हिमयुग आइस एज के कारण समंदर का स्तर [12:22] नीचे था। अफ्रीका और अरब के बीच की दूरी [12:25] आज के मुकाबले [संगीत] बहुत कम थी। लेकिन [12:28] उन लोगों के पास ना कोई नक्शा था, ना कोई [12:30] बड़ी नाव। उनके लिए वह छोटी सी दूरी भी [12:33] मौत के कुएं जैसी थी। इसे आज हम बाब अल [12:36] मंदब कहते हैं। [12:42] कल्पना कीजिए उस डर की जब उन्होंने सूखी [12:45] लकड़ियों और बांस से बने डगमगाते राफ्टर्स [12:47] पर पहली बार अपने बच्चों को बैठाया होगा। [12:50] ना जाने कितने पिता ना जाने कितनी माताएं [12:53] उस सफर में लहरों में समा गई। ना जाने [12:56] कितनों का हाथ अपनों से छूट गया जो बच गए। [12:59] वे लहरों से लड़कर अरब के तट आज का यमन पर [13:02] पहुंच गए। वे जिंदा तो थे लेकिन वे अब [13:04] बेघर थे। उनका घर अफ्रीका हमेशा के लिए [13:07] पीछे छूट चुका था। [13:11] पर उनका इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ था। [13:14] अरब की जमीन भी सूखी और पथरीली थी। [13:17] रेगिस्तान उन्हें निगलने के लिए तैयार [13:19] खड़ा था। इसलिए उन्होंने एक समझदारी [13:22] दिखाई। वे जमीन के अंदर नहीं गए। वे समंदर [13:25] के किनारे-किनारे चलते रहे। इसे हम तटीय [13:28] प्रवास कोस्टल माइग्रेशन कहते हैं। समंदर [13:32] जिसने उनके अपनों को छीना था। अब वही उनका [13:36] सहारा बन गया। उसने उन्हें खाना दिया। [13:39] मछलियां, केकड़े, सीपियां वे चलते रहे। [13:42] [संगीत] एक साल नहीं, 100 साल नहीं बल्कि [13:44] हजारों सालों तक यह सफर एक पीढ़ी की नहीं [13:47] कई पीढ़ियों तक पूर्व दिशा की ओर चलते [13:50] रहे। बस एक ही उम्मीद में कि कहीं तो ऐसी [13:53] जमीन होगी जो घर जैसी लगे। और फिर आज से [13:57] लगभग 65,000 [संगीत] साल पहले, उन [13:59] यात्रियों के वंशजों को हवा में एक बदलाव [14:02] महसूस हुआ। यह धूल की आंधी [संगीत] नहीं [14:04] थी। यह ठंडी हवा थी। वे भारत की दहलीज पर [14:08] खड़े थे। टोबा की [संगीत] राख जिसने [14:10] हजारों साल पहले यहां जीवन खत्म कर दिया [14:12] था। अब वही राख उपजाऊ मिट्टी बन चुकी थी। [14:16] कुदरत ने अपने घाव भर लिए थे। सूखे पेड़ों [14:19] की जगह हरेभरे जंगलों ने ले ली थी। नदियां [14:23] मीठे पानी से लबालब बह रही थी। जब उन थके [14:26] हुए यात्रियों ने सिंधु और सरस्वती की [14:28] [संगीत] उस हरीभरी धरती पर पहला कदम रखा [14:31] होगा। [14:36] कहानी का सुखद अंत अभी नहीं हुआ था। [14:39] उन्हें लगा कि उन्हें स्वर्ग मिल गया है। [14:42] लेकिन उन्हें खबर नहीं थी कि यह स्वर्ग भी [14:45] उनकी एक कड़ी [संगीत] परीक्षा लेने वाला [14:47] था। अफ्रीका के खुले मैदानों में वे दूर [14:50] तक [संगीत] देख सकते थे। खतरे को भांप [14:52] सकते थे। लेकिन भारत भारत के जंगल [संगीत] [14:56] घने थे। मिस्टीरियस थे। यहां हर झाड़ी के [14:59] पीछे मौत छिपी थी। यहां के विशालकाय हाथी [15:02] और दुनिया के सबसे खूंखार बाघ [संगीत] उन [15:05] अजनबियों को घूर रहे थे। रात होते ही यह [15:08] जंगल एक भूल भुलैया बन जाता था। खुले [15:11] आसमान [संगीत] के नीचे सोना नामुमकिन था [15:13] तो सवाल यह है उस पहली रात उस अनजान जंगल [15:17] [संगीत] में हमारे पूर्वज जिंदा कैसे रहे? [15:19] और भारत की जमीन पर इंसान [संगीत] ने अपनी [15:22] पहली सुरक्षा कैसे बनाई? अफ्रीका से मीलों [15:24] पैदल चलकर आए उन थके हुए यात्रियों के [15:27] लिए। भारत का घना जंगल किसी मौत के कुएं [15:30] से कम [संगीत] नहीं था। यहां खुले आसमान [15:32] के नीचे सोने का मतलब था सीधे मौत [संगीत] [15:35] को दावत देना। उन्हें एक ऐसी जगह चाहिए थी [15:38] जहां दीवारें हो लेकिन दरवाजा ना हो और [15:41] मध्य भारत के [संगीत] जंगलों में कुदरत ने [15:44] उन्हें अपना सबसे नायाब तोहफा दिया। [15:47] भीमबेट [संगीत] का यह साधारण गुफाएं नहीं [15:49] थी। यह पत्थर के प्राकृतिक महल थे। इन [15:52] विशाल चट्टानों ने उन्हें मूसलाधार बारिश [15:54] से बचाया। कड़ाके की ठंड से [संगीत] बचाया [15:57] और सबसे जरूरी रात के अंधेरे में उन [16:01] खूंखार जानवरों से बचाया। [16:04] इतिहास में पहली बार इंसान को घर शब्द का [16:08] असली मतलब समझ आया था। यह गुफा सिर्फ [16:11] पत्थरों का ढेर नहीं थी। यह इंसानियत का [16:14] पहला [संगीत] किला थी। जरा कल्पना कीजिए। [16:18] आज से 60 हजार [संगीत] साल पहले की एक [16:20] सुबह की तब कोई अलार्म क्लॉक नहीं थी। [16:23] चिड़ियों की चहचहाट और सूरज की पहली किरण [16:26] ही उनकी घड़ी थी। जैसे ही आंख खुलती थी तो [16:30] सबसे पहला विचार क्या आता होगा? शायद यही [16:33] क्या हम सब जिंदा हैं? दिन की शुरुआत चाय [16:36] या कॉफी से नहीं होती थी। सबसे पहली जरूरत [16:40] थी पानी। लेकिन उस दौर में नदी तक जाना भी [16:43] एक फौजी मिशन जैसा था। कबीले के मर्द पहले [16:46] बाहर निकलकर मुआयना करते थे कि कहीं [16:49] झाड़ियों में कोई तेंदुआ तो घात लगाकर [16:51] नहीं बैठा। जब रास्ता साफ होता तभी [16:54] महिलाएं और बच्चे पानी के लिए नीचे उतरते [16:57] थे। हर सुबह जिंदगी और मौत के बीच का एक [17:01] जुआ थी। लेकिन रात के अंधेरे में उनका [17:04] सबसे बड़ा रक्षक कोई इंसान नहीं था। वो थी [17:07] आग। आग सिर्फ [संगीत] खाना पकाने के लिए [17:10] नहीं थी। यह उनकी सिक्योरिटी गार्ड थी। जब [17:13] तक गुफा के द्वार पर आग जलती रहती थी। [17:15] जंगल का कोई भी जानवर अंदर आने की हिम्मत [17:18] नहीं करता था। और यही आग उनका सोशल [17:20] [संगीत] मीडिया भी थी। शाम को शिकार के [17:23] बाद पूरा कबीला इसी आग के चारों तरफ बैठता [17:26] था। यही कहानियां सुनाई जाती थी। यहीं दुख [17:29] सुख [संगीत] बांटे जाते थे। इस आग की [17:31] गर्मी ने इंसान को एक दूसरे से जोड़ दिया [17:34] था। लेकिन भारत बहुत विशाल था। जैसे-जैसे [17:37] इंसान फैला उसे अलग-अलग चुनौतियों का [17:40] सामना करना पड़ा। विंध्य और हिमालय के पास [17:42] रहने वालों को ठंड का सामना करना पड़ा। [17:45] इसलिए वे गहरी गुफाओं [संगीत] में रहते थे [17:47] और आग पर ज्यादा निर्भर थे। वहीं जो लोग [17:50] साउथ [संगीत] इंडिया में कर्नाटक आंध्र की [17:52] तरफ गए वहां मौसम गर्म था। वहां उन्हें [17:56] गहरी [संगीत] गुफाओं की जरूरत नहीं थी। वे [17:58] ग्रेनाइट की पहाड़ियों के नीचे या कभी-कभी [18:01] खुले में झोपड़ियां बनाकर रहते थे। वहां [18:03] जीवन थोड़ा खुला था। लेकिन खतरा वहां भी [18:06] कम [संगीत] नहीं था। उस दौर में कोई राजा [18:09] नहीं था। कोई नौकर नहीं था। सब बराबर थे। [18:12] अगर कोई बीमार पड़ता तो पूरा समूह उसकी [18:14] देखभाल करता। अगर कोई बच्चा [संगीत] अनाद [18:17] हो जाता तो पूरा कबीला उसे गोद ले लेता। [18:19] वे समझ चुके थे कि इस खतरनाक दुनिया में [18:22] अकेला इंसान कमजोर है। लेकिन एक समूह अजय [18:25] है। [संगीत] यही एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत [18:28] थी। उनके पास घर था। उनके पास आग थी। उनके [18:32] पास एक दूसरे का साथ था। लेकिन एक चीज की [18:35] कमी थी। पेट की भूख। भारत के जानवर तेज [18:38] थे। और उनके पुराने भारी हथियार अब काम के [18:42] नहीं रहे थे। तो फिर सवाल है उन्होंने खुद [18:44] की अस्तित्व बचाए रखने के लिए भारी [18:46] पत्थरों से आगे बढ़कर पहला तेज ब्लेड [18:49] [संगीत] कैसे बनाया और उनकी वह मिसाइल [18:52] टेक्नोलॉजी क्या था जो पल भर में जानवरों [18:54] को खत्म कर देता था। आखिर कैसे? पत्थरों [18:58] को तोड़ने वाले इंसान [संगीत] ने दुनिया [19:00] का पहला ब्लेड बनाया। समय बदल रहा था। [19:03] भारत के जंगल बदल रहे थे। अब वो विशाल और [19:06] सुस्त जानवर जैसे स्टेगोडन [संगीत] इतिहास [19:09] बन चुके थे। उनकी जगह ले ली थी। बिजली की [19:12] रफ्तार से दौड़ने वाले हिरणों, चालाक [19:15] खरगोशों और आसमान में उड़ने वाले पक्षियों [19:18] ने। हमारे पूर्वजों [संगीत] के हाथ में जो [19:20] भारीभरकम पत्थर के हथियार थे, वो इन नए [19:24] जानवरों के सामने खिलौने [संगीत] बन चुके [19:26] थे। जरा सोचिए क्या एक भारी पत्थर से [19:29] उड़ती चिड़िया को मारा जा [संगीत] सकता [19:31] है? नामुमकिन रोज शाम को जब शिकारी खाली [19:35] हाथ थके हारे गुफा में लौटते तो वहां [19:38] सन्नाटा [संगीत] छा जाता। [19:41] कबीले का लीडर अपनी भूखी नस्ल को देखता [19:43] होगा तो उसकी आंखों में सिर्फ एक ही डर [19:46] होता होगा। अगर हमने बदलने में देर की तो [19:50] हमारा इतिहास यहीं खत्म हो जाएगा। [19:53] इंसान को जिंदा रहने के [संगीत] लिए एक [19:56] तकनीकी क्रांति टेक रिवॉल्यूशन की जरूरत [19:59] थी। और फिर संकट की उसी घड़ी में इंसान के [20:03] दिमाग की बत्ती जली। उसने सोचा हथियार का [20:07] बड़ा होना जरूरी नहीं। उसका तेज और सटीक [20:10] होना जरूरी है। उसने पत्थरों को तोड़ना [20:13] बंद किया और उन्हें तराशना शुरू किया। [20:16] उसने बनाए माइक्रोलथित इंच भर के छोटे [20:19] ब्लेड जैसे धारदार टुकड़े। पुरातत्व [20:22] विज्ञान [संगीत] इसे सिर्फ पत्थर कहता है। [20:24] लेकिन असल में यह उस जमाने की मिसाइल [20:26] टेक्नोलॉजी थी। उन्होंने इन नन्हे जानलेवा [20:29] पत्थरों को लकड़ियों और हड्डियों की नोक [20:31] पर चिपकाया। अब उनके हाथ में भाला था। तीर [20:35] और कमान था। अब वे झाड़ियों में छिपकर [20:38] मीलों दूर से बिना आहट किए तेज रफ्तार [20:41] हिरण का सीना चीर सकते थे। [20:45] यह सिर्फ कहानी नहीं है। आज भी राजस्थान [20:48] के बाघोर और मध्य प्रदेश के आदमगढ़ [20:50] [संगीत] [20:51] की मिट्टी में दबे यह हजारों साल पुराने [20:53] नन्हे हथियार गवाही देते हैं कि इंसान ने [20:56] अपने बाहुबल से नहीं बल्कि अपनी अक्ल से [20:59] अपनी भूख को हरा दिया था। क्या आप मान [21:03] सकते हैं कि आज का सूखा महाराष्ट्र कभी [21:05] शुतुरमुर्गों ऑस्ट्रीचेस का घर था? जी [21:08] हां, महाराष्ट्र के पाटनी गांव में हमें [21:11] शुतुरमुर्ग के अंडों के 25,000 साल पुराने [21:14] छिलके मिले हैं। एक शुतुरमुर्ग का अंडा [21:18] मुर्गी के 24 अंडों के बराबर होता था। [21:20] सोचिए एक अंडा और पूरे परिवार का पेट भर [21:24] गया। यह उनका सबसे बड़ा खजाना था। वे ना [21:27] सिर्फ इसे खाते थे बल्कि इसके मजबूत [21:30] छिलकों को पानी पीने के प्याले बोल्स की [21:32] तरह इस्तेमाल करते थे। लेकिन जंगल में [21:35] सिर्फ शिकार नहीं चल रहा था। गुफाओं के [21:38] बाहर महिलाओं [संगीत] ने एक और मोर्चा [21:40] संभाला हुआ था। जंगल हरियाली से भरा तो था [21:44] लेकिन हर पत्ती [संगीत] खाने लायक नहीं [21:45] थी। हजारों सालों के तजुर्बे से उन्होंने [21:48] सीखा कि कौन सा कंदमूल मीठा है और कौन सा [21:51] जंगली चावल पकाया जा सकता है। यही वो [21:55] सिलेक्शन था जो आगे चलकर खेती एग्रीकल्चर [21:59] की नींव बनने वाला था। वे धीरे-धीरे समझ [22:02] रहे थे कि नेचर की सुपर मार्केट से [22:05] [संगीत] क्या खरीदना है। उस दौर में पैसा [22:07] नहीं था। बैंक नहीं थे। लेकिन एक इकॉनमी [22:11] शुरू हो चुकी थी। यह इकॉनमी भरोसे पर चलती [22:14] थी। नियम कड़ा था। अगर आज शिकार तुम लाए [22:17] हो तो तुम अकेले नहीं खाओगे। तुम बांटोगे। [22:20] क्यों? क्योंकि कल शायद तुम खाली हाथ [22:24] लौटो। तब कोई और तुम्हें अपना निवाला [22:26] देगा। इसे आज हम शेयरिंग कहते हैं। यही वह [22:29] आदत थी जिसने जानवरों की भीड़ को इंसानों [22:32] [संगीत] का समाज बना दिया। लेकिन जंगल का [22:36] सबसे कीमती और ताकतवर खजाना जमीन पर नहीं [22:39] बल्कि हवा में झूलता था। सैकड़ों फीट ऊपर [22:42] ऊंची और जानलेवा सीधी खड़ी चट्टानों पर [22:45] था। शहद भीमबेटका की दीवारों पर मिले [22:47] चित्र हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज [22:50] सिर्फ ताकतवर ही नहीं बल्कि बेहद चालाक भी [22:53] थे। शहद पाना शेर का शिकार करने से भी [22:56] ज्यादा खतरनाक था। [23:00] जरा सोचिए उस आदिमानव के पास आज की तरह [23:03] कोई सेफ्टी गियर नहीं था। वे पेड़ों की [23:06] मजबूत लताओं और रेशों से रस्सियां बनाते [23:09] थे। एक तरफ नीचे हजारों फीट गहरी खाई होती [23:13] थी और दूसरी तरफ हजारों गुस्साए [23:15] मधुमक्खियां। लेकिन इंसान ने दिमाग लगाया। [23:18] वे जानते थे कि मधुमक्खियों से लड़कर नहीं [23:21] जीता जा सकता। इसलिए उन्होंने धुएं स्मोक [23:24] का इस्तेमाल किया। वे मशाल जलाकर धुएं से [23:27] मधुमक्खियों को शांत करते और फिर बहुत [23:30] सावधानी [संगीत] से छत्ते से शहद निकाल [23:32] लेते। यह सिर्फ स्वाद के लिए नहीं था। शहद [23:35] उस दौर का सुपर एनर्जी फूड था। कुदरत का [23:38] दिया हुआ सबसे शुद्ध ग्लूकोस। पेट की आग [23:42] बुझ चुकी थी। लेकिन दिमाग में एक नई हलचल [23:44] शुरू हो गई थी। आज भी मध्य प्रदेश की [23:47] भीमबेटका [संगीत] की चट्टानों पर हजारों [23:49] साल पुराने लाल रंग के निशान मौजूद हैं। [23:52] आखिर क्या बनाया [संगीत] है उन्होंने इन [23:54] दीवारों पर? कहीं शिकार करते हुए इंसान तो [23:58] कहीं नाचते हुए समूह और कहीं अजीबोगरीब [24:01] जानवर क्या यह सिर्फ सजावट थी या फिर [24:04] इंसान [संगीत] के जादू और आत्मा से जुड़ने [24:07] की पहली कोशिश एक रात गुफा के अंदर गहरी [24:10] खामोशी थी। बाहर बारिश हो रही थी। लेकिन [24:13] आग के पास बैठा इंसान कुछ सोच रहा था। वह [24:16] अपने हाथ को देख रहा था। फिर अपने साथी के [24:19] चेहरे को और फिर उस अंधेरी खुरदरी दीवार [24:22] को उसके मन में शिकार और पेट से परे कुछ [24:25] सवाल तैरने लगे। मैं कौन हूं? ये जंगल, [24:29] [संगीत] ये जानवर, ये तारे मुझसे क्या कह [24:32] रहे हैं? इन सवालों का जवाब उस वक्त की [24:35] किसी भाषा में नहीं था। इसलिए उसने एक लाल [24:39] रंग का पत्थर उठाया। उसे पीसा और गुफा की [24:42] दीवार पर एक लकीर खींच दी। यही था इंसान [24:45] का पहला अक्षर। यही [संगीत] थी कला की [24:47] शुरुआत। मध्य प्रदेश की भीमबेटका की [24:50] गुफाओं में आज भी वह चित्र मौजूद है। [24:53] लेकिन जरा सोचिए उन्होंने वो चित्र क्यों [24:55] बनाए? वह कोई आर्ट [संगीत] गैलरी नहीं थी। [24:58] वहां कोई दर्शक आने वाला नहीं था। अंधेरी [25:00] गुफाओं में मशाल की रोशनी में उन्होंने [25:03] जानवरों के चित्र बनाए। नाचते [संगीत] हुए [25:05] इंसानों के चित्र बनाए। शायद यह एक जादू [25:09] था। उनका मानना था कि अगर [संगीत] वे [25:12] दीवार पर शिकार को कैद कर लेंगे तो अगले [25:14] दिन जंगल में भी शिकार उनकी मुट्ठी में [25:16] होगा। यह चित्रकारी उनकी उम्मीद थी, उनकी [25:20] प्रार्थना थी। लेकिन बदलाव सिर्फ दीवारों [25:24] पर नहीं उनके शरीरों पर भी हो रहा था। [25:26] इंसान ने पहली बार खुद को सजाना शुरू [25:29] किया। शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलकों को [25:31] घिसकर उनमें छेद करके उन्होंने मनके बनाए [25:35] और [संगीत] गले में पहन लिया। यह फैशन [25:37] नहीं था। यह पहचान आइडेंटिटी थी। यह [25:41] दुनिया को बताने का तरीका था कि मैं हूं। [25:44] मैं अलग हूं। मेरी एक कहानी है। जानवर [25:48] सिर्फ जीते हैं, लेकिन इंसान अपनी पहचान [25:50] बनाना चाहता था। और फिर उन्होंने जीवन के [25:54] सबसे कड़वे सच का सामना किया। मौत। [25:57] जानवरों की दुनिया में जब कोई मरता है तो [26:00] उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। गिद्ध उसे खा [26:03] जाते हैं। लेकिन हमारे पूर्वजों ने ऐसा [26:05] नहीं किया। जब उनका कोई साथी, कोई बुजुर्ग [26:08] या कोई बच्चा हमेशा के लिए सो गया तो [26:11] उन्होंने उसे जंगल में नहीं फेंका। उत्तर [26:14] प्रदेश के सराय नाहर राय और महादाहा में [26:17] मिली हजारों साल पुरानी [संगीत] कब्रें [26:20] हमें एक भावुक कहानी सुनाती हैं। उन्होंने [26:23] गड्ढा खोदा। अपने प्रियजन [संगीत] को बहुत [26:25] प्यार से उसमें लिटाया। [26:31] और ध्यान दीजिए। उन्होंने उसे खाली हाथ [26:34] नहीं भेजा। उन्होंने उसके साथ उसका [26:37] पसंदीदा भाला रखा, मांस रखा और गहने रखे। [26:41] क्यों? क्योंकि इतिहास में पहली बार इंसान [26:45] यह मान रहा था कि मौत अंत नहीं है। उन्हें [26:48] लगा कि मरने के बाद भी एक सफर है। एक [26:51] दूसरी दुनिया है जहां उसे भूख लगेगी। जहां [26:55] उसे हथियारों की जरूरत होगी। यही आत्मा का [26:58] पहला विचार था। यही धर्म की [संगीत] पहली [27:01] नींव थी। गुफाओं में कहानियां गूंजने लगी। [27:05] बुजुर्ग आग के पास बैठकर बच्चों को बताने [27:07] लगे [संगीत] कि कैसे उन्होंने शेर का [27:09] सामना किया। कैसे उन्होंने नदियां पार की। [27:12] ज्ञान अब [संगीत] एक दिमाग से दूसरे दिमाग [27:14] में जा रहा था। इंसान अब सिर्फ शिकारी [27:17] नहीं था। वह एक चिंतक थिंकर बन चुका था। [27:20] वह सपने देखने लगा था। लेकिन यह घुमंतु [27:24] [संगीत] जीवन, यह शिकार, यह गुफाएं अब [27:27] पीछे छूटने वाली थी। इंसान के इतिहास में [27:29] [संगीत] एक ऐसा मोड़ आने वाला था जो सब [27:32] कुछ बदलने वाला था। वह भोजन उगाने वाला [27:35] था। गुफाओं से निकलकर खुले मैदानों में [27:37] शहर बसने वाले थे। [संगीत] पत्थर की [27:39] नालियां, विशाल स्नान गृह और हड़प्पा जैसी [27:42] अद्भुत सभ्यता जिसे देखकर आज का इंजीनियर [27:46] भी सोच में पड़ जाए। लेकिन कहानी यहीं [27:49] नहीं रुकती। सनौली और हस्तिनापुर की [27:52] खुदाइयों से शाही रथ और हथियार मिले हैं। [27:55] जो महाभारत में वर्णित पांडव कौरव युद्ध [27:58] से मेल खाता है। तो क्या महाभारत सिर्फ एक [28:01] कथा है या सच में इतिहास में घटित हुआ था। [28:05] भारत के इतिहास में आज से लगभग 9000 साल [28:08] पहले एक ऐसा पल आया जिसने इंसान की नियति [28:12] ही बदल दी। लाखों सालों से भोजन के पीछे [28:15] भागते हुए हमारे पूर्वजों ने भागना बंद कर [28:18] दिया। वजह थी एक नन्हा सा बीज। इंसान को [28:22] समझ आ गया था कि पेट भरने के लिए जंगल में [28:24] भटकना जरूरी नहीं। भोजन को अपनी जमीन पर [28:27] उगाया जा सकता है। शिकारी इंसान अब किसान [28:31] बन चुका था। नदियों के किनारे कच्ची [28:33] मिट्टी की दीवारें उठी और इंसान को उसका [28:36] [संगीत] पहला परमानेंट एड्रेस मिल गया। [28:38] समय का पहिया तेजी से घूमा। यह [संगीत] [28:41] छोटे गांव कस्बों में बदलने लगे और फिर [28:45] मेहरगढ़ से [संगीत] शुरू हुआ यह सफर भारत [28:47] के पश्चिमी हिस्से में एक महानगरीय [28:50] विस्फोट में बदल गया। आज से 5000 साल [28:53] [संगीत] पहले जब पूरी दुनिया कबीलों और [28:55] झोपड़ियों में रह रही थी तब भारत में जन्म [28:58] [संगीत] ले रही थी। दुनिया की सबसे आधुनिक [29:00] सभ्यता इंडस वैली सिविलाइजेशन [29:04] जरा कल्पना कीजिए। हजारों साल पहले के वे [29:07] लोग शहरी नियोजन अर्बन प्लानिंग के उस्ताद [29:10] थे। उनकी सड़कें आज के गांवों की तरह [29:13] टेढ़ी-मेढ़ी नहीं थी। वे एक दूसरे को ठीक [29:16] 90 डिग्री राइट एंगल पर काटती थी। हड़प्पा [29:20] के शहरों में हर मकान हर गली एक सलीके से [29:23] बनी थी। यहां तक कि मकान बनाने वाली ईंटों [29:26] का अनुपात रेश्यो भी पूरी सभ्यता में 4 [29:30] अनुपात 2 अनुपात एक [संगीत] ही रहता था। [29:33] चाहे शहर हजारों मील दूर हो। ईंटों का यह [29:35] स्टैंडर्ड [संगीत] साइज दिखाता है कि उनकी [29:38] शासन व्यवस्था कितनी मजबूत और संगठित थी। [29:41] लेकिन हड़प्पा की सबसे बड़ी गहराई [संगीत] [29:43] उनके महलों में नहीं बल्कि उनकी नालियों [29:46] ड्रेनेज सिस्टम में छिपी थी। हर घर का [29:49] अपना [संगीत] बाथरूम था। गंदा पानी [29:52] निकालने के लिए पक्की और ढकी हुई नालियां [29:54] [संगीत] बनाई गई थी। इन नालियों में [29:57] जगह-जगह पर मैन होल्स छोड़े गए थे [30:00] [संगीत] [30:00] ताकि कचरा साफ किया जा सके। और फिर आता है [30:04] मोहनजोदड़ो का वह विशाल स्नानागार। यह महज [30:07] [संगीत] एक कुंड नहीं था बल्कि प्राचीन [30:10] इंजीनियरिंग का चमत्कार था। [30:13] इसे वाटरप्रूफ [संगीत] [30:14] बनाने के लिए उन लोगों ने ईंटों के ऊपर [30:16] नेचुरल बिटुमेन यानी [संगीत] प्राकृतिक [30:19] डामर की परत चढ़ाई थी। हजारों सालों बाद [30:22] भी वह पानी [संगीत] को रोकने में सक्षम [30:24] था। वहां पानी भरने के लिए अलग कुआमा था [30:27] और गंदा पानी निकालने के लिए एक विशाल [30:30] आउटलेट। यह दिखाता है कि वे पानी के [30:33] प्रबंधन, वाटर मैनेजमेंट के कितने बड़े [30:36] जानकार थे। हड़प्पा के शहरों का [30:38] आर्किटेक्चर दुनिया का पहला स्मार्ट सिटी [30:41] मॉडल था। क्या आप जानते हैं? उनके घरों के [30:44] दरवाजे कभी मुख्य सड़क की तरफ नहीं खुलते [30:47] थे। वे पीछे की गलियों में खुलते थे। यह [30:49] प्राइवेसी और धूल मिट्टी से बचने का एक [30:52] अनोखा [संगीत] तरीका था। हर घर का अपना [30:54] आंगन था रोशनी और ताजी हवा [संगीत] के [30:57] लिए। 5000 साल पहले आधुनिक वेंटिलेशन का [31:00] ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता। हड़प्पा [31:03] के शहरों का आर्किटेक्चर दुनिया का पहला [31:06] स्मार्ट सिटी मॉडल था। और अगर आप हड़प्पा [31:09] सभ्यता [संगीत] के ऐसे ही उन्नत [31:10] आर्किटेक्चर, शहरों की प्लानिंग और उनकी [31:13] चौंकाने वाली तकनीक के बारे और जानना [31:16] चाहते हैं तो कमेंट में अवश्य बताइए। [31:18] [संगीत] [31:18] लेकिन जैसे-जैसे हम सिंधु सभ्यता से गंगा [31:22] के मैदानों की ओर मुड़ते हैं, इतिहास [31:24] [संगीत] एक नया और रोमांचक मोड़ लेता है। [31:28] जहां एक तरफ हड़प्पा में शांति और व्यापार [31:30] था, वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत की जमीन को [31:34] कुरेदने पर कुछ ऐसे राज मिलते हैं जो [31:37] हमारी महाकाव्य में [संगीत] वर्णित [31:39] महाभारत की युद्ध को प्रमाणित करता है। हम [31:42] बात कर रहे हैं सिनोली की। साल 2005 और [31:47] फिर 2018 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण [31:50] एईएसआई को यहां जो [संगीत] मिला उसने [31:53] हजारों साल पुराने इतिहास को हिला कर रख [31:56] दिया। जमीन के सीने से निकले [संगीत] हैं [31:58] दो पहियों वाले शाही रथ चैरियट्स। [32:01] इतिहासकार पहले कहते थे कि भारत में रथ और [32:04] घोड़े बाहर से आए। लेकिन सिनोली ने साबित [32:07] कर दिया कि भारत में अपने खुद के रथ थे। [32:10] यह तांबे से मड़े हुए थे जो इनकी मजबूती [32:13] और [संगीत] शाही ठाट को दिखाते हैं। यहां [32:15] से मिली एंटीना स्वर्ड्स तांबे की मुंठ [32:18] [संगीत] वाली आठ विशाल तलवारें जो आज भी [32:21] वैसी ही धारदार लगती हैं। तो दोस्तों आज [32:24] के लिए बस इतना ही। कमेंट करके बताइए कि [32:27] अगले डॉक्यूमेंट्री किस टॉपिक पर होना [32:29] चाहिए और अगर आप भी ऐसा ही वीडियो बनाना [32:32] चाहते हैं तो मेरे WhatsApp कम्युनिटी से [32:34] जुड़े और यह वीडियो आप किस राज्य से देख [32:37] रहे हैं यह भी कमेंट में बताएं।