WEBVTT

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50 मिलियन [संगीत] साल पहले भारत वैसा

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नहीं था जैसा हम आज जानते हैं। यहां ना

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कोई शहर था, ना खेती, ना सभ्यता। लेकिन

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इसी जमीन पर कभी किसी ने पहला कदम [संगीत]

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रखा था। वे ना हड़प्पा के लोग थे, ना

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वैदिक रशी बल्कि उससे भी पहले हमारे

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पूर्वज होमोसेपियंस। [संगीत] सवाल यह है

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वे भारत में कब आए? कहां से आए? और क्या

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वे भारत के पहले इंसान थे? और सबसे बड़ा

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सवाल क्या उन्हीं के वंशजों ने आगे चलकर

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हड़प्पा [संगीत] जैसी रहस्यमई और उन्नत

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सभ्यता को जन्म दिया? इन्हीं सवालों

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[संगीत] के जवाब के लिए वीडियो को अंत तक

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देखिएगा और अगर आप ऐसी रोचक और रिसर्च की

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हुई डॉक्यूमेंट्री पसंद करते हैं तो चैनल

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को सब्सक्राइब जरूर करिए क्योंकि ऐसी

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डॉक्यूमेंट्री बनाने में हमें घंटों मेहनत

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और रिसर्च करनी पड़ती है। एक ऐसी दुनिया

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की कल्पना कीजिए जहां इंसान तो क्या हमारे

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पूर्वजों [संगीत] का भी कोई नामोनिशान

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नहीं था। उस समय जिस जमीन पर आज हम और आप

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खड़े हैं, वह एशिया का हिस्सा नहीं थी।

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हमारा भारत एक टूटा हुआ, अकेला और वीरान

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जमीन का टुकड़ा था। यह अपने परिवार

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अफ्रीका से बिछड़ चुका था और हजारों

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किलोमीटर दूर एक विशाल समंदर के बीचों-बीच

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तैर रहा था। लाखों सालों तक भारत एक विशाल

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जहाज की तरह पानी को चीरता हुआ उत्तर दिशा

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की तरफ बढ़ता रहा। इसके सामने एक बहुत

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बड़ा समंदर था। टेथिस सागर। लेकिन इस जमीन

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[संगीत] के नीचे कुदरत की एक अदृश्य ताकत

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काम कर रही थी। जमीन के अंदर मैग्मा उभर

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रही थी जो भारत को [संगीत] इतनी तेज

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रफ्तार दी कि यह रुका नहीं और फिर वह घड़ी

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आई [संगीत] जिसने दुनिया का नक्शा हमेशा

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के लिए बदल दिया। भारत इस समुद्र को पार

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करते हुए सीधे यूरेशियन प्लेट तरफ परा और

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फिर वह महा टकराव कोजन हुआ। यह टक्कर इतनी

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भयानक थी कि इसने बीच के समंदर को ही निगल

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लिया। दो विशाल जमीनी प्लेटें आपस में

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भिड़ गई। दबाव इतना ज्यादा था कि धरती का

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सीना फट गया। चट्टाने [संगीत] टूटने के

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बजाय ऊपर की तरफ मुड़ने लगी। मलबा उठता

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गया और उठता ही गया जब तक कि उसने बादलों

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को नहीं छू लिया। यही था कुदरत की सबसे

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बड़ी दीवार। हिमालय का जन्म। इस नई दीवार

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ने सब कुछ बदल दिया। जो हवाएं पहले सीधी

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निकल जाती थी। हिमालय ने उन्हें रोक लिया।

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नतीजा भारत की प्यासी जमीन पर मानसून की

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पहली बारिश हुई। हिमालय की बर्फ पिघली और

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गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियां इस धरती

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को सिंचने लगा। देखते ही देखते लाखों

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सालों का यह उथल-पुथल शांत हुआ। जो जमीन

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कल तक पथरीली और वीरान थी। वो अब घने

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जंगलों, मीठे पानी और हरियाली से भर गई।

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करोड़ों साल तक मौसम में उतार-चढ़ाव के

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बाद भारत अब एक स्वर्ग बन चुका था। स्टेज

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पूरी तरह सज चुका था। इंसानों की स्वागत

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के लिए जंगल खामोश थे। नदियां बह रही थी,

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हवाएं चल रही थी। लेकिन इस जन्नत में अभी

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एक चीज की कमी थी। जीवन की अभी हम यानी

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आधुनिक इंसान पैदा भी नहीं हुए थे। तो फिर

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आखिर कौन थे वो अनजान मेहमान जो हमसे

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लाखों साल पहले [संगीत] इस भारत के पहले

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मालिक बने। चलिए उस गहरे राज से पर्दा

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उठाते हैं। भारत अब बदल चुका था। जिस जमीन

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पर कल तक समंदर की लहरें [संगीत] टकराती

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थी, वहां अब मीठे पानी की नदियां बह रही

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थी। जिस जमीन पर सिर्फ पत्थर थे, [संगीत]

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वहां अब ऐसा घना जंगल उग आया था जिसे भेद

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पाना सूरज की किरणों के लिए [संगीत] भी

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नामुमकिन था। यह वो भारत नहीं है जिसे आज

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आप जानते हैं। ना यहां कोई शहर था, ना

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[संगीत] गांव और ना ही आज जैसा कोई इंसान।

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यह एक अलग ही दुनिया थी। इस दुनिया में

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कानून सिर्फ एक था। जिसकी [संगीत] लाठी,

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उसकी भैंस नहीं बल्कि जिसका जबड़ा उसका

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राज। उस समय भारत की धरती पर इंसानों का

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नहीं बल्कि दानवों जॉइंट्स [संगीत] का

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राज्य था। अगर आप उस समय के जंगल में चलते

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तो आपका सामना आज के हाथियों से नहीं

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बल्कि उनके परदादाओं से होता। स्टिगोडन एक

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ऐसा विशालकाय जीव जिसके दांत 10 फीट तक

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लंबे होते थे। जब यह चलता था [संगीत] तो

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जमीन कांपती थी। नदियों में आज के मगरमच्छ

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नहीं बल्कि हेक्सा प्रोटोोडन तैरते थे। यह

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दरियाई घोड़े जैसा जानवर था। लेकिन इसका

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आकार किसी ट्रक से कम नहीं था। इसके जबड़े

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इतने मजबूत [संगीत]

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थे कि यह पत्थर को भी चबा सकता था। यह

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दुनिया ताकतवर जानवरों की थी। कमजोर के

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लिए यहां कोई जगह नहीं थी। हर झाड़ी के

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पीछे मौत छिपी थी। लेकिन इन्हीं विशाल

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जानवरों के भारी पैरों के बीच घास के अंदर

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एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। लाखों साल

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पहले अफ्रीका की जमीन पर एक नई मानव

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प्रजाति उभरी। इस प्रजाति का नाम था होमो

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इरेक्टस। यही वह इंसान था जिसने पहली बार

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पूरी तरह दो पैरों पर चलना शुरू किया। यह

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ना तो वानर थे और ना ही हम यानी

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होमोसेपियंस। यह घुमंतु थे। भोजन की तलाश

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में चलते-चलते यह अफ्रीका से बाहर निकले।

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रास्ते [संगीत] अनजान थे। ना कोई नक्शा था

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ना कोई मंजिल। बस पेट की आग थी जो उन्हें

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आगे धकेल रही थी और आज से करीब [संगीत] 15

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से 20 लाख साल पहले इन्हीं निडर यात्रियों

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के एक समूह ने भारत की धरती पर अपना पहला

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कदम रखा। यह सिर्फ एक कल्पना कहानी

00:05:15.057 --> 00:05:20.478
[संगीत] नहीं बल्कि इसका सबूत हमें अपने

00:05:17.279 --> 00:05:23.758
देश भारत में मिलता है। चेन्नई के पास एक

00:05:20.478 --> 00:05:26.240
जगह है अतिरम पक्कम। यहां जमीन के [संगीत]

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नीचे वैज्ञानिकों को पत्थरों का एक खजाना

00:05:26.240 --> 00:05:32.400
मिला। यह साधारण पत्थर नहीं थे। इन्हें

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तराशा गया था। इनके किनारे धारदार थे।

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वैज्ञानिकों ने जब [संगीत] इनकी उम्र पता

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की तो वे सन्न रह गए। यह औजार 15 लाख साल

00:05:37.983 --> 00:05:43.439
[संगीत] पुराने थे। यानी आधुनिक इंसान के

00:05:40.959 --> 00:05:46.000
पैदा होने से बहुत पहले। यहां कोई [संगीत]

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ऐसा था जो दिमाग का इस्तेमाल करना जानता

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था। और सबूत सिर्फ पत्थरों तक सीमित नहीं

00:05:48.879 --> 00:05:54.478
है। 1982 मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के

00:05:52.478 --> 00:05:57.519
हथनोरा [संगीत] गांव में एक

00:05:54.478 --> 00:05:59.918
आर्कियोलॉजिस्ट अरुण सोनाकिया को एक

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खोपड़ी [संगीत] का हिस्सा मिला। यह भारत

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के इतिहास की सबसे बड़ी खोज थी। यह खोपड़ी

00:06:02.874 --> 00:06:07.840
[संगीत] किसी जानवर की नहीं थी। यह एक

00:06:04.879 --> 00:06:10.639
मानव पूर्वज की थी। इसे नाम दिया गया।

00:06:07.839 --> 00:06:13.439
नर्मदा मानव यह लोग कैसे दिखते थे? इनका

00:06:10.639 --> 00:06:16.240
माथा हमसे छोटा था। यानी दिमाग थोड़ा कम

00:06:13.439 --> 00:06:19.918
विकसित था। लेकिन इनका जबड़ा बहुत मजबूत

00:06:16.240 --> 00:06:23.360
था। इनकी आइब्रास बाहर की तरफ निकली हुई

00:06:19.918 --> 00:06:26.240
थी। इनका शरीर किसी एथलीट जैसा गठीला था।

00:06:23.360 --> 00:06:29.680
इनके पास हमारी तरह भाषा नहीं थी। इनकी

00:06:26.240 --> 00:06:32.478
भाषा थी इशारे और आवाजें। इनका सबसे बड़ा

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हथियार था। [संगीत] हैंड एक्स एक नाशपाती

00:06:32.478 --> 00:06:38.399
के आकार का पत्थर जिसे यह अपनी मुट्ठी में

00:06:35.279 --> 00:06:41.038
पकड़ते थे। यही इनका चाकू था। यही इनका

00:06:38.399 --> 00:06:44.159
हथौड़ा था। बिना बंदूक, बिना लोहे के

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हथियार के। सिर्फ पत्थरों के दम पर यह लोग

00:06:44.160 --> 00:06:49.280
विशाल हाथियों और दरियाई घोड़ों का शिकार

00:06:46.639 --> 00:06:52.079
करते थे। यह डरते नहीं थे। इन्होंने भारत

00:06:49.279 --> 00:06:55.038
के हर कोने को छान मारा था। उत्तर से

00:06:52.079 --> 00:06:58.719
दक्षिण तक। नर्मदा के [संगीत] तट से लेकर

00:06:55.038 --> 00:07:01.279
गोदावरी के जंगलों तक इन्हीं का राज था।

00:06:58.720 --> 00:07:03.919
लाखों सालों [संगीत] तक। भारत के जंगलों

00:07:01.279 --> 00:07:06.399
में इन्हीं की हुंकार गूंजती रही। इन्हें

00:07:03.918 --> 00:07:09.519
लगा कि यह इस धरती के मालिक हैं। इन्होंने

00:07:06.399 --> 00:07:11.598
बाढ़ को हराया था, सूखे को हराया था और

00:07:09.519 --> 00:07:15.198
बड़े-बड़े जानवरों [संगीत] को हराया था।

00:07:11.598 --> 00:07:18.719
ऐसा लग रहा था कि इनका वंश अमर रहेगा।

00:07:15.199 --> 00:07:21.919
लेकिन उन्हें खबर नहीं थी। कुदरत अपनी

00:07:18.720 --> 00:07:25.759
आस्तीन में एक खंजर छिपाए बैठी थी। हजारों

00:07:21.918 --> 00:07:29.198
मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के एक

00:07:25.759 --> 00:07:32.720
द्वीप पर धरती के नीचे एक दानव जाग रहा

00:07:29.199 --> 00:07:35.598
था। यह एक ऐसा टाइम बम था जिसकी टिकटिक

00:07:32.720 --> 00:07:37.759
शुरू हो चुकी थी और जब यह फटने वाला था तो

00:07:35.598 --> 00:07:40.560
यह इन ताकतवर [संगीत] आदिमानवों की पूरी

00:07:37.759 --> 00:07:43.840
दुनिया को सिर्फ राख के ढेर में बदलने

00:07:40.560 --> 00:07:46.399
वाला था। वो क्या चीज थी जिसने भारत के

00:07:43.839 --> 00:07:50.294
पहले मालिकों को इतिहास के पन्नों से मिटा

00:07:46.399 --> 00:07:53.038
दिया और कैसे उस विनाश ने हमारे यानी

00:07:50.295 --> 00:07:55.919
[संगीत] आधुनिक इंसान के लिए रास्ता खोला

00:07:53.038 --> 00:07:59.598
जो आज खुद को हम भारतीय कहते हैं। हजारों

00:07:55.918 --> 00:08:02.878
मील दूर समंदर के उस पार इंडोनेशिया के

00:07:59.598 --> 00:08:06.319
सुमात्रा द्वीप पर धरती का सीना फटने वाला

00:08:02.879 --> 00:08:09.439
था। एक पहाड़ नहीं बल्कि एक राक्षस जाग

00:08:06.319 --> 00:08:12.319
चुका था। टोबा सुपर वोल्केनो की धमाका

00:08:09.439 --> 00:08:15.279
इतना जोरदार था कि इसकी आवाज 3000

00:08:12.319 --> 00:08:17.919
किलोमीटर दूर भारत तक सुनाई दी होगी।

00:08:15.279 --> 00:08:20.638
हिमालय की चोटियां भी कांप उठी होंगी।

00:08:17.918 --> 00:08:24.560
लेकिन असली खतरा वो आवाज नहीं थी। असली

00:08:20.639 --> 00:08:27.680
खतरा वो था जो हवा के साथ उड़कर आ रहा था।

00:08:24.560 --> 00:08:31.038
कुछ ही घंटों में भारत का नीला आसमान गायब

00:08:27.680 --> 00:08:33.278
हो गया। दोपहर के वक्त रात जैसा गुप

00:08:31.038 --> 00:08:37.278
अंधेरा छा गया और फिर आसमान [संगीत] से

00:08:33.278 --> 00:08:40.075
गिरने लगी। सफेद मौत यह बर्फ नहीं थी। यह

00:08:37.278 --> 00:08:42.080
राख वोल्केनिक ऐश थी। कल्पना कीजिए।

00:08:40.075 --> 00:08:45.120
[संगीत] जब उन आदिमानवों ने सांस ली होगी

00:08:42.080 --> 00:08:48.399
तो उनका दम घुटने लगा होगा। नदियां जो कल

00:08:45.120 --> 00:08:52.000
तक जीवन देती थी। अब कीचड़ और जहर बन चुकी

00:08:48.399 --> 00:08:55.360
थी। पेड़-पौधे मर गए। जंगल वीरान हो गए।

00:08:52.000 --> 00:08:58.240
भारत जो एक गर्म देश था। अचानक बर्फ जैसा

00:08:55.360 --> 00:09:00.879
ठंडा पड़ गया। इसे विज्ञान कहता है

00:08:58.240 --> 00:09:04.480
वोल्केनिक विंटर। अब यहां एक बहुत बड़ा

00:09:00.879 --> 00:09:07.759
सवाल उठता है। वो आदिमानव जो लाखों सालों

00:09:04.480 --> 00:09:10.800
से यहां के बेताज बादशाह थे। वो इस मुसीबत

00:09:07.759 --> 00:09:13.600
से क्यों हार गए? वे तो बहुत ताकतवर थे।

00:09:10.799 --> 00:09:17.199
फिर उनका वंश क्यों मिट गया? उनकी मौत का

00:09:13.600 --> 00:09:20.879
कारण कोई और नहीं बल्कि उनका अपना शरीर और

00:09:17.200 --> 00:09:24.959
दिमाग बन गया। देखिए उनके हारने की तीन

00:09:20.879 --> 00:09:27.838
बड़ी वजह थी। पहली वजह उनके शरीर की बनावट

00:09:24.958 --> 00:09:31.359
उनका शरीर पहलवानों जैसा भारी और गठीला

00:09:27.839 --> 00:09:33.839
था। यह शरीर एक बड़ी गाड़ी की तरह था जिसे

00:09:31.360 --> 00:09:38.000
चलने के लिए बहुत ज्यादा पेट्रोल यानी

00:09:33.839 --> 00:09:41.279
एनर्जी चाहिए थी। जब तक जंगल हरेभरे थे सब

00:09:38.000 --> 00:09:43.919
ठीक था। लेकिन जब खाना खत्म हुआ तो उनका

00:09:41.278 --> 00:09:47.039
बड़ा शरीर ही उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन

00:09:43.919 --> 00:09:50.159
गया। वे कम खाने में जिंदा नहीं रह सकते

00:09:47.039 --> 00:09:53.838
थे। उनकी ताकत ही उनकी कमजोरी बन गई।

00:09:50.159 --> 00:09:56.319
दूसरी वजह थी उनके पुराने हथियार। कड़ी

00:09:53.839 --> 00:09:59.360
सर्दी और बदलाव के बाद जंगलों [संगीत] से

00:09:56.320 --> 00:10:01.951
बड़े जानवर खत्म हो गए। लेकिन उनके हाथों

00:09:59.360 --> 00:10:04.159
में अब भी भारी पत्थर के हथियार ही थे

00:10:01.951 --> 00:10:07.120
[संगीत] जो सिर्फ बड़े जानवरों के लिए बने

00:10:04.159 --> 00:10:11.199
थे। छोटे जानवरों के सामने यह हथियार

00:10:07.120 --> 00:10:13.759
बेकार हो गए। और तीसरी सबसे बड़ी वजह कल

00:10:11.200 --> 00:10:17.600
की चिंता ना करना दिक्कत यह थी कि वे

00:10:13.759 --> 00:10:19.919
सिर्फ आज में जीते थे। उनके पास हम जैसा

00:10:17.600 --> 00:10:22.320
दिमाग नहीं था जो मुसीबत आने से पहले

00:10:19.919 --> 00:10:24.799
प्लानिंग कर सके। उन्हें [संगीत] खाना जमा

00:10:22.320 --> 00:10:28.160
करना नहीं आता था। उन्हें यह समझ नहीं आया

00:10:24.799 --> 00:10:31.679
कि कल क्या होगा और देखते ही देखते एक

00:10:28.159 --> 00:10:35.039
पूरी प्रजाति जो कल तक भारत की मालिक थी

00:10:31.679 --> 00:10:37.679
वो भूख ठंड और अंधेरे में घुटघुट कर खत्म

00:10:35.039 --> 00:10:40.799
हो गई। यह विनाश अंत नहीं था। [संगीत] यह

00:10:37.679 --> 00:10:43.439
एक नई शुरुआत की तैयारी थी। राख से ढकी इस

00:10:40.799 --> 00:10:46.879
भारत की धरती पर अब एक नई प्रजाति कदम

00:10:43.440 --> 00:10:50.760
रखने वाली थी। एक ऐसी प्रजाति जिससे आज हम

00:10:46.879 --> 00:10:50.759
सब जुड़े हैं होमोसेपियंस।

00:10:51.839 --> 00:10:57.627
टोबा का महाविस्फोट सिर्फ भारत को ही नहीं

00:10:54.559 --> 00:11:00.479
झुलसा गया था। सैकड़ों साल बाद भी उसकी

00:10:57.626 --> 00:11:03.439
[संगीत] राख और सर्दी की मार अफ्रीका तक

00:11:00.480 --> 00:11:06.159
पहुंची ही चुकी। जिस धरती ने लाखों सालों

00:11:03.440 --> 00:11:10.160
से इंसान को पाला [संगीत] था, वही धरती अब

00:11:06.159 --> 00:11:12.399
उसे बोझ लगने लगी थी। जंगल सूख रहे थे और

00:11:10.159 --> 00:11:14.399
इसी धरती पर एक प्रजाति [संगीत] अब सांस

00:11:12.399 --> 00:11:15.919
लेने के लिए भी संघर्ष कर रही थी।

00:11:14.399 --> 00:11:18.958
होमोसेपियंस।

00:11:15.919 --> 00:11:21.919
जरा उस समय के इंसान के बारे में सोचिए।

00:11:18.958 --> 00:11:24.799
वह कोई योद्धा या विजेता नहीं था। वह बस

00:11:21.919 --> 00:11:27.679
एक पिता था जो सुबह शिकार पर निकलता और

00:11:24.799 --> 00:11:31.120
शाम को खाली हाथ झुकी हुई नजरों के साथ

00:11:27.679 --> 00:11:33.651
लौटता था। वह एक मां थी जो अपने बच्चे की

00:11:31.120 --> 00:11:37.480
प्यास बुझाने के लिए बूंदबूंद पानी के लिए

00:11:33.652 --> 00:11:37.480
[संगीत] तरस रही थी।

00:11:38.639 --> 00:11:45.199
अफ्रीका उनका अपना घर अब उन्हें पाल नहीं

00:11:41.759 --> 00:11:47.039
सकता था। उनके पास दो ही रास्ते थे। या तो

00:11:45.200 --> 00:11:49.759
यहीं [संगीत] रुक कर धीरे-धीरे इतिहास से

00:11:47.039 --> 00:11:52.647
मिट जाएं या फिर उस अनजान क्षितिज की ओर

00:11:49.759 --> 00:11:55.600
बढ़े जहां शायद मौत हो। लेकिन शायद

00:11:52.648 --> 00:11:57.888
[संगीत] जिंदगी की एक उम्मीद भी और फिर

00:11:55.600 --> 00:12:00.320
भूख ने उन्हें वह फैसला लेने पर मजबूर

00:11:57.888 --> 00:12:03.200
[संगीत] कर दिया जो शायद इंसानियत के

00:12:00.320 --> 00:12:07.200
इतिहास का सबसे बढ़ा फैसला था। एक पूरा

00:12:03.200 --> 00:12:10.320
जनसमूह बच्चे, बूढ़े, जवान अपना सब कुछ

00:12:07.200 --> 00:12:13.440
समेट कर चल पड़े। चलते-चलते वे जमीन के

00:12:10.320 --> 00:12:16.480
आखिरी छोर पर आ गए। सामने लाल सागर था

00:12:13.440 --> 00:12:18.720
जहां पानी ही पानी और आगे कुछ भी नजर नहीं

00:12:16.480 --> 00:12:22.079
आ रहा था। विज्ञान कहता [संगीत] है कि उस

00:12:18.720 --> 00:12:25.440
समय हिमयुग आइस एज के कारण समंदर का स्तर

00:12:22.078 --> 00:12:28.159
नीचे था। अफ्रीका और अरब के बीच की दूरी

00:12:25.440 --> 00:12:30.639
आज के मुकाबले [संगीत] बहुत कम थी। लेकिन

00:12:28.159 --> 00:12:33.679
उन लोगों के पास ना कोई नक्शा था, ना कोई

00:12:30.639 --> 00:12:36.720
बड़ी नाव। उनके लिए वह छोटी सी दूरी भी

00:12:33.679 --> 00:12:40.359
मौत के कुएं जैसी थी। इसे आज हम बाब अल

00:12:36.720 --> 00:12:40.360
मंदब कहते हैं।

00:12:42.480 --> 00:12:47.759
कल्पना कीजिए उस डर की जब उन्होंने सूखी

00:12:45.200 --> 00:12:50.720
लकड़ियों और बांस से बने डगमगाते राफ्टर्स

00:12:47.759 --> 00:12:53.439
पर पहली बार अपने बच्चों को बैठाया होगा।

00:12:50.720 --> 00:12:56.000
ना जाने कितने पिता ना जाने कितनी माताएं

00:12:53.440 --> 00:12:59.040
उस सफर में लहरों में समा गई। ना जाने

00:12:56.000 --> 00:13:02.078
कितनों का हाथ अपनों से छूट गया जो बच गए।

00:12:59.039 --> 00:13:04.958
वे लहरों से लड़कर अरब के तट आज का यमन पर

00:13:02.078 --> 00:13:07.838
पहुंच गए। वे जिंदा तो थे लेकिन वे अब

00:13:04.958 --> 00:13:11.199
बेघर थे। उनका घर अफ्रीका हमेशा के लिए

00:13:07.839 --> 00:13:14.160
पीछे छूट चुका था।

00:13:11.200 --> 00:13:17.600
पर उनका इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ था।

00:13:14.159 --> 00:13:19.519
अरब की जमीन भी सूखी और पथरीली थी।

00:13:17.600 --> 00:13:22.399
रेगिस्तान उन्हें निगलने के लिए तैयार

00:13:19.519 --> 00:13:25.839
खड़ा था। इसलिए उन्होंने एक समझदारी

00:13:22.399 --> 00:13:28.879
दिखाई। वे जमीन के अंदर नहीं गए। वे समंदर

00:13:25.839 --> 00:13:32.560
के किनारे-किनारे चलते रहे। इसे हम तटीय

00:13:28.879 --> 00:13:36.320
प्रवास कोस्टल माइग्रेशन कहते हैं। समंदर

00:13:32.559 --> 00:13:39.039
जिसने उनके अपनों को छीना था। अब वही उनका

00:13:36.320 --> 00:13:42.034
सहारा बन गया। उसने उन्हें खाना दिया।

00:13:39.039 --> 00:13:44.958
मछलियां, केकड़े, सीपियां वे चलते रहे।

00:13:42.033 --> 00:13:47.838
[संगीत] एक साल नहीं, 100 साल नहीं बल्कि

00:13:44.958 --> 00:13:50.159
हजारों सालों तक यह सफर एक पीढ़ी की नहीं

00:13:47.839 --> 00:13:53.360
कई पीढ़ियों तक पूर्व दिशा की ओर चलते

00:13:50.159 --> 00:13:57.198
रहे। बस एक ही उम्मीद में कि कहीं तो ऐसी

00:13:53.360 --> 00:13:59.600
जमीन होगी जो घर जैसी लगे। और फिर आज से

00:13:57.198 --> 00:14:02.399
लगभग 65,000 [संगीत] साल पहले, उन

00:13:59.600 --> 00:14:04.959
यात्रियों के वंशजों को हवा में एक बदलाव

00:14:02.399 --> 00:14:08.320
महसूस हुआ। यह धूल की आंधी [संगीत] नहीं

00:14:04.958 --> 00:14:10.638
थी। यह ठंडी हवा थी। वे भारत की दहलीज पर

00:14:08.320 --> 00:14:12.959
खड़े थे। टोबा की [संगीत] राख जिसने

00:14:10.639 --> 00:14:16.639
हजारों साल पहले यहां जीवन खत्म कर दिया

00:14:12.958 --> 00:14:19.838
था। अब वही राख उपजाऊ मिट्टी बन चुकी थी।

00:14:16.639 --> 00:14:23.039
कुदरत ने अपने घाव भर लिए थे। सूखे पेड़ों

00:14:19.839 --> 00:14:26.000
की जगह हरेभरे जंगलों ने ले ली थी। नदियां

00:14:23.039 --> 00:14:28.538
मीठे पानी से लबालब बह रही थी। जब उन थके

00:14:26.000 --> 00:14:31.198
हुए यात्रियों ने सिंधु और सरस्वती की

00:14:28.538 --> 00:14:34.198
[संगीत] उस हरीभरी धरती पर पहला कदम रखा

00:14:31.198 --> 00:14:34.198
होगा।

00:14:36.799 --> 00:14:42.399
कहानी का सुखद अंत अभी नहीं हुआ था।

00:14:39.839 --> 00:14:45.440
उन्हें लगा कि उन्हें स्वर्ग मिल गया है।

00:14:42.399 --> 00:14:47.440
लेकिन उन्हें खबर नहीं थी कि यह स्वर्ग भी

00:14:45.440 --> 00:14:50.720
उनकी एक कड़ी [संगीत] परीक्षा लेने वाला

00:14:47.440 --> 00:14:52.880
था। अफ्रीका के खुले मैदानों में वे दूर

00:14:50.720 --> 00:14:56.160
तक [संगीत] देख सकते थे। खतरे को भांप

00:14:52.879 --> 00:14:59.759
सकते थे। लेकिन भारत भारत के जंगल [संगीत]

00:14:56.159 --> 00:15:02.719
घने थे। मिस्टीरियस थे। यहां हर झाड़ी के

00:14:59.759 --> 00:15:05.120
पीछे मौत छिपी थी। यहां के विशालकाय हाथी

00:15:02.720 --> 00:15:08.240
और दुनिया के सबसे खूंखार बाघ [संगीत] उन

00:15:05.120 --> 00:15:11.600
अजनबियों को घूर रहे थे। रात होते ही यह

00:15:08.240 --> 00:15:13.839
जंगल एक भूल भुलैया बन जाता था। खुले

00:15:11.600 --> 00:15:17.009
आसमान [संगीत] के नीचे सोना नामुमकिन था

00:15:13.839 --> 00:15:19.600
तो सवाल यह है उस पहली रात उस अनजान जंगल

00:15:17.009 --> 00:15:22.000
[संगीत] में हमारे पूर्वज जिंदा कैसे रहे?

00:15:19.600 --> 00:15:24.959
और भारत की जमीन पर इंसान [संगीत] ने अपनी

00:15:22.000 --> 00:15:27.360
पहली सुरक्षा कैसे बनाई? अफ्रीका से मीलों

00:15:24.958 --> 00:15:30.559
पैदल चलकर आए उन थके हुए यात्रियों के

00:15:27.360 --> 00:15:32.959
लिए। भारत का घना जंगल किसी मौत के कुएं

00:15:30.559 --> 00:15:35.518
से कम [संगीत] नहीं था। यहां खुले आसमान

00:15:32.958 --> 00:15:38.799
के नीचे सोने का मतलब था सीधे मौत [संगीत]

00:15:35.519 --> 00:15:41.839
को दावत देना। उन्हें एक ऐसी जगह चाहिए थी

00:15:38.799 --> 00:15:44.559
जहां दीवारें हो लेकिन दरवाजा ना हो और

00:15:41.839 --> 00:15:47.199
मध्य भारत के [संगीत] जंगलों में कुदरत ने

00:15:44.559 --> 00:15:49.359
उन्हें अपना सबसे नायाब तोहफा दिया।

00:15:47.198 --> 00:15:52.399
भीमबेट [संगीत] का यह साधारण गुफाएं नहीं

00:15:49.360 --> 00:15:54.959
थी। यह पत्थर के प्राकृतिक महल थे। इन

00:15:52.399 --> 00:15:57.600
विशाल चट्टानों ने उन्हें मूसलाधार बारिश

00:15:54.958 --> 00:16:01.039
से बचाया। कड़ाके की ठंड से [संगीत] बचाया

00:15:57.600 --> 00:16:04.959
और सबसे जरूरी रात के अंधेरे में उन

00:16:01.039 --> 00:16:08.719
खूंखार जानवरों से बचाया।

00:16:04.958 --> 00:16:11.599
इतिहास में पहली बार इंसान को घर शब्द का

00:16:08.720 --> 00:16:14.480
असली मतलब समझ आया था। यह गुफा सिर्फ

00:16:11.600 --> 00:16:18.000
पत्थरों का ढेर नहीं थी। यह इंसानियत का

00:16:14.480 --> 00:16:20.320
पहला [संगीत] किला थी। जरा कल्पना कीजिए।

00:16:18.000 --> 00:16:23.440
आज से 60 हजार [संगीत] साल पहले की एक

00:16:20.320 --> 00:16:26.399
सुबह की तब कोई अलार्म क्लॉक नहीं थी।

00:16:23.440 --> 00:16:30.000
चिड़ियों की चहचहाट और सूरज की पहली किरण

00:16:26.399 --> 00:16:33.679
ही उनकी घड़ी थी। जैसे ही आंख खुलती थी तो

00:16:30.000 --> 00:16:36.958
सबसे पहला विचार क्या आता होगा? शायद यही

00:16:33.679 --> 00:16:40.078
क्या हम सब जिंदा हैं? दिन की शुरुआत चाय

00:16:36.958 --> 00:16:43.198
या कॉफी से नहीं होती थी। सबसे पहली जरूरत

00:16:40.078 --> 00:16:46.559
थी पानी। लेकिन उस दौर में नदी तक जाना भी

00:16:43.198 --> 00:16:49.039
एक फौजी मिशन जैसा था। कबीले के मर्द पहले

00:16:46.559 --> 00:16:51.278
बाहर निकलकर मुआयना करते थे कि कहीं

00:16:49.039 --> 00:16:54.639
झाड़ियों में कोई तेंदुआ तो घात लगाकर

00:16:51.278 --> 00:16:57.278
नहीं बैठा। जब रास्ता साफ होता तभी

00:16:54.639 --> 00:17:01.278
महिलाएं और बच्चे पानी के लिए नीचे उतरते

00:16:57.278 --> 00:17:04.880
थे। हर सुबह जिंदगी और मौत के बीच का एक

00:17:01.278 --> 00:17:07.919
जुआ थी। लेकिन रात के अंधेरे में उनका

00:17:04.880 --> 00:17:10.240
सबसे बड़ा रक्षक कोई इंसान नहीं था। वो थी

00:17:07.919 --> 00:17:13.280
आग। आग सिर्फ [संगीत] खाना पकाने के लिए

00:17:10.240 --> 00:17:15.759
नहीं थी। यह उनकी सिक्योरिटी गार्ड थी। जब

00:17:13.279 --> 00:17:18.078
तक गुफा के द्वार पर आग जलती रहती थी।

00:17:15.759 --> 00:17:20.806
जंगल का कोई भी जानवर अंदर आने की हिम्मत

00:17:18.078 --> 00:17:23.438
नहीं करता था। और यही आग उनका सोशल

00:17:20.806 --> 00:17:26.318
[संगीत] मीडिया भी थी। शाम को शिकार के

00:17:23.439 --> 00:17:29.200
बाद पूरा कबीला इसी आग के चारों तरफ बैठता

00:17:26.318 --> 00:17:31.279
था। यही कहानियां सुनाई जाती थी। यहीं दुख

00:17:29.200 --> 00:17:34.080
सुख [संगीत] बांटे जाते थे। इस आग की

00:17:31.279 --> 00:17:37.519
गर्मी ने इंसान को एक दूसरे से जोड़ दिया

00:17:34.079 --> 00:17:40.079
था। लेकिन भारत बहुत विशाल था। जैसे-जैसे

00:17:37.519 --> 00:17:42.639
इंसान फैला उसे अलग-अलग चुनौतियों का

00:17:40.079 --> 00:17:45.119
सामना करना पड़ा। विंध्य और हिमालय के पास

00:17:42.640 --> 00:17:47.200
रहने वालों को ठंड का सामना करना पड़ा।

00:17:45.119 --> 00:17:50.558
इसलिए वे गहरी गुफाओं [संगीत] में रहते थे

00:17:47.200 --> 00:17:52.798
और आग पर ज्यादा निर्भर थे। वहीं जो लोग

00:17:50.558 --> 00:17:56.000
साउथ [संगीत] इंडिया में कर्नाटक आंध्र की

00:17:52.798 --> 00:17:58.400
तरफ गए वहां मौसम गर्म था। वहां उन्हें

00:17:56.000 --> 00:18:01.119
गहरी [संगीत] गुफाओं की जरूरत नहीं थी। वे

00:17:58.400 --> 00:18:03.840
ग्रेनाइट की पहाड़ियों के नीचे या कभी-कभी

00:18:01.119 --> 00:18:06.639
खुले में झोपड़ियां बनाकर रहते थे। वहां

00:18:03.839 --> 00:18:09.119
जीवन थोड़ा खुला था। लेकिन खतरा वहां भी

00:18:06.640 --> 00:18:12.000
कम [संगीत] नहीं था। उस दौर में कोई राजा

00:18:09.119 --> 00:18:14.639
नहीं था। कोई नौकर नहीं था। सब बराबर थे।

00:18:12.000 --> 00:18:17.038
अगर कोई बीमार पड़ता तो पूरा समूह उसकी

00:18:14.640 --> 00:18:19.759
देखभाल करता। अगर कोई बच्चा [संगीत] अनाद

00:18:17.038 --> 00:18:22.480
हो जाता तो पूरा कबीला उसे गोद ले लेता।

00:18:19.759 --> 00:18:25.839
वे समझ चुके थे कि इस खतरनाक दुनिया में

00:18:22.480 --> 00:18:28.798
अकेला इंसान कमजोर है। लेकिन एक समूह अजय

00:18:25.839 --> 00:18:32.000
है। [संगीत] यही एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत

00:18:28.798 --> 00:18:35.279
थी। उनके पास घर था। उनके पास आग थी। उनके

00:18:32.000 --> 00:18:38.880
पास एक दूसरे का साथ था। लेकिन एक चीज की

00:18:35.279 --> 00:18:42.000
कमी थी। पेट की भूख। भारत के जानवर तेज

00:18:38.880 --> 00:18:44.640
थे। और उनके पुराने भारी हथियार अब काम के

00:18:42.000 --> 00:18:46.880
नहीं रहे थे। तो फिर सवाल है उन्होंने खुद

00:18:44.640 --> 00:18:49.232
की अस्तित्व बचाए रखने के लिए भारी

00:18:46.880 --> 00:18:52.240
पत्थरों से आगे बढ़कर पहला तेज ब्लेड

00:18:49.231 --> 00:18:54.879
[संगीत] कैसे बनाया और उनकी वह मिसाइल

00:18:52.240 --> 00:18:58.160
टेक्नोलॉजी क्या था जो पल भर में जानवरों

00:18:54.880 --> 00:19:00.400
को खत्म कर देता था। आखिर कैसे? पत्थरों

00:18:58.160 --> 00:19:03.679
को तोड़ने वाले इंसान [संगीत] ने दुनिया

00:19:00.400 --> 00:19:06.640
का पहला ब्लेड बनाया। समय बदल रहा था।

00:19:03.679 --> 00:19:09.519
भारत के जंगल बदल रहे थे। अब वो विशाल और

00:19:06.640 --> 00:19:12.559
सुस्त जानवर जैसे स्टेगोडन [संगीत] इतिहास

00:19:09.519 --> 00:19:15.038
बन चुके थे। उनकी जगह ले ली थी। बिजली की

00:19:12.558 --> 00:19:18.079
रफ्तार से दौड़ने वाले हिरणों, चालाक

00:19:15.038 --> 00:19:20.879
खरगोशों और आसमान में उड़ने वाले पक्षियों

00:19:18.079 --> 00:19:24.240
ने। हमारे पूर्वजों [संगीत] के हाथ में जो

00:19:20.880 --> 00:19:26.320
भारीभरकम पत्थर के हथियार थे, वो इन नए

00:19:24.240 --> 00:19:29.919
जानवरों के सामने खिलौने [संगीत] बन चुके

00:19:26.319 --> 00:19:31.599
थे। जरा सोचिए क्या एक भारी पत्थर से

00:19:29.919 --> 00:19:35.840
उड़ती चिड़िया को मारा जा [संगीत] सकता

00:19:31.599 --> 00:19:38.879
है? नामुमकिन रोज शाम को जब शिकारी खाली

00:19:35.839 --> 00:19:41.359
हाथ थके हारे गुफा में लौटते तो वहां

00:19:38.880 --> 00:19:43.919
सन्नाटा [संगीत] छा जाता।

00:19:41.359 --> 00:19:46.798
कबीले का लीडर अपनी भूखी नस्ल को देखता

00:19:43.919 --> 00:19:50.640
होगा तो उसकी आंखों में सिर्फ एक ही डर

00:19:46.798 --> 00:19:53.839
होता होगा। अगर हमने बदलने में देर की तो

00:19:50.640 --> 00:19:56.000
हमारा इतिहास यहीं खत्म हो जाएगा।

00:19:53.839 --> 00:19:59.359
इंसान को जिंदा रहने के [संगीत] लिए एक

00:19:56.000 --> 00:20:03.679
तकनीकी क्रांति टेक रिवॉल्यूशन की जरूरत

00:19:59.359 --> 00:20:07.359
थी। और फिर संकट की उसी घड़ी में इंसान के

00:20:03.679 --> 00:20:10.320
दिमाग की बत्ती जली। उसने सोचा हथियार का

00:20:07.359 --> 00:20:13.199
बड़ा होना जरूरी नहीं। उसका तेज और सटीक

00:20:10.319 --> 00:20:16.079
होना जरूरी है। उसने पत्थरों को तोड़ना

00:20:13.200 --> 00:20:19.360
बंद किया और उन्हें तराशना शुरू किया।

00:20:16.079 --> 00:20:22.240
उसने बनाए माइक्रोलथित इंच भर के छोटे

00:20:19.359 --> 00:20:24.399
ब्लेड जैसे धारदार टुकड़े। पुरातत्व

00:20:22.240 --> 00:20:26.640
विज्ञान [संगीत] इसे सिर्फ पत्थर कहता है।

00:20:24.400 --> 00:20:29.759
लेकिन असल में यह उस जमाने की मिसाइल

00:20:26.640 --> 00:20:31.840
टेक्नोलॉजी थी। उन्होंने इन नन्हे जानलेवा

00:20:29.759 --> 00:20:35.279
पत्थरों को लकड़ियों और हड्डियों की नोक

00:20:31.839 --> 00:20:38.319
पर चिपकाया। अब उनके हाथ में भाला था। तीर

00:20:35.279 --> 00:20:41.839
और कमान था। अब वे झाड़ियों में छिपकर

00:20:38.319 --> 00:20:45.200
मीलों दूर से बिना आहट किए तेज रफ्तार

00:20:41.839 --> 00:20:48.399
हिरण का सीना चीर सकते थे।

00:20:45.200 --> 00:20:50.420
यह सिर्फ कहानी नहीं है। आज भी राजस्थान

00:20:48.400 --> 00:20:51.038
के बाघोर और मध्य प्रदेश के आदमगढ़

00:20:50.420 --> 00:20:53.679
[संगीत]

00:20:51.038 --> 00:20:56.798
की मिट्टी में दबे यह हजारों साल पुराने

00:20:53.679 --> 00:20:59.840
नन्हे हथियार गवाही देते हैं कि इंसान ने

00:20:56.798 --> 00:21:03.200
अपने बाहुबल से नहीं बल्कि अपनी अक्ल से

00:20:59.839 --> 00:21:05.599
अपनी भूख को हरा दिया था। क्या आप मान

00:21:03.200 --> 00:21:08.960
सकते हैं कि आज का सूखा महाराष्ट्र कभी

00:21:05.599 --> 00:21:11.918
शुतुरमुर्गों ऑस्ट्रीचेस का घर था? जी

00:21:08.960 --> 00:21:14.798
हां, महाराष्ट्र के पाटनी गांव में हमें

00:21:11.919 --> 00:21:18.000
शुतुरमुर्ग के अंडों के 25,000 साल पुराने

00:21:14.798 --> 00:21:20.879
छिलके मिले हैं। एक शुतुरमुर्ग का अंडा

00:21:18.000 --> 00:21:24.640
मुर्गी के 24 अंडों के बराबर होता था।

00:21:20.880 --> 00:21:27.919
सोचिए एक अंडा और पूरे परिवार का पेट भर

00:21:24.640 --> 00:21:30.320
गया। यह उनका सबसे बड़ा खजाना था। वे ना

00:21:27.919 --> 00:21:32.960
सिर्फ इसे खाते थे बल्कि इसके मजबूत

00:21:30.319 --> 00:21:35.918
छिलकों को पानी पीने के प्याले बोल्स की

00:21:32.960 --> 00:21:38.720
तरह इस्तेमाल करते थे। लेकिन जंगल में

00:21:35.919 --> 00:21:40.880
सिर्फ शिकार नहीं चल रहा था। गुफाओं के

00:21:38.720 --> 00:21:44.159
बाहर महिलाओं [संगीत] ने एक और मोर्चा

00:21:40.880 --> 00:21:45.919
संभाला हुआ था। जंगल हरियाली से भरा तो था

00:21:44.159 --> 00:21:48.559
लेकिन हर पत्ती [संगीत] खाने लायक नहीं

00:21:45.919 --> 00:21:51.679
थी। हजारों सालों के तजुर्बे से उन्होंने

00:21:48.558 --> 00:21:55.359
सीखा कि कौन सा कंदमूल मीठा है और कौन सा

00:21:51.679 --> 00:21:59.280
जंगली चावल पकाया जा सकता है। यही वो

00:21:55.359 --> 00:22:02.479
सिलेक्शन था जो आगे चलकर खेती एग्रीकल्चर

00:21:59.279 --> 00:22:05.079
की नींव बनने वाला था। वे धीरे-धीरे समझ

00:22:02.480 --> 00:22:07.759
रहे थे कि नेचर की सुपर मार्केट से

00:22:05.079 --> 00:22:11.119
[संगीत] क्या खरीदना है। उस दौर में पैसा

00:22:07.759 --> 00:22:14.158
नहीं था। बैंक नहीं थे। लेकिन एक इकॉनमी

00:22:11.119 --> 00:22:17.439
शुरू हो चुकी थी। यह इकॉनमी भरोसे पर चलती

00:22:14.159 --> 00:22:20.799
थी। नियम कड़ा था। अगर आज शिकार तुम लाए

00:22:17.440 --> 00:22:24.159
हो तो तुम अकेले नहीं खाओगे। तुम बांटोगे।

00:22:20.798 --> 00:22:26.400
क्यों? क्योंकि कल शायद तुम खाली हाथ

00:22:24.159 --> 00:22:29.440
लौटो। तब कोई और तुम्हें अपना निवाला

00:22:26.400 --> 00:22:32.590
देगा। इसे आज हम शेयरिंग कहते हैं। यही वह

00:22:29.440 --> 00:22:36.080
आदत थी जिसने जानवरों की भीड़ को इंसानों

00:22:32.589 --> 00:22:39.119
[संगीत] का समाज बना दिया। लेकिन जंगल का

00:22:36.079 --> 00:22:42.879
सबसे कीमती और ताकतवर खजाना जमीन पर नहीं

00:22:39.119 --> 00:22:45.279
बल्कि हवा में झूलता था। सैकड़ों फीट ऊपर

00:22:42.880 --> 00:22:47.919
ऊंची और जानलेवा सीधी खड़ी चट्टानों पर

00:22:45.279 --> 00:22:50.399
था। शहद भीमबेटका की दीवारों पर मिले

00:22:47.919 --> 00:22:53.520
चित्र हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज

00:22:50.400 --> 00:22:56.880
सिर्फ ताकतवर ही नहीं बल्कि बेहद चालाक भी

00:22:53.519 --> 00:23:00.079
थे। शहद पाना शेर का शिकार करने से भी

00:22:56.880 --> 00:23:03.679
ज्यादा खतरनाक था।

00:23:00.079 --> 00:23:06.960
जरा सोचिए उस आदिमानव के पास आज की तरह

00:23:03.679 --> 00:23:09.679
कोई सेफ्टी गियर नहीं था। वे पेड़ों की

00:23:06.960 --> 00:23:13.200
मजबूत लताओं और रेशों से रस्सियां बनाते

00:23:09.679 --> 00:23:15.679
थे। एक तरफ नीचे हजारों फीट गहरी खाई होती

00:23:13.200 --> 00:23:18.880
थी और दूसरी तरफ हजारों गुस्साए

00:23:15.679 --> 00:23:21.200
मधुमक्खियां। लेकिन इंसान ने दिमाग लगाया।

00:23:18.880 --> 00:23:24.640
वे जानते थे कि मधुमक्खियों से लड़कर नहीं

00:23:21.200 --> 00:23:27.600
जीता जा सकता। इसलिए उन्होंने धुएं स्मोक

00:23:24.640 --> 00:23:30.080
का इस्तेमाल किया। वे मशाल जलाकर धुएं से

00:23:27.599 --> 00:23:32.158
मधुमक्खियों को शांत करते और फिर बहुत

00:23:30.079 --> 00:23:35.678
सावधानी [संगीत] से छत्ते से शहद निकाल

00:23:32.159 --> 00:23:38.880
लेते। यह सिर्फ स्वाद के लिए नहीं था। शहद

00:23:35.679 --> 00:23:42.080
उस दौर का सुपर एनर्जी फूड था। कुदरत का

00:23:38.880 --> 00:23:44.960
दिया हुआ सबसे शुद्ध ग्लूकोस। पेट की आग

00:23:42.079 --> 00:23:47.599
बुझ चुकी थी। लेकिन दिमाग में एक नई हलचल

00:23:44.960 --> 00:23:49.919
शुरू हो गई थी। आज भी मध्य प्रदेश की

00:23:47.599 --> 00:23:52.798
भीमबेटका [संगीत] की चट्टानों पर हजारों

00:23:49.919 --> 00:23:54.480
साल पुराने लाल रंग के निशान मौजूद हैं।

00:23:52.798 --> 00:23:58.240
आखिर क्या बनाया [संगीत] है उन्होंने इन

00:23:54.480 --> 00:24:01.279
दीवारों पर? कहीं शिकार करते हुए इंसान तो

00:23:58.240 --> 00:24:04.640
कहीं नाचते हुए समूह और कहीं अजीबोगरीब

00:24:01.279 --> 00:24:07.119
जानवर क्या यह सिर्फ सजावट थी या फिर

00:24:04.640 --> 00:24:10.320
इंसान [संगीत] के जादू और आत्मा से जुड़ने

00:24:07.119 --> 00:24:13.519
की पहली कोशिश एक रात गुफा के अंदर गहरी

00:24:10.319 --> 00:24:16.558
खामोशी थी। बाहर बारिश हो रही थी। लेकिन

00:24:13.519 --> 00:24:19.519
आग के पास बैठा इंसान कुछ सोच रहा था। वह

00:24:16.558 --> 00:24:22.798
अपने हाथ को देख रहा था। फिर अपने साथी के

00:24:19.519 --> 00:24:25.918
चेहरे को और फिर उस अंधेरी खुरदरी दीवार

00:24:22.798 --> 00:24:29.836
को उसके मन में शिकार और पेट से परे कुछ

00:24:25.919 --> 00:24:32.240
सवाल तैरने लगे। मैं कौन हूं? ये जंगल,

00:24:29.836 --> 00:24:35.759
[संगीत] ये जानवर, ये तारे मुझसे क्या कह

00:24:32.240 --> 00:24:39.038
रहे हैं? इन सवालों का जवाब उस वक्त की

00:24:35.759 --> 00:24:42.319
किसी भाषा में नहीं था। इसलिए उसने एक लाल

00:24:39.038 --> 00:24:45.278
रंग का पत्थर उठाया। उसे पीसा और गुफा की

00:24:42.319 --> 00:24:47.519
दीवार पर एक लकीर खींच दी। यही था इंसान

00:24:45.278 --> 00:24:50.079
का पहला अक्षर। यही [संगीत] थी कला की

00:24:47.519 --> 00:24:53.038
शुरुआत। मध्य प्रदेश की भीमबेटका की

00:24:50.079 --> 00:24:55.519
गुफाओं में आज भी वह चित्र मौजूद है।

00:24:53.038 --> 00:24:58.240
लेकिन जरा सोचिए उन्होंने वो चित्र क्यों

00:24:55.519 --> 00:25:00.960
बनाए? वह कोई आर्ट [संगीत] गैलरी नहीं थी।

00:24:58.240 --> 00:25:03.599
वहां कोई दर्शक आने वाला नहीं था। अंधेरी

00:25:00.960 --> 00:25:05.840
गुफाओं में मशाल की रोशनी में उन्होंने

00:25:03.599 --> 00:25:09.759
जानवरों के चित्र बनाए। नाचते [संगीत] हुए

00:25:05.839 --> 00:25:12.000
इंसानों के चित्र बनाए। शायद यह एक जादू

00:25:09.759 --> 00:25:14.798
था। उनका मानना था कि अगर [संगीत] वे

00:25:12.000 --> 00:25:16.880
दीवार पर शिकार को कैद कर लेंगे तो अगले

00:25:14.798 --> 00:25:20.558
दिन जंगल में भी शिकार उनकी मुट्ठी में

00:25:16.880 --> 00:25:24.000
होगा। यह चित्रकारी उनकी उम्मीद थी, उनकी

00:25:20.558 --> 00:25:26.798
प्रार्थना थी। लेकिन बदलाव सिर्फ दीवारों

00:25:24.000 --> 00:25:29.278
पर नहीं उनके शरीरों पर भी हो रहा था।

00:25:26.798 --> 00:25:31.918
इंसान ने पहली बार खुद को सजाना शुरू

00:25:29.278 --> 00:25:35.278
किया। शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलकों को

00:25:31.919 --> 00:25:37.759
घिसकर उनमें छेद करके उन्होंने मनके बनाए

00:25:35.278 --> 00:25:41.359
और [संगीत] गले में पहन लिया। यह फैशन

00:25:37.759 --> 00:25:44.400
नहीं था। यह पहचान आइडेंटिटी थी। यह

00:25:41.359 --> 00:25:48.079
दुनिया को बताने का तरीका था कि मैं हूं।

00:25:44.400 --> 00:25:50.798
मैं अलग हूं। मेरी एक कहानी है। जानवर

00:25:48.079 --> 00:25:54.079
सिर्फ जीते हैं, लेकिन इंसान अपनी पहचान

00:25:50.798 --> 00:25:57.278
बनाना चाहता था। और फिर उन्होंने जीवन के

00:25:54.079 --> 00:26:00.000
सबसे कड़वे सच का सामना किया। मौत।

00:25:57.278 --> 00:26:03.200
जानवरों की दुनिया में जब कोई मरता है तो

00:26:00.000 --> 00:26:05.679
उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। गिद्ध उसे खा

00:26:03.200 --> 00:26:08.880
जाते हैं। लेकिन हमारे पूर्वजों ने ऐसा

00:26:05.679 --> 00:26:11.600
नहीं किया। जब उनका कोई साथी, कोई बुजुर्ग

00:26:08.880 --> 00:26:14.480
या कोई बच्चा हमेशा के लिए सो गया तो

00:26:11.599 --> 00:26:17.599
उन्होंने उसे जंगल में नहीं फेंका। उत्तर

00:26:14.480 --> 00:26:20.079
प्रदेश के सराय नाहर राय और महादाहा में

00:26:17.599 --> 00:26:23.038
मिली हजारों साल पुरानी [संगीत] कब्रें

00:26:20.079 --> 00:26:25.599
हमें एक भावुक कहानी सुनाती हैं। उन्होंने

00:26:23.038 --> 00:26:29.400
गड्ढा खोदा। अपने प्रियजन [संगीत] को बहुत

00:26:25.599 --> 00:26:29.399
प्यार से उसमें लिटाया।

00:26:31.679 --> 00:26:37.200
और ध्यान दीजिए। उन्होंने उसे खाली हाथ

00:26:34.720 --> 00:26:41.839
नहीं भेजा। उन्होंने उसके साथ उसका

00:26:37.200 --> 00:26:45.600
पसंदीदा भाला रखा, मांस रखा और गहने रखे।

00:26:41.839 --> 00:26:48.720
क्यों? क्योंकि इतिहास में पहली बार इंसान

00:26:45.599 --> 00:26:51.678
यह मान रहा था कि मौत अंत नहीं है। उन्हें

00:26:48.720 --> 00:26:55.120
लगा कि मरने के बाद भी एक सफर है। एक

00:26:51.679 --> 00:26:58.720
दूसरी दुनिया है जहां उसे भूख लगेगी। जहां

00:26:55.119 --> 00:27:01.599
उसे हथियारों की जरूरत होगी। यही आत्मा का

00:26:58.720 --> 00:27:05.038
पहला विचार था। यही धर्म की [संगीत] पहली

00:27:01.599 --> 00:27:07.599
नींव थी। गुफाओं में कहानियां गूंजने लगी।

00:27:05.038 --> 00:27:09.519
बुजुर्ग आग के पास बैठकर बच्चों को बताने

00:27:07.599 --> 00:27:12.319
लगे [संगीत] कि कैसे उन्होंने शेर का

00:27:09.519 --> 00:27:14.558
सामना किया। कैसे उन्होंने नदियां पार की।

00:27:12.319 --> 00:27:17.119
ज्ञान अब [संगीत] एक दिमाग से दूसरे दिमाग

00:27:14.558 --> 00:27:20.639
में जा रहा था। इंसान अब सिर्फ शिकारी

00:27:17.119 --> 00:27:24.067
नहीं था। वह एक चिंतक थिंकर बन चुका था।

00:27:20.640 --> 00:27:27.038
वह सपने देखने लगा था। लेकिन यह घुमंतु

00:27:24.067 --> 00:27:29.962
[संगीत] जीवन, यह शिकार, यह गुफाएं अब

00:27:27.038 --> 00:27:32.319
पीछे छूटने वाली थी। इंसान के इतिहास में

00:27:29.962 --> 00:27:35.119
[संगीत] एक ऐसा मोड़ आने वाला था जो सब

00:27:32.319 --> 00:27:37.678
कुछ बदलने वाला था। वह भोजन उगाने वाला

00:27:35.119 --> 00:27:39.759
था। गुफाओं से निकलकर खुले मैदानों में

00:27:37.679 --> 00:27:42.960
शहर बसने वाले थे। [संगीत] पत्थर की

00:27:39.759 --> 00:27:46.558
नालियां, विशाल स्नान गृह और हड़प्पा जैसी

00:27:42.960 --> 00:27:49.200
अद्भुत सभ्यता जिसे देखकर आज का इंजीनियर

00:27:46.558 --> 00:27:52.079
भी सोच में पड़ जाए। लेकिन कहानी यहीं

00:27:49.200 --> 00:27:55.278
नहीं रुकती। सनौली और हस्तिनापुर की

00:27:52.079 --> 00:27:58.240
खुदाइयों से शाही रथ और हथियार मिले हैं।

00:27:55.278 --> 00:28:01.599
जो महाभारत में वर्णित पांडव कौरव युद्ध

00:27:58.240 --> 00:28:05.359
से मेल खाता है। तो क्या महाभारत सिर्फ एक

00:28:01.599 --> 00:28:08.719
कथा है या सच में इतिहास में घटित हुआ था।

00:28:05.359 --> 00:28:12.079
भारत के इतिहास में आज से लगभग 9000 साल

00:28:08.720 --> 00:28:15.278
पहले एक ऐसा पल आया जिसने इंसान की नियति

00:28:12.079 --> 00:28:18.000
ही बदल दी। लाखों सालों से भोजन के पीछे

00:28:15.278 --> 00:28:22.319
भागते हुए हमारे पूर्वजों ने भागना बंद कर

00:28:18.000 --> 00:28:24.960
दिया। वजह थी एक नन्हा सा बीज। इंसान को

00:28:22.319 --> 00:28:27.759
समझ आ गया था कि पेट भरने के लिए जंगल में

00:28:24.960 --> 00:28:31.120
भटकना जरूरी नहीं। भोजन को अपनी जमीन पर

00:28:27.759 --> 00:28:33.679
उगाया जा सकता है। शिकारी इंसान अब किसान

00:28:31.119 --> 00:28:36.118
बन चुका था। नदियों के किनारे कच्ची

00:28:33.679 --> 00:28:38.960
मिट्टी की दीवारें उठी और इंसान को उसका

00:28:36.118 --> 00:28:41.519
[संगीत] पहला परमानेंट एड्रेस मिल गया।

00:28:38.960 --> 00:28:45.120
समय का पहिया तेजी से घूमा। यह [संगीत]

00:28:41.519 --> 00:28:47.759
छोटे गांव कस्बों में बदलने लगे और फिर

00:28:45.119 --> 00:28:50.158
मेहरगढ़ से [संगीत] शुरू हुआ यह सफर भारत

00:28:47.759 --> 00:28:53.148
के पश्चिमी हिस्से में एक महानगरीय

00:28:50.159 --> 00:28:55.760
विस्फोट में बदल गया। आज से 5000 साल

00:28:53.148 --> 00:28:58.388
[संगीत] पहले जब पूरी दुनिया कबीलों और

00:28:55.759 --> 00:29:00.879
झोपड़ियों में रह रही थी तब भारत में जन्म

00:28:58.388 --> 00:29:04.398
[संगीत] ले रही थी। दुनिया की सबसे आधुनिक

00:29:00.880 --> 00:29:07.600
सभ्यता इंडस वैली सिविलाइजेशन

00:29:04.398 --> 00:29:10.879
जरा कल्पना कीजिए। हजारों साल पहले के वे

00:29:07.599 --> 00:29:13.599
लोग शहरी नियोजन अर्बन प्लानिंग के उस्ताद

00:29:10.880 --> 00:29:16.720
थे। उनकी सड़कें आज के गांवों की तरह

00:29:13.599 --> 00:29:20.240
टेढ़ी-मेढ़ी नहीं थी। वे एक दूसरे को ठीक

00:29:16.720 --> 00:29:23.278
90 डिग्री राइट एंगल पर काटती थी। हड़प्पा

00:29:20.240 --> 00:29:26.399
के शहरों में हर मकान हर गली एक सलीके से

00:29:23.278 --> 00:29:30.079
बनी थी। यहां तक कि मकान बनाने वाली ईंटों

00:29:26.398 --> 00:29:33.119
का अनुपात रेश्यो भी पूरी सभ्यता में 4

00:29:30.079 --> 00:29:35.918
अनुपात 2 अनुपात एक [संगीत] ही रहता था।

00:29:33.119 --> 00:29:38.000
चाहे शहर हजारों मील दूर हो। ईंटों का यह

00:29:35.919 --> 00:29:41.679
स्टैंडर्ड [संगीत] साइज दिखाता है कि उनकी

00:29:38.000 --> 00:29:43.759
शासन व्यवस्था कितनी मजबूत और संगठित थी।

00:29:41.679 --> 00:29:46.640
लेकिन हड़प्पा की सबसे बड़ी गहराई [संगीत]

00:29:43.759 --> 00:29:49.679
उनके महलों में नहीं बल्कि उनकी नालियों

00:29:46.640 --> 00:29:52.559
ड्रेनेज सिस्टम में छिपी थी। हर घर का

00:29:49.679 --> 00:29:54.720
अपना [संगीत] बाथरूम था। गंदा पानी

00:29:52.558 --> 00:29:57.440
निकालने के लिए पक्की और ढकी हुई नालियां

00:29:54.720 --> 00:30:00.615
[संगीत] बनाई गई थी। इन नालियों में

00:29:57.440 --> 00:30:00.720
जगह-जगह पर मैन होल्स छोड़े गए थे

00:30:00.615 --> 00:30:04.000
[संगीत]

00:30:00.720 --> 00:30:07.819
ताकि कचरा साफ किया जा सके। और फिर आता है

00:30:04.000 --> 00:30:10.159
मोहनजोदड़ो का वह विशाल स्नानागार। यह महज

00:30:07.819 --> 00:30:13.278
[संगीत] एक कुंड नहीं था बल्कि प्राचीन

00:30:10.159 --> 00:30:14.399
इंजीनियरिंग का चमत्कार था।

00:30:13.278 --> 00:30:16.880
इसे वाटरप्रूफ [संगीत]

00:30:14.398 --> 00:30:19.678
बनाने के लिए उन लोगों ने ईंटों के ऊपर

00:30:16.880 --> 00:30:22.960
नेचुरल बिटुमेन यानी [संगीत] प्राकृतिक

00:30:19.679 --> 00:30:24.798
डामर की परत चढ़ाई थी। हजारों सालों बाद

00:30:22.960 --> 00:30:27.759
भी वह पानी [संगीत] को रोकने में सक्षम

00:30:24.798 --> 00:30:30.558
था। वहां पानी भरने के लिए अलग कुआमा था

00:30:27.759 --> 00:30:33.599
और गंदा पानी निकालने के लिए एक विशाल

00:30:30.558 --> 00:30:36.480
आउटलेट। यह दिखाता है कि वे पानी के

00:30:33.599 --> 00:30:38.879
प्रबंधन, वाटर मैनेजमेंट के कितने बड़े

00:30:36.480 --> 00:30:41.360
जानकार थे। हड़प्पा के शहरों का

00:30:38.880 --> 00:30:44.640
आर्किटेक्चर दुनिया का पहला स्मार्ट सिटी

00:30:41.359 --> 00:30:47.038
मॉडल था। क्या आप जानते हैं? उनके घरों के

00:30:44.640 --> 00:30:49.919
दरवाजे कभी मुख्य सड़क की तरफ नहीं खुलते

00:30:47.038 --> 00:30:52.158
थे। वे पीछे की गलियों में खुलते थे। यह

00:30:49.919 --> 00:30:54.640
प्राइवेसी और धूल मिट्टी से बचने का एक

00:30:52.159 --> 00:30:57.278
अनोखा [संगीत] तरीका था। हर घर का अपना

00:30:54.640 --> 00:31:00.720
आंगन था रोशनी और ताजी हवा [संगीत] के

00:30:57.278 --> 00:31:03.679
लिए। 5000 साल पहले आधुनिक वेंटिलेशन का

00:31:00.720 --> 00:31:06.079
ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता। हड़प्पा

00:31:03.679 --> 00:31:09.200
के शहरों का आर्किटेक्चर दुनिया का पहला

00:31:06.079 --> 00:31:10.879
स्मार्ट सिटी मॉडल था। और अगर आप हड़प्पा

00:31:09.200 --> 00:31:13.360
सभ्यता [संगीत] के ऐसे ही उन्नत

00:31:10.880 --> 00:31:16.080
आर्किटेक्चर, शहरों की प्लानिंग और उनकी

00:31:13.359 --> 00:31:18.560
चौंकाने वाली तकनीक के बारे और जानना

00:31:16.079 --> 00:31:18.879
चाहते हैं तो कमेंट में अवश्य बताइए।

00:31:18.560 --> 00:31:22.398
[संगीत]

00:31:18.880 --> 00:31:24.456
लेकिन जैसे-जैसे हम सिंधु सभ्यता से गंगा

00:31:22.398 --> 00:31:28.000
के मैदानों की ओर मुड़ते हैं, इतिहास

00:31:24.455 --> 00:31:30.798
[संगीत] एक नया और रोमांचक मोड़ लेता है।

00:31:28.000 --> 00:31:34.319
जहां एक तरफ हड़प्पा में शांति और व्यापार

00:31:30.798 --> 00:31:37.440
था, वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत की जमीन को

00:31:34.319 --> 00:31:39.519
कुरेदने पर कुछ ऐसे राज मिलते हैं जो

00:31:37.440 --> 00:31:42.798
हमारी महाकाव्य में [संगीत] वर्णित

00:31:39.519 --> 00:31:47.120
महाभारत की युद्ध को प्रमाणित करता है। हम

00:31:42.798 --> 00:31:50.720
बात कर रहे हैं सिनोली की। साल 2005 और

00:31:47.119 --> 00:31:53.678
फिर 2018 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

00:31:50.720 --> 00:31:56.159
एईएसआई को यहां जो [संगीत] मिला उसने

00:31:53.679 --> 00:31:58.880
हजारों साल पुराने इतिहास को हिला कर रख

00:31:56.159 --> 00:32:01.840
दिया। जमीन के सीने से निकले [संगीत] हैं

00:31:58.880 --> 00:32:04.960
दो पहियों वाले शाही रथ चैरियट्स।

00:32:01.839 --> 00:32:07.678
इतिहासकार पहले कहते थे कि भारत में रथ और

00:32:04.960 --> 00:32:10.720
घोड़े बाहर से आए। लेकिन सिनोली ने साबित

00:32:07.679 --> 00:32:13.519
कर दिया कि भारत में अपने खुद के रथ थे।

00:32:10.720 --> 00:32:15.759
यह तांबे से मड़े हुए थे जो इनकी मजबूती

00:32:13.519 --> 00:32:18.822
और [संगीत] शाही ठाट को दिखाते हैं। यहां

00:32:15.759 --> 00:32:21.679
से मिली एंटीना स्वर्ड्स तांबे की मुंठ

00:32:18.821 --> 00:32:24.959
[संगीत] वाली आठ विशाल तलवारें जो आज भी

00:32:21.679 --> 00:32:27.759
वैसी ही धारदार लगती हैं। तो दोस्तों आज

00:32:24.960 --> 00:32:29.759
के लिए बस इतना ही। कमेंट करके बताइए कि

00:32:27.759 --> 00:32:32.319
अगले डॉक्यूमेंट्री किस टॉपिक पर होना

00:32:29.759 --> 00:32:34.558
चाहिए और अगर आप भी ऐसा ही वीडियो बनाना

00:32:32.319 --> 00:32:37.119
चाहते हैं तो मेरे WhatsApp कम्युनिटी से

00:32:34.558 --> 00:32:40.720
जुड़े और यह वीडियो आप किस राज्य से देख

00:32:37.119 --> 00:32:40.719
रहे हैं यह भी कमेंट में बताएं।
