Advertisement
57:52
Javed Akhtar on Writing Bollywood Hits and What It Costs | Jashn-e-Rekhta | Sunday Special
Jashn-e-Rekhta
·
May 10, 2026
Open on YouTube
Transcript
0:00
कि इसमें तो कोई शक नहीं है। इसमें सब
0:03
मुत्तफिक हैं कि फिल्म का जो मीडिया है वो
0:07
लोगों के लिए पब्लिक के लिए सबसे ज्यादा
0:09
ताकतवर है।
0:10
ये ये बीमारी नहीं है जो फिल्मों में दिख
0:13
रही है। बीमारी का सिम्टम है। फिल्में
0:16
इतनी इंपॉर्टेंट समाज से ज्यादा, मुशरे से
0:18
ज्यादा, मुल्क से ज्यादा तो इंपॉर्टेंट
Advertisement
0:20
नहीं हो सकती ना। शायर अगर अपनी जुबान से
0:23
और जुबान की नजाकतों से, मुहावरों से और
0:28
उसकी खूबसूरती से वाकिफ हो तो वो फिल्मी
0:32
गीत में भी नजर आती है। ऐसा हो ही नहीं
0:36
सकता कि कोई खराब शायर जो है वो अच्छा
0:39
फिल्मी गीत लिखे।
0:41
जबान ख्याल नहीं है। लफ्ज ख्याल नहीं है।
0:44
लेकिन लफज़ वो ईंटें हैं जिनसे ख्याल बनते
0:46
हैं।
1:06
वो उर्दू का मुसाफिर है। यही पहचान है
Advertisement
1:08
उसकी। वो उर्दू का मुसाफिर है। यही पहचान
1:13
है उसकी। जिधर से भी गुजरता है सलीका छोड़
1:16
जाता है। दानिश भाई के इस शेर के साथ इस
1:19
आफ्टरनून की शुरुआत हो रही है और तीन बहुत
1:21
ही खूबसूरत बहुत ही जहीन बहुत ही कमाल के
1:24
हमारे दोस्त हमारे सीनियर्स यहां पर हैं
1:27
जिनकी गुफ्तगू सुनने का इंतजार हम कर रहे
1:29
हैं। सबसे पहले मैं उनका जिक्र करना चाहता
1:32
हूं जो इस सेशन को मॉडरेट करेंगे। जिनके
1:34
सवाल जो होते हैं वो बड़े दिलचस्प होते
1:37
हैं और वो उसका इंतजार हम सब करते हैं।
1:39
अदिल हाशमी साहब इस सेशन को मॉडरेट
1:41
करेंगे।
1:43
बहुत सारा काम किया है सैन फ्रांसिस्को
1:45
सिर्फ फिल्म मेकिंग में भी कोर्स किया है।
1:47
सिखाते भी रहे हैं। लेकिन अभी बैक स्टेज
1:49
कह रहे थे कि मैं जरा सी चीज पे मेरी
1:51
गिरफ्त होती है, पकड़ होती है तो मैं उसको
1:52
छोड़ के कुछ और करने लग जाता हूं। तो एक
1:54
अलग सेशन मैं अदील साहब के साथ करूंगा और
1:58
उस तरफ जो बैठे हैं हम सबके फेवरेट हैं।
2:01
और इनके बारे में बहुत बार मुझे बोलने का
2:03
मौका मिलता है। अब मैं मैं यही कहता हूं
2:05
कि द वन एंड ओनली जावेद अख्तर।
2:13
और क्योंकि जावेद साहब हम जानते हैं कैसा
2:16
बोलते हैं। तो उन्हीं का शेर मैं पढ़ना
2:19
चाहता हूं। अगर पलक पे है मोती तो यह नहीं
2:22
काफी। अगर पलक पे है मोती तो यह नहीं
2:24
काफी। हुनर भी चाहिए अल्फाज में पिरोने
2:27
का। जावेद अख्तर साहब
2:31
हम सबकी फेवरेट ज़हरा आपा। हम सब जानते हैं
2:35
शायरी में जो आपका नाम है।
2:42
गाने भी लिखती रही हैं। स्क्रिप्ट राइटर
2:44
भी हैं। और आपका शेर ये है कि बहुत ही
2:46
खूबसूरत शेर है। छोटी सी बात पे खुश होना
2:49
मुझे आता था। छोटी सी बात पे खुश होना
2:53
मुझे आता था। पर बड़ी बात पे चुप रहना
2:56
तुम्ही से सीखा। ज़हरा निगाह।
2:59
आज की इस गुफ्तगू का टॉपिक है फिल्मी और
3:02
अदबी दुनिया। फिल्मी और अदबी दुनिया फासले
3:06
और नजदीकियां। यहां से अदील भाई का माइक
3:09
शुक्रिया बहुत-बहुत थैंक यू सो मच
3:11
गगन बहुत-बहुत शुक्रिया जश्न रेख्ता का
3:14
बहुत-बहुत शुक्रिया और हमारी आपकी मेरी
3:18
खुशकिस्मती कि हम एक ऐसे अहद में एक ऐसी
3:22
जगह पर मौजूद हैं कि जो अहद और जो जगह
3:26
ज़हरा आपा और जावेद साहब भी मौजूद हैं। ये
3:29
हमारी आपकी खुशकिस्मती है। खुदा इन दोनों
3:32
को सेहतमंद रखे, तवाना रखे।
3:36
जरा जरा सा मौजू से हट के जश्न रेख्ता एक
3:42
रोमांटिक बात होती है। दो अच्छे शेर सुने
3:46
दो अच्छी तालियां बजा दी। शाम को गाना
3:48
बजाना हुआ। बहुत अच्छा हुआ। वाहवाह की घर
3:50
चले गए। क्या इससे ज्यादा अहमियत है
3:53
रेख्ता की, जुबान की या ऐसे फेस्टिवल्स की
3:57
क्योंकि कोई गहरी अहमियत भी हो सकती है
3:59
इसके अलावा?
4:01
सबसे पहले तो आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया।
4:06
अदील ने जो सवाल किया अहम सवाल है कि आप
4:10
लोग यहां इतने शौक से आते हैं। कभी आप
4:13
म्यूजिक से लुत्फंदोज होते हैं। कभी आप
4:16
तकारीर सुनते हैं। कभी आप शायरी सुनते
4:18
हैं।
4:20
ये तमाम चीजें अदब की असनाफ है। उस अदब का
4:23
ही इससे ताल्लुक है। लेकिन मैं एक बात
4:26
आपसे जरूर कहना चाहती हूं कि यह संजीव
4:30
साहब का कमाल है कि वो इन तमाम फुनून के
4:35
या तमाम जिन तरीकों के जरिए से जो
4:38
बुनियादी बात है रेता की वो अदब के अलावा
4:42
तहजीब भी है। अदब और तहजीब का यह समझ
4:46
लीजिए कि लाजिम और मलजूम है एक दूसरे के
4:49
लिए। आप शेर सुनते हैं। आप किस तरह सुनते
4:54
हैं? उसके सुनने के आदाब क्या है? यह आपको
4:58
रेता के जरिए आप सीखते हैं। आप तकारीर
5:01
सुनते हैं। बाज लफ्ज ऐसे होते हैं जो इससे
5:05
पहले आपने नहीं सुने होते। आप उन्हें
5:07
जानने की कोशिश करते हैं। जब आप यहां के
5:11
जलसों से जाते हैं वापस तो मुझे इसका पूरा
5:15
यकीन है कि आपके दामन में
5:19
कुछ कीमती चीजें जरूर होती हैं। किसी का
5:23
कॉल, किसी का शेर, किसी का अंदाज,
5:28
यह सब जुगनुओं की तरह आपके दामन में सिमट
5:31
के आ जाते हैं। और यही रेफ्ता की सबसे
5:34
बड़ी है।
5:36
इसीलिए यह कहा जाता है कि अदब और इल्म
5:40
दोनों किस लिए कि रेख्ता दोनों ही कजामिन
5:44
है। और मैं इस सिलसिले में संजीव की
5:47
हिम्मत और उनकी बेगम की हिम्मत की बड़ी
5:50
दाद देती हूं कि बावजूद हजार मुश्किलात और
5:54
तंगियों के वो बराबर अपने मयार को कायम
5:57
रखे हुए हैं और लोग बेतहाशा इसमें शामिल
6:01
होते हैं। सुनने के लिए आते हैं। मेरे साथ
6:04
जो साहब बैठे हैं अब इनका आलम तो यह है कि
6:08
इनका तारुफ अगर मैं करवाऊं तो मेरा तारुफ
6:11
फिर आपसे हो जाएगा। क्योंकि इनके तारुफ की
6:14
तो किसी को जरूरत ही नहीं है। इनका आना
6:17
हमारे लिए बहुत मुबारक फाल है। और मेरी
6:21
दुआ है कि सेहत तंदुरुस्ती के साथ रेख्ता
6:25
के जलसों में यह बराबर आते रहें और आप
6:28
लोगों से बेया मोहब्बत वसूल करते रहें और
6:32
आपसे बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते रहें।
6:34
इनकी बातों में गुलों की खुशबू मैं जावेद
6:38
कुमार
6:42
जरा आपने बात बहुत जल्दी खत्म कर दी। अब
6:44
शुरू हुई थी तो आराम से करते कोई वक्त की
6:47
कमी नहीं है।
6:48
नहीं तो मैं फिर शुरू खत्म कर दिया।
6:52
बहाल बहुत-बहुत शुक्रिया। आप लोग सब यहां
6:54
आए और बहुत-बहुत शुक्रिया कि हमें बुलाया
6:56
गया। मुझे बुलाया गया। इट इज़ ऑलवेज अ
6:58
प्लेज़र कमिंग हियर। जिंदगी जो है ज्यादा
7:01
से ज्यादा वक्त के साथ सख्त बेरंग और बड़ी
7:04
मतलबी सी होती जा रही है। तो जब यह मवाके
7:07
होते हैं जहां कोई दूसरी भी बातें हो जहां
7:09
सिर्फ फायदा नुकसान की बात ना हो जहां
7:12
सिर्फ उन चीजों की बात ना हो जो बैंक में
7:15
डिपॉजिट की जा सकती है तो अच्छा लगता है।
7:21
और इसकी अहमियत क्या है? ये बड़ा अच्छा
7:24
सवाल किया था हमारे भाई ने।
7:26
देखिए आर्ट लिटरेचर और कोई भी फॉर्म ऑफ़
7:30
आर्ट जो है खुसूसन मैं क्योंकि इस वक्त
7:33
लिटरेचर की बात हो रही तो लिटरेचर कहूंगा
7:35
खासतौर से ये एस्पिरेंट नहीं है। ये ऐसा
7:40
नहीं है कि हमने एक डोज़ ले ली लिटरेचर की
7:42
और हम बिल्कुल अलग हो गए। ये विटामिन है।
7:46
ये अगर आप इसे इस्तेमाल करते रहते हैं तो
7:49
जिंदगी की खूबसूरती क्या है? एस्थेटिक्स
7:52
क्या है? वो आहिस्ताआहिस्ता
7:53
आहिस्ताआहिस्ता आपके ज़हन में नशीन होती है
7:57
और आप में खूबसूरती को
8:02
समझने का और उसकी इज्जत करने का एतराम
8:05
करने का
8:07
सलाहियत बढ़ती है। खूबसूरती से मतलब सिर्फ
8:10
चेहरे की या जिस्म की खूबसूरती नहीं है।
8:13
खूबसूरती सुलूक की, खूबसूरती सोच की,
8:16
फिक्र की
8:17
वो खूबसूरती हर खराब जज्बा
8:20
वो बदसूरत है। हर अच्छा जज्बा, हर अच्छा
8:23
इमोशन, हर अच्छी फीलिंग खूबसूरत है। अह तो
8:26
वह उससे हमें धीरे धीरे धीरे धीरे
8:30
वाबस्तगी होती है और हम उसे पहचानने लगते
8:33
हैं। दो एम ये है कि ज़बान जो है जबान
8:37
ख्याल नहीं है। लब्ज़ ख्याल नहीं है। लब्ज़
8:40
वो ईंटें हैं जिनसे ख्याल बनते हैं। तो जब
8:43
हम जैसे ईंटों से मकान बनते हैं। ईंट तो
8:46
मकान नहीं है। लेकिन हम जब अच्छी जबान
8:50
पढ़ते हैं और पढ़ते रहते हैं तो हमारे पास
8:54
वो सोर्स पैदा होता है। नहीं वो भी ठीक कह
8:58
रहे हैं जो कह रहे हैं लेकिन आप मेरी बात
8:59
सुनिए।
9:01
आप मेरी बात सुने।
9:04
तो दो बातें हमें पता चलती हैं। एक तो
9:07
जुबान हमें हमारे अपने ख्यालात को ज्यादा
9:10
फोकस में लाती है। क्लियर करती है।
9:13
क्योंकि हमारे पास जबान है क्लियरली सोचने
9:15
की। अगर जुबान कम होगी तो हम साफ नहीं सोच
9:18
पाएंगे। दो ये कि दो बातें हमें लिटरेचर
9:21
से पता चलती हैं जो ऑस्टेंसिबली
9:23
कंट्राडिक्टरी है। एक ये कि दुनिया में
9:26
कैसे-कैसे अलग-अलग तरह के लोग हैं। और
9:29
दूसरी बात ये कि दुनिया में सारे लोग
9:32
कितने एक दूसरे से मिलते जुलते हैं। ये
9:35
दोनों बातें हमें सिर्फ लिटरेचर बताता है।
9:40
मुझे लगता है कि ये ये जो इस तरह की
9:44
लिटरेरी कॉन्फ्रेंसेस होती हैं ये आपको एक
9:47
इशारा देती हैं कि भाई क्या होमवर्क करना
9:51
है आपको बाकी अब आप होमवर्क करते हैं कि
9:54
नहीं करते आपकी मर्जी जावेद साहब ने एक
9:57
लफज़ इस्तेमाल किया ख्याल आप दिन भर सोचते
9:59
होंगे कि मुझे आज ये ख्याल आया कल ये
10:01
ख्याल आया मुझे ये ख्याल ही नहीं आया तो
10:04
ये एक जुमले में मैंने अपने उस्ताद से
10:07
पूछा कि ख्याल क्या चीज चीज है। उन्होंने
10:09
कहा आप कोई चीज देखते हैं, महसूस करते
10:11
हैं, समझते हैं। आपके ज़हन को जब कोई बात
10:15
छू जाए और ज़हन को छूकर उसका रुख कुछ और हो
10:19
जाए। अब वो जो आपके ज़हन से चीज निकली है,
10:22
वो आई तो कहीं से थी। पर अब यह वो नहीं
10:24
रही। इसमें आपका कुछ अंग आ गया है। और यह
10:27
मुकम्मल आपकी भी नहीं है। आपने कहीं से ली
10:30
थी। तो, यह चीज पहली चीज की मानिंद है। पर
10:33
वो नहीं है। यह ख्याल है। और गालिब का एक
10:36
मिश्रा है।
10:39
बिल्कुल वो वाला मिसरा नहीं आते हैं गैब
10:41
से ये मजहम में बिल्कुल वो नहीं है आदमी
10:44
बजाय खुद एक महशरे ख्याल तो ख्याल तो
10:49
जावेद साहब मैंने आप मुझे ये ख्याल आया
10:51
आपकी गुफ्तगू सुन के कि जो हमारा उनवान या
10:54
मौजू है के फिल्मी और अदबी दुनिया मुझे
10:58
अंदेशा ये है कि अब फिल्मी और बे-अदबी
11:01
दुनिया हो चुकी है ये लेकिन ये दुनिया
11:03
फर्क है क्योंकि आज से बहुत साल पहले जो
11:06
गीत थे बिलखसूस फिल्म्स के वो शायरी हुआ
11:09
करती थी तो अदब उसका एक हिस्सा हुआ करता
11:12
था। तो क्या अब ये दुनियाएं फर्क हो गई
11:15
हैं फिल्म की और अदब की?
11:19
देखिए पहले तो हमें इस बात पर क्लियर होना
11:21
चाहिए कि जो लोग फिल्में बनाते हैं,
11:23
फिल्में लिखते हैं, फिल्में डायरेक्ट करते
11:25
हैं, फिल्मों में काम करते हैं ये मार्स
11:27
या वीनस से नहीं आए हैं। ये सब के सब इसी
11:30
मुशरे ने इसी समाज ने इसी सोसाइटी ने भेजे
11:33
हैं। इस तरह के लोग क्यों आ रहे हैं? जो
11:36
इस तरह की फिल्में बनाते हैं। इस तरह के
11:37
गीत लिखते हैं। इस तरह के गीत पसंद करते
11:40
हैं। ये जिम्मेदारी आपकी है। आप बताइए आप
11:42
सोसाइटी में कर क्या रहे हैं?
11:44
एक ये तो आप ही के यहां से आए हैं। हमने
11:47
थोड़ी पैदा किए थे।
11:50
ये जो वाकया है ये कोई एक वॉइड में नहीं
11:55
है। दरअसल हम लोगों ने 40 50 साल 60 साल
12:00
इस पे काम किया है कि हम यहां तक पहुंचे।
12:03
यह हमारे हालात ऐसे हो। इसके लिए बड़ी
12:06
मेहनत की गई है। हमने अपने बच्चों को अदब
12:10
से, शायरी से, लिटरेचर से दूर रखा है कि
12:13
ये बेकार की चीजें हैं। इससे थोड़ी तुम
12:16
कमा पाओगे। तुम्हें वो पढ़ना चाहिए, वो
12:18
सीखना चाहिए जिससे कुछ धंधे की कुछ बात
12:21
करो, कुछ पैसा जोड़ो। तो हमारा पूरा जो
12:27
तालीम का
12:29
और एजुकेशन का सिस्टम रहा है वो हमेशा
12:32
सिर्फ प्रोफेशन ओरिएंटेड रहा है। तो जबान
12:35
सोसाइटी में श्रिंक कर रही है। मैं तो
12:37
बंबई में रहता हूं। हर दिन मैं यंग लोगों
12:40
से सुनता हूं। यू नो व्हाट आई मीन। तो आई
12:42
टेल देम नो आई डोंट नो।
12:45
आपके पास हमारे यहां मुहावरे होते थे,
12:49
कहावतें होती थी। आज आप कोई 30-40 साल का
12:52
इंसान एक बता दीजिए मुझे वो लड़की लड़का
12:55
कोई जो कोई कहावत कभी बोलता हो वो गायब हो
12:59
गए सब जबान श्रिंक कर रही है सोसाइटी में
13:02
ये उसका रिफ्लेक्शन है
13:05
ये ये बीमारी नहीं है जो फिल्मों में दिख
13:09
रही है बीमारी का सिम्टम है फिल्में इतनी
13:12
इंपॉर्टेंट समाज से ज्यादा मुशरे से
13:14
ज्यादा मुल्क से ज्यादा तो इंपॉर्टेंट
13:15
नहीं हो सकती ना अगर आपको ये दिखाई दे रहा
13:18
है तो समझ लीजिए की सिर्फ सिर्फ कलाई में
13:20
बुखार नहीं है। बुखार पूरे जिस्म में होता
13:23
है। कलाई छू के आप देखते हैं। अब आप कलाई
13:26
पे नाराज हो रहे हैं। ये क्या है? ये कोई
13:29
रिस्ट है? अरे भाई ये एक जिस्म का हिस्सा
13:32
है। अगर इसमें कुछ गड़बड़ लग रही है तो
13:35
पूरे जिस्म का इलाज करो।
13:44
जरा आपा हमारे सेशन के बाद मुशायरा है
13:47
शायर हजरात ये बताइए कि कई दफा जिक्र किया
13:51
जावेद साहब ने पहले भी आपको मालूम है कि
13:53
जो बहुत अच्छे-अच्छे शायर थे वो जब शायरी
13:56
करते थे तो वो गीत भी लिखे लिखते थे और
13:59
उन्हीं गीतों में उनकी जितनी ऊंची पाए की
14:01
शायरी थी वो झलकती थी और शायद बहुत सारे
14:05
दोस्तों को मालूम हो या ना हो कि कितने
14:07
बड़े-बड़े शायरों ने फिल्मों के गीत लिखे
14:09
हैं। एक तो खैर यहीं मौजूद है लेकिन बहुत
14:11
से लोगों ने लिखे हैं। वो कौन-कौन लोग थे
14:14
जो मशहूर शायर भी थे उन्होंने गीत भी लिखे
14:19
और उसके बाद ये क्या हुआ कि हमने चीजों को
14:22
फिल्मी कर दिया कि जैसे फिल्मी होना जो है
14:24
वो कोई मायूब चीज है और ये अदबी चीज अदा
14:27
है और फिल्मी होना जो है वो तो फिल्म का
14:28
आदमी है। वो तो फिल्म की शायरी है। ये
14:30
अलेधा कैसे हो गई चीजें? देखिए ये बात गलत
14:33
है। इसकी तफसील ये है जैसे कि अभी अदील ने
14:36
बताया कि इसमें तो कोई शक नहीं है। इसमें
14:40
सब मुत्तफिक हैं कि फिल्म का जो मीडिया है
14:44
वो लोगों के लिए पब्लिक के लिए सबसे
14:46
ज्यादा ताकतवर है। आप देखते हैं आप फौरन
14:50
याद कर लेते हैं, डायलॉग याद कर लेते हैं,
14:53
गाने याद कर लेते हैं। हर चीज आपकी अजबर
14:56
हो जाती है। फिल्म जो है इसमें जैसे मैंने
15:00
अ किया कि सबसे बड़ा इस वक्त मीडिया है।
15:02
जहां तक शायरों का ताल्लुक है फिल्म के
15:06
साथ जो उन्होंने गाने लिखे हैं वो किन-किन
15:09
सब्र आजमा लम्हों से गुजरते हैं और उसके
15:12
बाद एक गाना तखलीक होता है। इसको जावेद
15:16
ज्यादा जानते होंगे। मैं तो सिर्फ थोड़ी
15:19
बहुत जानकारी के साथ ही आपको बतला सकती
15:21
हूं कि हमारी फिल्मों में बड़े-बड़े
15:24
शायरों ने भी गीत लिखे हैं। मतलब जोश साहब
15:28
ने लिखे हैं फिल्मी गीत और बड़े अच्छे
15:31
लिखे उन्होंने। उसमें जो गीत हैं उनमें
15:34
उसकी उनकी शायरी की झलक नजर आती है। हमारे
15:37
जमाने में देखिए जो शायर बहसियत शायर के
15:43
अगर मैं गलत कह रही हूं तो जावेद से पूछ
15:45
लूं कि मतलब बहुत से शायर ऐसे थे कि जिनका
15:48
बहसियत शायर इतना ऊंचा दर्जा नहीं था।
15:52
लेकिन उन्होंने गीत दिए हैं। शायरी के
15:55
फिल्म के जिक्र में बैकग्राउंड म्यूजिक जो
15:57
है वो जरा डिस्टर्ब कर रहा है। लेकिन ये
16:00
कि अब क्या किया जाए?
16:03
मिसाल के तौर पे मैं आपसे ये कहती हूं कि
16:06
जावेद ने बहुत गाने लिखे हैं। अब तो
16:08
बेशुमार गाने हैं। घंटों गुजर जाएंगे।
16:12
पिछली दफा भी तीन-चार घंटे तक आप लोग
16:14
सिर्फ जावेद ही के लिखे हुए गाने सुनते
16:17
रहे।
16:18
लेकिन होता यह है कि शायर अगर अपनी जुबान
16:22
से और जुबान की नजाकतों से, मुहावरों से
16:27
और उसकी खूबसूरती से वाकिफ हो तो वो
16:31
फिल्मी गीत में भी नजर आती है। ऐसा हो ही
16:35
नहीं सकता कि कोई खराब शायर जो है वो
16:38
अच्छा फिल्मी गीत लिखे। नहीं उसको जुबान
16:42
पे इख्तियार पूरा होना चाहिए। तभी वह
16:45
फिल्म फिल्मी गीत लिख सकता है। वरना वह
16:48
नहीं लिख सकता क्योंकि इसके भी मराहिल
16:51
बहुत ज्यादा होते हैं। फिल्मी गीत बहुत
16:54
सारे ऐसे भी हैं जो कि अच्छे नहीं होते
16:56
लेकिन वो मकबूल हो जाते हैं। ये लोगों की
16:59
समझ और उनका मजाक होता है। लेकिन बहुत
17:01
सारे फिल्मी गीत ऐसे भी हैं कि जिन्हें हम
17:05
अदबी हैसियत के मुता यानी के सामने रख
17:08
सकते हैं। और जैसा कि मैं कहती हूं इनसे
17:11
भी मैं अभी यही बात कह रही थी कि इनके
17:13
बहुत से गीत जो मुझे याद हैं मुझे वह
17:16
शायराना हैसियत से याद हैं कि उसमें पूरी
17:19
शेरियत मौजूद है और अगर आप फिल्मों के
17:22
गानों की तारीख देखेंगे तो आपको बहुत से
17:26
गाने ऐसे मिसाल के तौर पे साहिर का एक
17:29
गाना है जो सबको आता है और जिस वक्त वो
17:33
बजता है या बजाया जाता है या सुनाया जाता
17:37
है उसकी शायरी खूब खूबियों के साथ आपने
17:40
उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। और वो गाना
17:43
जिसके अल्फाज़ निहायत सीधे साधे हैं। अभी
17:46
ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं। ये
17:49
शेरियत की एक मुकम्मल तस्वीर है। इसमें आप
17:53
जावेद से बात कीजिए। वो आपको ज्यादा सही
17:56
तरीके से बता सकेंगे कि किन-किन मराहिल से
17:59
गुजरना पड़ता है जब कहीं जाकर एक अच्छा
18:04
मुतरन्नुम
18:05
खूबसूरत गीत पैदा होता है।
18:09
अभी
18:13
जरा आप आपने साहिर का ये बताया
18:16
जावेद साहब का भी कोई ऐसा गाना बताएं
18:18
जिसकी शेरियत ऐसी हो कि जो दिल
18:20
कई गाने बता सकते हो
18:21
आपने मेरी इज्जत बहुत खतरे में डाल दी
18:23
फर्ज कर लीजिए उन्हें एक भी ना याद हो तो
18:25
नो नो मुझे नहीं
18:26
तो मेरी तो यहां नाक कट जाएगी
18:28
मुझे बहुत याद है
18:30
आपने बहुत मुझे खतरनाक जगह डाल दिया चलिए
18:33
आप इन बातों को याद आए तो मैं याद दिला
18:36
दूंगा
18:36
हां पर याद दिला दीजिएगा मुझे
18:38
देखिए एक मुझे इनका गाना मैं आपको बताती
18:41
हूं। उसमें कोई मुश्किल लफज़ नहीं है। किसी
18:44
तरह का कहीं नहीं है। लेकिन मानवीयत और
18:47
शेरियत उसमें भरपूर है। अगर मैं गलत पढूं
18:51
तो सही कर देना।
18:52
नहीं वो मैंने कही गलत है।
18:58
कुछ ना कहो।
19:01
कुछ भी ना कहो।
19:03
क्या कहना है? क्या सुनना है?
19:08
समय
19:11
तुमको पता है
19:12
तुमको तुमको खबर है मुझको पता है समय का
19:17
यह पल थम सा गया है समय का और एक पल में
19:25
कोई नहीं है कोई नहीं है सिर्फ एक मैं हूं
19:30
और एक तुम हो क्या कहना है क्या सुनना अब
19:35
आपने देखा कि इसमें कितनी बड़ी बात आसान
19:40
लफ्जों में समो दी गई है
19:43
और इस पल में सिर्फ एक तुम हो
19:48
सिर्फ एक मैं हूं समय का यह पल थम सा गया
19:52
है तो जो शायर के ज़हन में जिस वक्त शरीयत
19:57
होती है ये बात देखिए कई आपको मिसाले मैं
20:01
बहुत दे सकती हूं लेकिन क्योंकि हमारा कोई
20:03
खास मौजू नहीं है शायरी भी हम फिल्मी
20:07
गानों का भी तस्करा करेंगे। एक दूसरे की
20:09
कभी-कभी तारीफ भी करेंगे। कभी बुराई भी कर
20:12
देंगे। लेकिन यह है कि मिलाजुला के यह
20:15
मौजू हम आपके सामने रख रहे हैं। ये अदील
20:18
मियां आप देखें क्या किस किस्म का सवाल
20:20
करते हैं। एक गाना तो मैंने आपको जावेद
20:23
साहब का सुना दिया। 100 सुना सकती हूं। अब
20:26
आप बता दीजिए।
20:29
जरा सी गहरी बात की कोशिश क्योंकि पीछे
20:31
फिर यही होगा धमाल। वो यह है कि एक
20:35
क्राफ्ट है राइटर का पोएट का और एक पैशन
20:39
है। अब यह दोनों मुतजाद भी हैं, मुतसादम
20:43
भी है कि जब पैशन है तो फिर कोई लॉजिक रीज़
20:46
कुछ नहीं है। अब तो एक पैशन है, एक इश्क
20:47
है, एक एक उभार है, एक उसाहट है एक। लेकिन
20:50
जो क्राफ्ट है, उसने एक पैराए में रहना
20:52
है। लफ्ज़ कौन सा कहां आना है, इसका वजन
20:54
कितना है? सिचुएशन कैसी है? ये ये दोनों
20:57
चीजों का कॉम्बिनेशन जो है, ये एक गिरिफ्त
21:01
में कैसे रहता है? क्योंकि जैसे ही आप
21:02
क्राफ्ट पे तवज्जो देंगे तो पैशन की तरफ
21:04
से नजर चूक जाएगी। जब पैशनेट होंगे तो
21:07
होशमंदी नहीं रहेगी। क्राफ्ट छूट जाएगा
21:09
हाथ से। ये इकट्ठे कैसे चलेंगे दोनों?
21:13
देखिए ये सिर्फ पोएट्री की बात नहीं है।
21:15
दुनिया का तमाम हार्ट जो है वो
21:17
कंट्राडिक्शन में एक अजीब कंट्राडिक्शन
21:20
में ही प्रोड्यूस होता है। बिकॉज़ एव्री
21:22
हार्ट हैज़ टू साइड्स। ऑन वन हैंड यू हैव
21:25
इमेजिनेशन, यू हैव इमोशन, यू हैव पैशन, यू
21:29
हैव फेंटसी, यू हैव ड्रीम्स। ऑन द अदर
21:31
हैंड यू हैव क्राफ्ट यू हैव टोटल कोल्ड
21:36
ब्लडेड लॉजिक
21:39
जो पाइथागोरस एक ग्रीक फिलॉसफरस था जिसने
21:42
कोई 300 साल पहले एक बात कही है कि एट वन
21:45
लेवल म्यूजिक इज प्योर मैथमेटिक्स
21:49
व्हिच इज़ ट्रू एंड व्हिच इज़ ट्रू अ
21:51
पोएट्री आल्सो
21:53
हालांकि लोग इस गलतफहमी में होते हैं कि
21:55
जो फ्री वर्स है उसमें कोई मीटर नहीं होता
21:57
वो ऐसा नहीं है। नहीं।
21:59
यह ऐसा है जैसे कि आप बिलीव करें कि राग
22:01
में कोई मीटर नहीं होता। जब राग गा रहा है
22:04
आदमी एक गाना होता है उसमें बर-बर की
22:06
लाइनें होती हैं। लेकिन जब एक उस्ताद बैठ
22:09
के कोई राग यमन गा रहा है तो यमन की एक
22:11
तान लंबी होगी, एक छोटी होगी, एक मजली
22:14
होगी, एक जाके अचानक रुक जाएगी, एक चलती
22:16
जाएगी। मगर उसके अंदर जो स्कैनिंग है वो
22:21
चार, 8, 12, 16 ये नहीं हो सकता कि
22:24
मैथमेटिक्स
22:24
19 पे खत्म हो जाए। नहीं वो नहीं होगा।
22:27
20 पे होगी। 24 पे होगी तो उसका अपना अंदर
22:31
एक ताल चल रही होती है। यह जो एक फ्रॉड
22:34
चला है इट इज अ टोटल फ्रॉड जिसका नाम है
22:37
प्रोस पोएट्री। अरे भाई जिस तरह से मतलब
22:42
मुर्दा जिंदा नहीं होता है उसी तरह से
22:44
प्रोज़ पोएट्री नहीं हो सकती। कुछ नहीं
22:46
बकवास है। बिल्कुल बकवास। यू एट द मोस्ट
22:51
यू कैन से पोएटिक प्रोज़।
22:53
हां। जो शायराना है
22:56
तुम उसे प्रोज़ जो है उसको एडजेक्टिव और
22:59
नाउन बना रहे हो पोएट्री बिल्कुल गलत
23:02
फ्रॉड है ये
23:04
ये एक दफा मैंने फैज साहब से पूछा था
23:07
कि फैज साहब आपको इतने बरसा बरस हो गए
23:10
लिखते हुए
23:11
आपने कभी नसरी नज़्म नहीं लिखी प्रोज़
23:13
पोएट्री नहीं लिखी तो उन्होंने पता है
23:15
मुझे क्या जवाब दिया उन्होंने कहा हमसे आई
23:18
ही नहीं
23:20
हमें आती ही नहीं बहुत कोशिश कोशिश की आई
23:24
ही नहीं
23:24
मीटर से बाहर ही नहीं जा पाए।
23:27
रिदमम ही रहा है और यह सच है। आप अगर
23:32
थोड़ा भी सुर में गा लेते आप ट्राई कीजिए
23:34
बेसुरा गाना। करके देखिए नहीं हो पाएगा।
23:37
नहीं होगा।
23:37
मैं जाता हूं कहीं फंक्शन में यहां कुछ
23:40
म्यूजिक हो रही है तो पूरा जो ऑडियंस बैठी
23:42
होती है वो क्लैप कर रही होती है। और सही
23:44
क्लैप कर रही होती है। एक होता है उसमें।
23:47
जो जो बेताला
23:49
कड़वा बादाम जो बेताला होता है। मैं उसे
23:52
ढूंढ लेता हूं। कहां है वो? वो मिल जाता
23:54
है। वो बाकी लोग यहां बजा रहे हैं।
23:58
तो ये जो ऐसे ताली बजाते हैं ना ये नसरी
24:00
नज़्म लिखते हैं।
24:05
आपने एक नवेल पढ़ा सबने पढ़ा होगा उमराओ
24:08
जान अदा जो उसकी फिल्म भी बन गई। उसमें
24:11
आखिरी बाप में पूछते हैं कि उमराव साहब
24:14
फला साहब तो आप पे फरेफा थे। आपने क्यों
24:17
नहीं उनसे शादी कर ली? उन्होंने कहा हां
24:19
पयाम तो दिया था मगर हमेशा गलत सम पे सर
24:22
हिला देते थे।
24:26
इसलिए मैंने उनसे शादी नहीं की। तो मतलब
24:29
ये कि ये जो ताल का मेलजोल है ये शायरी
24:33
में भी उतना ही जरूरी है
24:35
जितना कि म्यूजिक में है। क्योंकि ये
24:38
बुनियादी तौर से शायरी में भी एक अंडर
24:41
करंट जिसे कहते हैं कि आहिस्ता-आहिस्ता
24:44
म्यूजिक है। अगर वो नहीं है तो फिर वो
24:47
शायरी नहीं है।
24:48
ये बात हम
24:49
वो किस्सा क्या है कि जैसे देखिए जी बुराई
24:51
करने में जो मजा है वो सही बात करने में
24:54
नहीं है। नहीं।
24:55
तो मेरा दिल लग गया था हम लोगों का बुराई
24:57
करने में। वो हम कर चुके। अब सवाल का जो
25:00
जवाब है जो इन्होंने पूछा था।
25:03
तो ये एक इन अ वे इज़ अ इट्स एन एक्सरसाइज
25:07
इन स्कडोफोर्निया। कि एक ही वक्त में दो
25:11
काम आप कर रहे हैं जो कि मतदात हैं।
25:13
कंट्राडिक्टरी है। ऑोजिट डायरेक्शन में जा
25:16
रहे हैं। एक तरफ आप लिखते वक्त इमोशनल है
25:19
और आपकी आंखों से आंसू बह रहे हैं।
25:20
हां सही है।
25:21
और दूसरी तरफ आप ये देख रहे हैं नहीं
25:23
इसमें ये अलिफ दब रहा है थोड़ा। ये ये
25:26
अलिफ यहां पूरा इस्तेमाल नहीं हो सकता है।
25:29
तो यहां आप ये तो न जो है ये ना के मीटर
25:33
में आ रहा है। ये सब भी देख रहे हैं आप।
25:35
वही दिमाग दरअसल हमारा दिमाग भी जो है
25:38
बड़ी कॉम्प्लिकेटेड चीज है। हम अपने
25:40
कॉन्शियस माइंड को ब्रेन समझते हैं।
25:44
कॉन्शियस माइंड हमारा ऐसा है जैसे हमारे
25:47
घर में ड्राइंग रूम और उसके साथ ही छोटा
25:50
सा ऑफिस। ये है कॉन्शियस माइंड। उसके बाद
25:54
कितने कमरे हैं? कितने उसमें
25:58
गलियां हैं।
25:59
गलियां हैं, कितने
26:01
अटैक्स हैं? कितने बेसमेंट है? उसका कोई
26:04
हिसाब नहीं और वो सारा घर आपका देखा हुआ
26:06
नहीं है। आपका है जरूर आपने सारे कमरे ठीक
26:09
से देखे हुए नहीं है। आपको मालूम ही नहीं
26:12
है कि आपके पास क्या-क्या है। वो
26:13
सबकॉन्शियस लिए बैठा हुआ है। जब आप एक
26:16
टॉपिक में डूबते हैं ये पेंटर के लिए भी
26:20
सही है, सिंगर के लिए भी सही है, राइटर के
26:22
लिए और पोएट के लिए भी सही है। जब आप
26:24
इसमें डूब गए और आप सोच रहे हैं क्या
26:26
करूं? और फिर थक के थोड़े से हार जाते हैं।
26:31
तब आपका सबकॉन्शियस कहता है कि चलो मैं
26:33
तुम्हारी मदद कर देता हूं थोड़ी। अभी कुछ
26:36
चीजें हैं जो बहुत दिनों से मेरे पास रखी
26:38
थी। तुम्हारे काम आ जाएंगी। ले लो। ये
26:41
जैसे मुल्कों के बीच में नो मैन लैंड है।
26:44
हिंदुस्तान और पाकिस्तान हम तो कई बार
26:46
लाहौर गए हैं पैदल चल के तो बीच में एक नो
26:49
मैन लैंड है। दुनिया के तमाम मुल्कों के
26:51
बीच में। वैसे ही शूर और लाशूर के बीच में
26:55
भी एक नो मैन लैंड है। और पोएट्री और
26:58
अच्छा अदब और अच्छा आर्ट उस नो मैन लैंड
27:01
पर क्रिएट होते हैं।
27:02
उधर से मदद आती है थोड़ी कुछ इधर से कोशिश
27:08
तब होता है। जिस दिन मैं समझने लगूं कि
27:12
मैं इतना होशियार हूं कि कुछ भी कर देता
27:14
हूं तो उधर से मदद बंद हो जाएगी। तो राइटर
27:18
में जब तक ह्यूमिलिटी रहती है, आर्टिस्ट
27:20
में जब तक ह्यूमिलिटी रहती है के कुछ है
27:23
जो अभी मेरे पास कॉन्शियस माइंड में नहीं
27:25
है। शायद आ जाए और अपने आप को सरेंडर करे
27:29
अपने काम को तब वो धीरे-धीरे बनता है।
27:32
आपको ऐसे अल्फाज़ याद आते हैं तो आपको पता
27:34
ही नहीं था कि आप जानते थे अल्फाज़। आपको
27:36
ऐसी थॉट आती है जो उन्हें खुद समझने में
27:38
कभी-कभी वक्त लगता है। ऐसा होता है कि
27:41
शायर एक नज़्म लिख दे।
27:43
और उसके माने वो महीने भर बाद समझे। ये
27:45
पॉसिबल है। हालांकि आजकल शायर ऐसे नज़्म
27:49
ज्यादा लिख रहे हैं जो महीने बाद उन्हें
27:51
मालूम होता है कि इसमें कोई माने नहीं। वो
27:53
एक अलग किस्सा है।
27:57
लेकिन ये जो है ये एक मैजिक है।
28:00
ये जो क्रिएटिविटी है ये पूरी आदमी के हाथ
28:04
में नहीं है।
28:04
नहीं
28:05
ये
28:07
कुछ आपके अब एक मोटी मिसाल देता हूं मैं
28:10
आपको।
28:11
बहुत ही भद्दी समझिए आप। आपने अपनी कार
28:14
कहीं पार की बैठे अंदर गए अब आपको चाबी
28:17
नहीं मिल रही बहुत ढूंढा यहां गए कहां
28:20
कहां गया था मैं अच्छा इस कमरे में यहां
28:21
वहां गया था नहीं मिल रही है अच्छा कार के
28:24
बैठ गए उसने आपके मेजबान ने कहा चलिए ठीक
28:26
है वो मिल जाएगी तो हम दे देंगे आपको
28:28
हमारी गाड़ी छोड़ देगी बैठिए ना आराम से
28:30
बात कीजिए अब आप उससे बात कर रहे हैं
28:32
दुनिया की ट्रंप जीत गया तो क्या होगा इस
28:35
पे बात हो अचानक आपको याद आता है कि आपने
28:39
कहां रखी थी वो ये होता है ना
28:42
ये मुझे कैसे अचानक याद आता है? आप तो
28:44
ट्रंप के बारे में बात कर रहे थे। आपके
28:46
दिमाग का एक हिस्सा था जो लगा हुआ था।
28:49
चाबी कहां रखी थी? कुंजी कहां छोड़ी थी?
28:52
और वो जब उसे याद आता है वो आपके शूर को
28:56
कॉन्शियस माइंड को दे देता है। आपको लगता
28:58
है अचानक याद आया। याद नहीं आया आपके
29:00
ब्रेन का एक टुकड़ा था वो इसी पे काम कर
29:02
रहा था। ऐसे ही इसमें है। यह जरा थोड़ी सी
29:06
प्रोजेक्ट मिसाल है। लेकिन यही होता है कि
29:09
जब आप एक जज्बे में, एक ख्याल में, एक
29:11
तसवुर में डूबते हैं और आपको अपनी बेबसी
29:14
का एहसास होता है कि मैं क्यों नहीं कह पा
29:16
रहा हूं जो कहीं है आसपास मेरे। फिर धीरे
29:19
से वो कॉन्शियस माइंड आपकी मदद। एंड यू
29:23
समटाइ्स इट हैप्स देन एनी राइटर विल टेल
29:26
यू। एनी पेंटर विल टेल यू कि आप हेल्थ से
29:30
अपना काम देख रहे होते हैं कि ये अब आगे
29:32
मैं क्या लिखने वाला हूं। कौन से अल्फाज
29:35
में लिखूंगा? आप वॉच कर रहे होते हैं अपने
29:37
आप को। कभी-कभी ऐसा भी होता है।
29:41
क्या कहूं?
29:43
बोलिए।
29:46
देखिए ऐसी अच्छी-अच्छी आपने बातें सुनी।
29:49
मेरे भी ज़हन में एक चीज आई। देखिए हर शायर
29:51
के ज़हन में दिल में एक जज बैठा होता है।
29:56
ये और बात है कि वो उस जज की बात सुनता
29:59
बहुत कम है। लेकिन वो बताता है। जैसे कि
30:03
अभी जावेद ने कहा कि यह जो चीज आप लिख रहे
30:06
हैं यह लफ्ज जो आपने इस्तेमाल किया है यह
30:09
ठीक नहीं है। अगर आप उसकी बात सुन लें और
30:13
उस पे आप मेहनत कर लें तो फिर चीज जगमगाना
30:17
शुरू करती है। यह सबके साथ होता है। एक-एक
30:20
चीज को लोगों ने 10-10 दफा लिखा है। जांचा
30:24
है फिर साफ किया है। फिर देखा है। फिर
30:26
लिखा है। तब कहीं जाके एक चीज होती है। एक
30:29
बात जो मैं आपसे कहना चाहती हूं खासतौर से
30:32
कि शायरी हो जिस अदब के बारे में मैं कहना
30:36
चाहती हूं। चाहे वो नज़्र हो या नज़्म हो।
30:40
आदमी वही अच्छा शेर कह सकता है जो अपने
30:44
चारों तरफ का दर्द महसूस करता है। यह दर्द
30:49
उसकी जात में शामिल हो जाता है।
30:53
इसीलिए शायरी को मौलाना रूम ने जुजस्त
30:57
पैगंबरी भी कहा। एक साहब ने कहा कि शेर
31:02
करना शेर कहना जो काम है वह मुरस्सा सास
31:06
का काम है जो नग नग जड़ता है। किसी ने
31:08
शायरी के लिए कुछ कहा किसी ने कुछ कहा आते
31:12
हैं अर्श से ये मजामी ख्याल में ये नहीं
31:15
होता है। शायरी अपने ज़हन, अपने जज्बात और
31:19
अपने अतराफ के हालात से मुतासिर होती है।
31:23
देखिए जब मुसीबतें आती हैं, शहर बर्बाद
31:27
होते हैं तो शहरों के मलबों के ऊपर आके एक
31:31
बड़ा शायर बैठता है। अहमद शाह अब्दाली की
31:34
जंगों के बाद कौन बैठा? मीर बैठा।
31:39
देखिए आप 1857 के बाद जब हंगामों के बाद
31:44
कौन बैठा?
31:45
गालिब बैठ गया आके।
31:48
उसके बाद आप देखते जाइए कहीं ना कहीं कहीं
31:50
ना कहीं हमारे जमाने में 47 में जो कुछ भी
31:55
हुआ आके कौन तख्त पे बैठा? फैज बैठ गए। यह
32:00
चीजें होती हैं। मलबों के ऊपर बड़े शायर
32:03
नमूदार हो जाते हैं। इसलिए कि उनके ज़हन
32:07
में वो तमाम बातें एक तरह से उनके ज़हन में
32:11
जज्ब हो जाती हैं। वो मुसीबतें, वो
32:14
हंगामे, वो हकतफियां वो तल्खियां उनके शेर
32:18
में ढलती हैं। वही अल्फाज़ होते हैं जो हम
32:22
और आप गुफ्तगू में कहते हैं। ये वो का
32:25
फलां चुनी चुना क्या हो गया? क्यों हो
32:28
गया? अरे हर वो हर वो लफ्ज़ जो आप गुफ्तगू
32:31
में इस्तेमाल करते हैं जब शेर में जाता
32:34
है। शेर के लाइन में मिसरे की लाइन में
32:37
आता है तो उसके मानी ही बदल जाते हैं।
32:40
मानी बदल जाते हैं। एक मामूली सा लब्ज़ है
32:43
तो। आप इसको देख लीजिए। ये तो ये हो गया।
32:46
ये तो यूं हो गया। तो तो कैसा ते वाव जरा
32:50
सा अलिफ यूं करके तो लेकिन जब शायर के
32:54
मिसरे में आता है मानी बदल जाती है
32:56
जैसे
32:57
जैसे मैं आपको मिसाल देती हूं सब आने वाले
33:00
आ गए अपने पर आए तो पर जिनका इंतजार था
33:05
वही ना आए तो
33:09
अब ये तो तो बदल गया
33:12
खत्म हो गया
33:15
मैं आपको बताऊं काफ़ बयानिया हम उसे कहते
33:18
हैं काफ़ और यूं करके के जो जुमले के बीच
33:21
में आता है। नज़र अकबर आबादी ने काफ़
33:24
बयानिया से शेर शुरू किया है। उसने कहा है
33:28
कि के वो शोक जिस घर में मेहमान होगा
33:33
कि वो शोक जिस इसमें इसमें जा वो बड़ी ये
33:39
वाला के नहीं है। के वह शौक जिस घर में
33:42
मेहमान होगा, क़यामत का उस घर में सामान
33:46
होगा।
33:48
ये मैं आपसे सिर्फ यह कहना चाहती हूं कि
33:51
शायरी की जुबान में अल्फ़ाज़ अपना चोला बदल
33:55
लेते हैं। जो आप गुफ्तगू के दौरान
33:58
इस्तेमाल करते हैं। जब वो शेर में चला
34:00
जाता है। पिरो लिया जाता है मोती की तरह
34:03
से। वो जगमगाता है। उसकी शक्ल बदल जाती
34:06
है। उसमें से श्वा फूटती है। लौ देता है।
34:10
लॉ देता है और
34:13
एक शायर के लिए लफ्ज वही है जो एक पेंटर
34:16
के लिए रंग है।
34:18
कोई शक नहीं वो कैसे कहां इस तरह इस्तेमाल
34:20
करें उनमें जिंदगी आ जाएगी। रंग तो ऐसे
34:23
पड़े हो तो क्या है कुछ भी नहीं। मगर एक
34:26
बात ज़रापा मैं तमाम एहतराम के साथ आपसे
34:29
डिसए्री करना चाहूंगा। जरूर कीजिए
34:31
कि शायर जो है वो अपने जमानो मकान से आगाह
34:35
होता है। दुनिया में क्या तबाही क्या
34:37
बर्बादी हो रही है। उसका पूरा उसमें एहसास
34:40
होता है। तो ये अगर हम इस नतीजे पे पहुंचे
34:43
कि तो नतीजा ये निकलता है कि हर शायर बहुत
34:46
अच्छा आदमी होता है।
34:47
हर शायर
34:48
अच्छा आदमी होता है। हालांकि ऐसा नहीं है।
34:50
नहीं ऐसा नहीं है।
34:51
कभी-कभी शायर अच्छे आदमी होते हैं।
34:54
ज्यादातर शायर अच्छे लोग नहीं होते। और
34:57
उन्हें होना भी नहीं चाहिए।
34:59
अब हर
35:00
बात समझ में आती है बात समझ में आती है
35:02
भाई कितनी नेकी करे आदमी इतनी शायरी में
35:05
अच्छी-अच्छी बातें कर रहा अब जिंदगी में
35:06
भी करे वो आप तो सिर्फ जिंदगी में है तो
35:09
आप बेहतर है जिंदगी में अच्छी बातें कीजिए
35:11
सच ये है कि आदमी जो है वो एक है नहीं
35:16
मैं आपको हमारे बुजुर्गों को नाम इनवॉल्वड
35:19
है तो मैं शायद नाम लेने से हिचकिचाऊंगा
35:22
लेकिन मैंने जिंदगी में ऐसे शायर देखे जो
35:24
इतनी हसास शायरी करते हैं इतनी पाकीजा
35:28
शायरी करते हैं कि ऐसा लगता है कि आसमान
35:30
से ही उतरी होगी। ये क्या एहसास है? ये
35:33
क्या इसमें नफासत है? वो अपनी पर्सनल
35:36
जिंदगी में कास्टेंटली व्गर बातें करते
35:38
रहते हैं। गालियां बकते हैं। ये सच है।
35:42
बिकॉज़ एक आदमी के अंदर बहुत से आदमी होते
35:45
हैं।
35:46
ये बिल्कुल सही है।
35:47
अच्छा तीन तरह के लोग हैं। एक जैसा लिखते
35:50
हैं वैसे वो हैं। एक जैसा लिखते हैं उससे
35:55
बिल्कुल अलग लोग हैं। एक जो जरा मिलेजुले
35:58
से हैं। मतलब कृष्ण चंद्र बहुत बड़े अदीत
36:02
थे। मैं उनका फैन हूं और मेरी जो पहली
36:06
शायरी की किताब थी अमूमन होता है नस्ल की
36:08
किताब पे बाहर एक शेर लिखा होता है। मेरी
36:10
शायरी की किताब पे पहले पेज पे नसी कृष्ण
36:13
चंद्र की नस्ल लिखी थी कोटेशन की तरह वो
36:17
इतने खूब मतलब मैंने उनकी मैं खुशकिस्मत
36:21
हूं कि इन लोगों के मैं बहुत करीब रहा
36:22
हूं। मैंने उनकी मैनुस्क्रिप्ट देखी हैं।
36:25
80-80 पेज में एक लफ्ज कटा हुआ नहीं। आप
36:29
पलटते जाइए। लिखा हुआ है। बस एक हाथ से
36:31
लिखा हुआ और हाथ से लिखते थे। वही आदमी
36:34
तीन जुमले एक साथ नहीं बोल सकता था।
36:37
बोलने में
36:38
ही वास सो अपवर्ड। जब बात कर रहा है तो
36:40
बोल नहीं सकता। इस्मत आपा जो थी जैसा
36:43
बोलती थी वैसा लिखती थी। जैसा लिखती थी
36:45
वैसा बोलती थी।
36:47
ऐसे भी लोग देखें जिनकी शायरी में इतना
36:50
इथीरियल क्वालिटी है। पर्सनल लाइफ में
36:52
व्गर और क्रूड लोग हैं। लालची लोग हैं। तो
36:56
ये जरूरी नहीं है। वो एक हिस्सा है ज़हन का
37:00
जो इसे ले रहा है और उससे रिएक्ट कर रहा
37:04
है। बाकी हिस्सा कुछ और है। ये पॉसिबल है।
37:07
उसी शख्स की दूसरी शख्सियत। मुझे तो जैसे
37:09
मैं माफ़ कीजिएगा। आप लोगों में कुछ लोगों
37:11
को शायद थोड़ा खराब भी लगे। मैं ऐसे लोगों
37:13
की बहुत इज़्ज़त करता हूं। जो रिलीजियस है
37:15
मगर अच्छे लोग हैं।
37:18
सर
37:22
मैं ये बात आपसे दिल से कह रहा हूं।
37:27
एंड आई हैव अ रैशन अ लॉजिक बिहाइंड इट।
37:31
मेरे पास एक लॉजिक है। देखिए एक आदमी अगर
37:36
सुबह इबादत करने जाता है। वो मंदिर में
37:38
जाता है, मस्जिद में जाता है, चर्च में
37:40
जाता है। दैट्स नॉटेंट। तो वो जब बाहर
37:42
निकलता है तो ये महसूस करता है ना कि
37:44
मैंने एक अच्छा काम किया।
37:45
अच्छा काम किया उसने।
37:47
हर काम की एक लिमिट है। आप इतना वजन उठा
37:49
सकते हैं। इससे ज्यादा वजन नहीं उठा सकते।
37:51
आप इतनी दूर भाग सकते हैं। उससे दूर नहीं
37:53
भाग सकते। आप इतनी दूर देख सकते हैं। इससे
37:56
दूर नहीं देख सकते। आप इतनी दूर की आवाज
37:58
सुन सकते हैं। उसके बाद में हर चीज का
38:00
कोटा है। कॉमन सेंस कि आप में कॉमन सेंस
38:04
कहता है कि आप में नेकी का भी कोई तो कोटा
38:06
होगा कि इतना आप कर सकते। तो उस नेकी के
38:10
कोटे को हम 10 यूनिट्स में तब्दील कर देते
38:13
हैं। बल्कि पांच में बेहतर रहेगा। पांच
38:18
में आपने उसे कर दिया। तो आपने जब पांच
38:21
वक्त नमाज पढ़ी तो आपको लगा ना पांच अच्छे
38:23
काम किए आपने।
38:25
बिल्कुल सही।
38:26
किए कि नहीं किए?
38:27
किए।
38:28
आपने अपना कोटा इसके लिए इस्तेमाल किया
38:30
इबादत में। मैं करता नहीं हूं। मैं क्या
38:33
करूं? मुझे तो किसी की मदद करनी पड़ेगी।
38:35
किसी को रोटी खिलानी पड़ेगी। किसी की
38:37
स्कूल की फीस देनी पड़ेगी। यह आदमी इबादत
38:41
भी करता है उसके बाद भी नेकियां कर रहा
38:43
है। तो इसका कोटा तो बहुत बड़ा है नेकी
38:44
का। कमाल की बात मैं आई रिस्पेक्ट दिस
38:48
मैन। मेरे लिए तो नेक होना बहुत आसान है।
38:52
इसके लिए मुश्किल है। तो आई जेनुइनली
38:56
रिस्पेक्ट पीपल हु इंस्पाइट ऑफ़ बीइंग
38:58
पोएट्स। इंस्पाइट ऑफ़ गुड राइटर्स। दे आर
39:01
गुड पीपल आल्सो। इसलिए कि वैसे भी पीपल
39:04
थोड़े से बोरिंग होते हैं। तो अब आप कुछ
39:07
बात
39:08
जो बिगड़े होते हैं ना लोग वो दुनिया में
39:10
तरह-तरह के तजुर्ब तरह-तरह की चीज़ जो सीधे
39:12
रास्ते पे चल रहा है बेचारा उतना नेक सा
39:14
आदमी उसे ज्यादा तजुर्बा होता भी नहीं है।
39:16
उसके बावजूद ही अच्छा राइटर है। उसके
39:18
बावजूद ही अच्छा पोएट तो रिस्पेक्टेबल बात
39:21
है। और अगर वो बदमाश है राइटर या पोएट तो
39:25
बिल्कुल समझ में आने वाली बात।
39:27
बदमाशी भूल जाए। किसी ने अच्छी बात कही है
39:30
कि आप दुनिया से लड़िए तो खिताबत पैदा
39:35
होती है। अपने आप से लड़िए तो फिर शायरी
39:39
पैदा होती है।
39:44
मुझे इसी से सवाल मेरे ज़हन में आया जो
39:47
जिक्र किया था जावेद साहब ने कि कुछ शायर
39:50
ऐसे होते हैं जो बहुत अच्छे होते हैं।
39:51
मेरे ज़हन में ऐसे एक शायर आए फैज साहब। तो
39:55
उनका सवाल मैंने आपसे पूछना है आप दोनों
39:57
से और वो यह है कि उन्होंने एक नज़्म लिखी
40:00
जेल में और जब लिख ली तो साथ खत भी लिखा
40:03
एलिस को अपनी बेगम को और कहा कि लोग समझते
40:07
हैं कि किसी शायर के लिए आसान होता है कि
40:10
बस लिख दी। लेकिन लोग यह नहीं देखते कि
40:13
किस कदर अर्क रेजी करनी पड़ती है और एक-एक
40:16
लफ्ज को ऐसे तलाश करना पड़ता है कि वो
40:19
नगीने की तरह आकर बैठे और उसको निकालो और
40:22
उसके बाद देखते हैं कि हां भाई इसका वजन
40:24
पूरा है एहसास पूरा है।
40:26
और ये जो उन्होंने नज़्म लिखी ये है जिंदा
40:29
की एक शाम। मैं आपको उसका एक शेर सुना
40:31
दूंगा। फिर मैंने सवाल इससे जुड़ा हुआ
40:32
पूछना है।
40:33
शाम के पेचखम सितारों
40:34
और वो ऐसे होती है कि वो जेल में है और
40:37
बाहर देख रहे हैं और फैज साहब यह कहते हैं
40:39
कि शाम के पेचुखम सितारों से जीना जीना
40:43
उतर रही है रात।
40:46
यूं सबा पास से गुजरती है जैसे कह दी किसी
40:49
ने प्यार की बात।
40:52
अब वाह कह रहे हैं तो मैं पूरी सुना देता
40:54
हूं।
40:56
सहने जिंदा
40:57
जिंदा के बेवतन अशजार सर निगू महब है
41:01
बनाने में दामने आसमा पे नक्शो निगार
41:04
शाना बाम पे दमकता है मेहरबान चांदनी का
41:08
दस्ते जमील खाक में घुल गई है आबे नजूम
41:12
नूर में घुल गया है अर्श का नील
41:16
सब गोशों में नीलग साए लहलहाते हैं जिस
41:20
तरह दिल में मौजे दर्द फिराक यार
41:25
दिल से पैम ख्याल कहता है इतनी शरी है
41:28
जिंदगी इस पल
41:30
जुल्म का ज़हर घोलने वाले कामना हो सकेंगे
41:33
आज ना कल जलवागाहे विसाल की शमें वो बुझा
41:36
भी चुके अगर तो क्या चांद को गुल करें तो
41:40
हम जाने
41:43
सर इसके एक बात मैं कहना चाहूंगा
41:47
दुनिया में तीन तरह के आर्टिस्ट है
41:51
तीन तरह के
41:52
आर्टिस्ट है उनको तो जाने दीजिए जो खराब
41:55
है उन्हें भूल जाइए जो काउंट हम कर रहे
41:57
हैं एक वो जो आदमी बड़े हैं टैलेंट छोटा
42:04
है लेकिन क्योंकि उनके यहां बड़ी थिंकिंग
42:07
है और अच्छे लोग हैं। टैलेंट इतना नहीं है
42:10
तो अपने टैलेंट को भी इज्जत दिला लेते हैं
42:12
कुछ। कुछ ऐसे हैं जिनका टैलेंट बड़ा है
42:16
लेकिन आदमी बहुत छोटे और घटिया है। तो
42:18
अक्सर ये होता है कि वो अपने टैलेंट को भी
42:20
नीचे खींच लेते हैं। लेकिन बेपनाह टैलेंट
42:23
हो तो वो इस घटियापन को भी ऊपर ले आता है।
42:26
तीसरे वो हैं जो आदमी भी बड़े हैं और
42:29
टैलेंट भी बड़ा है।
42:30
क्या कहना?
42:31
तो आप जिस शायर का जिक्र कर रहे थे वो उन
42:34
रेयर पोएट्स में से जो आदमी बड़ा था और
42:36
शायर भी बड़ा है।
42:37
यानी कोई फर्क ही नहीं है।
42:39
वो गालिब था वो फैज था। मगर बाकी जो है
42:43
इसमें है। कुछ लोग होते हैं टैलेंट इतना
42:45
नहीं है। लेकिन कुछ उनकी समझदारी
42:48
दुनियादारी ऐसी होती है कि उसे ऊपर इज्जत
42:51
दिला लेते हैं। कुछ ऐसे होते हैं बहुत
42:53
अच्छे शायर होते हैं। वो आदमी इतने घटिया
42:55
होते हैं कि अपनी शायरी को भी नीचे ले आते
42:57
हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो कि घटिया होते
42:59
हैं लेकिन उनकी शायरी इतनी जबरदस्त होती
43:01
है कि उस घटियापन के बावजूद ऊपर चली जाती
43:03
है। और कुछ होते हैं जो आदमी भी बड़े होते
43:07
हैं और शायर भी बड़े होते। ऐसा बहुत कम
43:09
होता है। ऐसा बहुत कम होता है।
43:11
वो कभी 100 150 साल में एक बार हो जाता
43:12
है।
43:13
यह बात मैं इसलिए कह सकती हूं कि मैं
43:15
थोड़ा सा मेरा कुर्ब रहा है फैज साहब के
43:18
साथ। उनकी शख्सियत में और उनकी शायरी में
43:22
कोई फर्क ही नहीं था।
43:24
जो मुलायमत और जो अंदाज जो नरमी जो धीमापन
43:30
एक लिहाज से शराफत मुलायमत ये सब चीज उनकी
43:35
शख्सियत में उसी तरह थी जैसी उनकी शायरी
43:39
में थी जैसी उनकी गुफ्तगू में थी। बात
43:42
जावेद ने बिल्कुल आपके सामने सही कही कि
43:45
यह जरूरी नहीं है कि शायर अच्छा हो तो
43:49
आदमी अच्छा हो। आदमी अच्छा हो तो शायर
43:51
अच्छा हो। कहा भी यही जाता है हमारे एक
43:54
बहुत अच्छे शायर थे। उनके बारे में लोग
43:57
कहते थे तरह-तरह की बातें लेकिन वो शायर
43:59
बहुत अच्छे थे। तो मैंने पूछा तो उन्होंने
44:02
कहा मैं लिखते वक्त कोई और होता हूं।
44:05
सही है।
44:05
मैं लिखते वक्त वो होता ही नहीं हूं जो
44:08
मैं हूं।
44:08
सही है।
44:09
इस जवाब
44:10
अच्छा वो हम दोनों ने एक्सचेंज नहीं किए
44:12
नाम।
44:13
लेकिन मैं जानता हूं कि ये भी उसी का
44:15
जिक्र करें।
44:19
हम दोनों को पता है वो कौन है।
44:24
क्योंकि बुराई बुराई में लुत्फ बहुत आता
44:27
है तो मैं यही सिलसिला रोक दूं। मुझे एक
44:29
सवाल भी पूछना है।
44:30
हां पूछिए।
44:30
हम भी पड़े हैं राहों में। ये बताइए कि एक
44:33
तो क्राफ्ट एक चीज है। एक तपस्या है। अर्क
44:36
रेजी जिसको फैज साहब कहते थे कि उसको उस
44:38
चीज को तलाश करना है। लेकिन कुछ लोग ये
44:41
कहते हैं या शायर या आर्टिस्ट भी कि अच्छा
44:43
अभी रात के पिछले पहर मुझे कुछ ऐसा होता
44:46
है, कुछ उतरता है, ऊपर से कुछ अता होता
44:48
है। तो आर्ट फॉर्म जो है वो क्या इंसान के
44:52
थ्रू गुजर कर जाती है और इंसान जो है वह
44:54
सिर्फ महज एक प्याला है जिसमें कुछ आता है
44:57
या उसका अपना भी कुछ उसमें है कि जोर
44:59
लगाने से सीखने से क्या सीखा जा सकता है
45:01
ये काम
45:02
ये ऊपर से अगर आता है तो उसी जबान में
45:04
क्यों आता है जो आप जानते हैं भाई चाइनीस
45:07
में आ जाए ग्रीक में आ जाए
45:10
ये ऊपर ऊपर कुछ है नहीं समझे ऊपर सिर्फ
45:13
पोल्यूटेड हवाएं हैं आजकल बाकी ये के जहां
45:17
तक नीचे की बात है वही आपका जो लाश मशहूर
45:21
है उसे आप ऊपर समझते हैं। वो आपके सर के
45:23
ही अंदर है। अगर वो रगें जो आपके ब्रेन को
45:27
आपसे कनेक्ट करती है वो काट दिए जाए तो
45:29
ऊपर से कुछ नहीं आने वाला।
45:31
कुछ नहीं आता।
45:33
बिल्कुल सही।
45:34
जरापा मुझे एक शरारत करनी है आपके साथ। वो
45:36
ये है कि साहिर से लेके फैज से लेके जोश
45:40
से लेके जावेद साहब से लेके इन सब लोगों
45:42
ने अपनी शायरी भी की और कुछ ने ज्यादा कुछ
45:46
नहीं कहा। फिल्मी गीत लिखे। आपने फिल्मी
45:48
गीत नहीं लिखे। ये क्या ये खुद इंतखाब ना
45:51
लिखने का
45:52
मुझसे आए नहीं
45:54
जैसे उन्होंने कहा मुझसे ना फिल्मी गीत
45:57
लिखना आसान काम नहीं है मैंने देखा है
46:00
किन-किन मुश्किलों से इन पे तो गुजरी होगी
46:02
मैंने तो आंखों से देखा है मैं कि भाई वो
46:06
म्यूजिक डायरेक्टर अलग कुछ निकाल रहा है
46:08
धुन शायर का कहीं लव फिट हो रहा है नहीं
46:11
हो रहा है ये तो यही बता सकेंगे किन
46:14
मुश्किलों से आदमी गुजरता है तो मुझसे आए
46:16
हां सीरियल का मुखड़ा हुआ करा किसी ने कहा
46:19
ये लिख दीजिए तो मैंने लिखा है। बाकी मेरा
46:22
दिल बहुत है कि मैं भी कोई अच्छा सा
46:23
फिल्मी गीत लिखूं मुझसे आया ही नहीं तो
46:26
मैं क्या करती? देखिए जिन पे गुजरी होगी
46:29
गुजरी होगी। मुझ पे तो कुछ नहीं गुजरी।
46:31
मैं कुछ लोगों पे जरूर गुजराऊंगा।
46:34
जहां मेरी मर्जी की बात नहीं हुई। मुझे
46:36
लगा राय लोगों की सुनना बुरी बात नहीं है।
46:39
आप सुनिए अगर वो सही राय दे रहा है। मान
46:41
भी जाए आपका ही काम बेहतर होगा। लेकिन अगर
46:43
लगे कि ये जिसके साथ मैं काम कर रहा हूं
46:46
ये जायल है और गलत राय दे रहा है तो मैं
46:48
उसका काम छोड़ देता हूं।
46:50
मैं करता ही नहीं तो उसके बाद क्या है?
46:54
अगर तुम्हें हमारी बात पे भरोसा नहीं है
46:56
तो तुम किसी और को ले लो। मैं छोड़ देता
46:58
हूं।
46:58
यू आर इन अ पोजीशन टू डू दैट।
47:00
नहीं नहीं नहीं। ये पोजीशन में कभी नहीं
47:02
होता आदमी। इसका ताल्लुक पोजीशन से नहीं
47:04
है। मिजाज से।
47:05
अगर बेचारा किसी को जरूरत हो उसको डांट भी
47:07
रहा है।
47:07
नहीं नहीं नहीं मुझे भी जरूरत रही है। मैं
47:09
तो शुरू से ऐसा ही था। मैं एक पिक्चर कर
47:11
रहा था सरद लुटेरा ₹1 महीना पे डायलॉग लिख
47:14
रहा था ₹100 महीना
47:16
तो और मेरी उम्र थी 21 या 22 साल जब मैं
47:20
नया-नया गया था तो वो प्रोड्यूसर
47:22
डायरेक्टर ने क्लाइमेक्स में शेख मुख्तार
47:25
के डायलॉग चंट फिल्म थी सरहदी लुटेरा
47:28
अच्छा भाई वो कौन देखने वाला है कहीं सी
47:31
टीचर से सिनेमा हाउस में तीन-चार हफ्ते
47:34
चलेगी चली जाएगी कोई जानता भी नहीं उसे
47:36
मेरे डायलॉग उसने क्लाइम्स में चेंज कर
47:39
दिए मैंने मैंने वो ₹100 महीना की नौकरी
47:41
छोड़ दी। मैंने कहा वो आप मैं नहीं कर
47:44
सकता। आप मेरा नाम मत दीजिएगा। मेरा नाम
47:45
जानता कौन था? तो वो आपका ये कभी जो
47:50
पोजीशन की बात है ना वो जैसे कंजूस आदमी
47:53
तो कंजूस ही रहेगा। वो चाहे उसके पास
47:56
करोड़ों हो तब भी कंजूस रहेगा। डरपोक आदमी
47:59
को आप पिस्तौल देगी तो बहादुर हो जाएगा
48:00
क्या? वो डरपोक ही रहेगा। ये मिजाज की बात
48:03
है। ये पोजीशन की बात नहीं है। देखा जाएगा
48:05
जो भी होगा। हम तो सारी जिंदगी ऐसे ही
48:08
जिए।
48:08
मैं एक एक शायर मेरे पास आए। कहने लगे आप
48:11
मेरी मदद कर दीजिए। क्योंकि हीरो जो है वह
48:14
पाइप के जरिए हीरोइन के कमरे में जाता है।
48:18
तो मैं चाहता हूं कि गाने में पाइप का लफज़
48:20
आ जाए। मैंने कहा आप कितना ही अच्छा गाना
48:24
क्यों ना बना लें। पाइप उसमें डालेंगे तो
48:27
कैसे आएगा भाई? कैसे? वो कह रहे हैं कि
48:30
नहीं पाइप के जरिए क्योंकि वो चढ़ के जा
48:33
रहा है। तो आप इसका बताइए कुछ बना दीजिए।
48:36
पाइप को रोमांटिक बना दीजिए। भाई, कैसे
48:38
बना दे?
48:39
अरे, मिश्रा मैं दे देता हूं, बाकी आप कर
48:42
लीजिए। इश्क पर जोर नहीं है वो। आतिश
48:46
पाइप।
48:52
ना उतारे ना बने। जो चढ़ाए, ना चढ़े और
48:56
उतारे ना बने। हो गया।
49:00
मैं नहीं पाया।
49:00
एक एक मैं ये सब्जेक्ट मेरा है। मैं एक
49:04
बात बता। देखिए फर्क है। मैंने भी कई गाने
49:07
इस तरह के लिखे हैं जिस पर लोग एतराज करते
49:10
हैं। फर्क ये है कि आप अगर एक सेमिनार में
49:14
बोल रहे हैं यहां पढ़े लिखे लोग बैठे हैं।
49:17
इस टॉपिक को अच्छी तरह जानते हैं तो आपकी
49:19
वोकैबलरी आपके बोलने का अंदाज आपका इशारा
49:23
आपकी अलामत कुछ और होंगी। अगर आप वही बात
49:27
25,000 आदमी के मजमे से कहना चाह रहे हैं
49:30
तो आप दूसरी तरह से वो बात कहेंगे। ये जो
49:33
है जोन कोई अच्छी और बुरी नहीं होती है।
49:36
आप अच्छा फिल्मी गाना लिख सकते हैं।
49:38
इंतहाई बुरी गजल लिख सकते हैं। लेकिन
49:40
कभी-कभी यह आप आपका नहीं है। मिसाल तौर
49:44
तौर पे अगर शेक्सपियर ने शयलॉग के डायलॉग
49:47
लिखे तो इसके मतलब नहीं है कि शेक्सपियर
49:50
जो था वो जू हेटर था। ये डायलॉग का पॉइंट
49:54
ऑफ व्यू दे रहा है वो। जो विलेन का पॉइंट
49:56
ऑफ व्यू अगर मतलब कल को आप कहें तुम तो
49:58
डकैत रह चुके हो। तुमने गब्बर सिंह के
50:00
डायलॉग लिखे। तो वो उसका पॉइंट ऑफ व्यू
50:03
मेरा नहीं है। इसी तरह गाने भी होते हैं।
50:06
गानों की एक सिचुएशन होती है। तो आपको ये
50:08
पता होना चाहिए कि इसमें किस तरह की जबान
50:13
पाइप भी आ सकता है गाने में। कोई हर नहीं।
50:15
लेकिन आप एक कॉमन मैन के लिए एक इस तरह की
50:18
सिचुएशन के लिए सही लिख रहे हैं कि नहीं।
50:20
मिसाल के तौर पर मैंने एक गाना लिखा था
50:22
जिसपे मुझे बहुत क्रिटिसाइज किया गया। और
50:25
बल्कि मैं एक मर्त कराची गया था तो एक
50:27
अदबी महफिल में दाखिल हुआ तो पीछे से किसी
50:29
ने आवाज दी मुझे। के आप थी वहां
50:32
हां
50:32
के वो सुनाइए एक दो तीन चार
50:34
एक दो तीन पढ़ा है
50:35
हां
50:36
तो मैंने कहा सुना देता हूं आपको उसमें
50:38
क्या है सबसे पहले वही सुनिए और अगर खराब
50:40
लगे तो हुट भी कीजिएगा
50:43
ये क्या है अरे भाई सिचुएशन ये थी कि एक
50:46
लड़की है जो नौटंकी में काम करती है। अब
50:48
नौटंकी में मेरे ख्याल से अगर वह स्टेज पे
50:51
गा रही होती कावे कावे सख्त जानी हाय तनाई
50:54
ना पूछ तो कुछ ठीक नहीं लगता
50:58
तो मुनासिब नहीं होता शायद
51:02
तो ऐसा गाना होना चाहिए जो नौटंकी का लगे
51:06
अच्छा हमारे मुल्क में बरसगीर में एक
51:09
ट्रेडिशन रही है जिसे बारामासा कहते हैं।
51:12
12 मासा मतलब एक बिरहम यह डिस्क्राइब करती
51:15
है कि यह मैंने एक-एक महीना तेरे बगैर
51:19
कैसे
51:20
गुजारा
51:20
गुजारा मैंने उस 12 मसा को श्रिंक करके एक
51:24
महीने में डाल दिया वो ट्रेडिशन को मैं आप
51:27
लोगों को सुनाता हूं उसके अंतरे जो कभी
51:29
किसी ने सुने नहीं शायद वो 13 पे तो नाचना
51:32
शुरू कर देते हैं तो फिर सुनेंगे कैसे आगे
51:37
तो
51:38
एक दो तीन चार पांच छ 7 8 9 10 11 12 13
51:43
तेरा करूं दिन गिनगिन के इंतजार आजा पिया
51:47
आई बहार
51:48
14 को तेरा संदेशा आया 15 को आऊंगा ये
51:51
कहलाया 14 को आया ना 15 को तू तड़पा के
51:54
तूने मुझे क्या पाया 16 को भी 16 किए थे
51:57
श्रृंगार आजा पिया आई बाहर 17 को चमजी संग
52:00
छूट गया 18 को दिल टूट गया रो-रो गुजारा
52:04
मैंने सारा 19 20 को दिल के टुकड़े हुए 20
52:07
फिर भी नहीं दिल से गया तेरा प्यार आजा
52:10
पिया आई बाहर 21 बीती 22 गई 23 गुजरी 24
52:15
गई 25 26 ने मारा मुझे बिरहा की चक्की में
52:19
पिस गई दिन बस महीने के हैं और चार आजा
52:22
पिया ही बाहर
52:28
ये एक प्योरिटन एटीट्यूड है ये हाई हाई ये
52:32
हाई नोस किए हुए स्नोप्स का कि जो चीज
52:35
कॉमन मैन की समझ में आए वो खराब है।
52:38
ये उनका अंदाजा है।
52:40
अरे भैया तो फिर सारे फोक सॉन्ग बकवास है।
52:43
तुम सारी फोक म्यूजिक को कहो कि बहुत ही
52:45
सबस्टैंडर्ड चीज है। यह क्या बात है? कहां
52:48
क्या सिचुएशन है? क्या मीनिंग मैंने
52:51
मीनिंगलेस गाने लिखे हैं। इसलिए कि डिमांड
52:53
थी उनकी। पूरे गाने में एक वर्ड मीनिंग
52:56
नहीं रखता। आप लिख के दिखाइए। बहुत
52:59
मुश्किल काम है। मीनिंगलेस बात कर लेना।
53:01
जब बामाने बात करना चाह रहे हैं आप तो
53:04
आसान है। लेकिन मीनिंगलेस को मीनिंगलेस
53:06
बनाके लिखना बहुत मुश्किल काम है।
53:08
जिब्रिश
53:10
हां दर्ज डिस्को वो पूरा मीनिंगलेस गाना
53:13
है। उसकी जरूरत थी फिल्म में या यह कि
53:16
उसके अलावा एक और गाना दरमियान एक पिक्चर
53:18
थी उसमें एक गाना मैंने लिखा दो अंतरों के
53:21
साथ। आई हैव नॉट यूज्ड अ सिंगल वर्ड ओनली
53:23
साउंड्स। वहां वो जरूरत थी। तो ये आप
53:28
जो अ राइटर इज अ काइंड ऑफ़ अ डोमिनेंट
53:32
एक्टर। उसको रोल दिया गया है ये कि आप ये
53:35
करिए। तो वो वो कर रहा है। वो कैरेक्टर
53:38
करेगा। उस कैरेक्टर की वो डिमांड है। उस
53:40
सिचुएशन की वो डिमांड है। और अगर आप नहीं
53:42
कर सकते तो ये आपकी इनकैपेबिलिटी है। आपके
53:45
पास इतना एल्बो रूम क्यों नहीं है? जब आप
53:48
मैंने जो जगजीत के लिए गज़ें लिखी हैं
53:51
दो-तीन मैंने एल्बम किए उनमें से एक भी
53:53
गज़ल जो पब्लिश थी वो अलग बात है। वरना जो
53:56
मैंने उसके लिए लिखी है, एक भी मेरी
53:57
किताबों में नहीं है।
53:59
वो बीच के लोगों के लिए है। जो गजल के
54:02
शौकीन होते हैं ना दे लव गजल। वो उनके लिए
54:06
लिखी है।
54:08
तो ठीक है। वो एक कमर्शियल एक्सरसाइज है।
54:11
दे पेड मी वेल। मैंने उनको वैसे लिख के दे
54:13
दिया। जाओ खुश रहो। मैं अपनी किताब में
54:15
थोड़ी रखूंगा उसे।
54:18
नहीं ये बिल्कुल सही कहा। बहुत अच्छी बात
54:21
आपने सुनी। ये अभी जो नज़्म सुनाई अदील ने
54:26
फैज साहब की। तो मैंने फैज साहब से पूछा
54:28
था कि ये इमेजरी कैसे आपके सहने जिंदा के
54:31
बेवतन अशार सर निगू महव हैं बनाने में
54:36
दामन आसमा पे नक्शो निगार ये क्या कैसे
54:40
आया ये ज़हन में तो उन्होंने कहा भाई सीधी
54:43
सी बात है जेल के सलाखों में से जितना
54:47
आसमान नजर आता था दो चार ऊंचे दरख्त नजर
54:51
आते थे फासला बहुत था तो हमें यूं लगता था
54:55
कि वो आसमान में चिपके हुए हैं। आसमान से
54:59
बिल्कुल लगे हुए हैं। इसीलिए यूं लगता एक
55:02
लफ्ज उन्होंने इस्तेमाल किया कि हमें यूं
55:05
महसूस होता था जैसे किसी ने आसमान पर
55:08
मनव्बतकारी कर रखी हो। अब मनवतकारी के
55:12
माने नहीं मनवतकारी जरदोजी जैसे कि
55:15
निकालते हैं कपड़ों के ऊपर उस हमें लगता
55:18
था कि किसी ने फूल बेल आसमान पे बना दिए।
55:22
तो ये इमेजरी उस वक्त हमारे ज़हन में आई।
55:25
अजीब आदमी थे कि उन्होंने कभी अपनी शायरी
55:28
पर या किसी और पे यानी मैंने उनको कोई नाज
55:32
करते हुए कभी नहीं देखा बल्कि मैंने तो उस
55:36
तब उनको हमेशा एक मतलब भाई हम तो हम कहां
55:41
भाई हमारी सदी में तो हो गया एक शायर
55:44
इकबाल हो गया। किसी ने कहा नहीं नहीं
55:47
हमारी सदी के तो आप ही हैं। भाई वो तो
55:49
इकबाल हो गए। बात यह है कि शायरी की जो
55:52
सल्तनत है वह बड़ी अजीब सल्तनत होती है।
55:56
बड़ी मुश्किल से एक सदी में आके एक शायर
55:59
मसनदे सदारत पे बैठता है और बाकी तो काम
56:03
चलते रहते हैं। तो ये है कि इकबाल हो गया।
56:07
हम तो गुड सेकंड डिवीजन में हैं। हमेशा
56:10
कहते थे कि एक सेकंड डिवीजन है।
56:12
देखिए फैज साहब अफोर्ड कर सकते थे बॉस्ट
56:14
होना। हम लोग नहीं कर सकते थे। हम कहेंगे
56:17
तो लोग मान जाएंगे।
56:21
नहीं तुम गुड सेकंड डिवीजन में अब नहीं हो
56:24
भाई इसीलिए तो कह रहे हो ये बात
56:25
देखिए एक और बात बताओ
56:28
शायर से ये पूछना कि तुमने कैसे लिखा वो
56:30
कुछ बता देगा एक्सप्लेनेशन दे देगा तो अब
56:32
एक्सप्लेनेशन दे दी तो फिर हम भी वैसे ही
56:34
लिखने लगे अब तो हमारे पास है ऐसा नहीं
56:36
होता है
56:37
वो जिस वक्त वो लिख रहे थे वो कोई वाकई को
56:40
एक अजीब एक वज में एक अजीब तरह के माहौल
56:45
में एक अजीब दुनिया में थे तो लिख लिया
56:47
फिर दुनिया से वापस आए तो उनका अच्छा अभी
56:49
लोगों को सुना देते हैं।
56:50
ये अगर इतना आसान हो कि शायर बता दे ये ये
56:53
तरीका है करने का तो फिर सब फैज है मतफज
56:55
हो जाना।
56:56
हां ये इकबाल ने
56:57
100 साल में एक ना हो।
56:59
इकबाल ने भी ये लिखा है जावेद। उन्होंने
57:02
कहा बहुत सी नज़्में जो हैं
57:04
कैसे हो गई? कैसे मेरे ज़हन में आए हैं?
57:07
कैसे वो लफज़ आए ये मेरी समझ में।
57:10
बाद में तो उन्होंने काफी ऐसी नज़्में
57:11
लिखी। ना लिखते तो अच्छा था।
57:15
साथियों ऐसी गुफ्तगू होती रहेगी।
57:18
फिराक साहब से माज़रत हल्की सी गुस्ताखी
57:21
मैं कर रहा हूं। आने वाली नस्लें तुम पर
57:24
फक्र करेंगी हम असरो जब भी उनको ध्यान
57:27
आएगा तुमने इनको देखा है।
57:37
जहरा आपा और जावेद साहब का शुक्रिया। जश्न
57:40
रेखता का बहुत-बहुत शुक्रिया और आप सबका
57:42
बहुत-बहुत शुक्रिया।
— end of transcript —
Advertisement