[00:00] मुश्किल ये है कि आप अंग्रेजी के अलावा [00:02] कोई जबान बोले तो आप पढ़े लिखे नहीं लगते। [00:05] लेकिन अब आप बर्दाश्त कर लें। तो मैंने [00:08] कहा अच्छा हुजूर एक बात बताएं कि [00:10] बिल्लियों की बहुत आदत होती है। अक्सर [00:12] जाके अवन में बच्चे दे देती हैं। तो उन [00:14] बच्चों को आप बिस्किट कहते हैं क्या? एक [00:17] मकान के एक कमरे में एक गोरा चिट्टा आदमी [00:21] और एक नन्हा मुन्ना बच्चा बाल्टी से नहाए। [00:24] बावरची ने नाश्ता दिया जिसमें उड़द की दाल [00:27] और तो थे। [00:29] आदमी उठा चीख हटाई संदूक खोला उसमें से [00:34] पिस्तौल निकाला दीवार पर टकी बंदूक ली और [00:37] बाहर खड़े रिक्शे में बैठ के चला गया [00:41] बच्चा बेबस देखता रहा अब इसे जरा स्कैन [00:45] करते [00:46] हैं एक मकान मकान [00:49] अरेबिक एक कमरे में [00:52] इटालियन कमरा इज [00:55] इटालियन बाल्टी इज पोर्चुगी [00:58] गोरा चिट्टा आदमी में चिट्टा [01:01] पंजाबी नन्हा नन्हा मुन्ना बच्चा में [01:05] नन्हा [01:06] गुजराती बच्चा [01:09] परशियन बावर्ची [01:13] टर्किश खवातीन हजरात मोज़ [01:17] हाज़रीन मुझे सख्त इंस्ट्रक्शंस दिए हैं। [01:20] हुक्म ये है कि आप उर्दू में बोलेंगे। [01:24] मुश्किल यह है कि आप अंग्रेजी के अलावा [01:26] कोई जुबान बोले तो आप पढ़े लिखे नहीं [01:28] लगते। लेकिन अब आप बर्दाश्त कर [01:33] लें। पहले तो मैं बहुत-बहुत शुक्रिया अदा [01:37] करना चाहूंगा किशोर आपका के आपने इतने अहम [01:42] तकरीब में जो पहला आपके वालिद का इस तरह [01:46] का फंक्शन है उसमें मुझे इज्जत बख्शी आपने [01:50] और मैं जानता हूं कि आपके दिल में क्या [01:53] इज्जत और क्या मोहब्बत है उनके लिए। तो [01:56] अगर आपने मुझे याद किया इस काम के लिए तो [01:59] ये एक बहुत बड़ा कॉम्प्लीमेंट है जिसका [02:02] मैं वाकई शुक्रगुजार [02:05] हूं। ये हालांकि शायर ने तो ये शराब के [02:10] बारे में कहा था लेकिन ये उर्दू के बारे [02:13] में भी सच है कि छूटती नहीं है मुंह से ये [02:16] काफिर लगी हुई। [02:19] तो इसमें एक कोई है [02:24] बात जो ये [02:27] जुबान मर नहीं सकती और कत्ल नहीं हो पाती [02:33] कुछ खूबी है इसमें ये आवाम की जुबान है [02:37] मगर इससे पहले कि हम सोचे किसकी जुबान है [02:40] कहां पैदा हुई कहां पली पड़ी कहां जवान [02:42] हुई सवाल ये कि जबान होती क्या है हम जब [02:46] बात करते हैं उर्दू जबान, हिंदी जबान, [02:49] अंग्रेजी जबान, फ्रेंच जबान, तमिल जबान [02:53] जबान क्या चीज [02:54] है? जबान क्या अपनी स्क्रिप्ट है? [03:01] अगर स्क्रिप्ट है तो यह अगर जो पोस्टर लगा [03:04] होता है के यू सी एच के यू सी एच एच ओ टी [03:09] ए एच ए आई ये अंग्रेजी है कुछ-कुछ होता [03:14] है। ये तो इंग्लिश में लिखा है। रोमन में [03:17] लिखा है। और सच तो ये है कि अंग्रेजी फिर [03:19] रोमन है। अंग्रेजी ही नहीं है। चाहे वो [03:22] फ्रेंच हो, जर्मन हो। ये सब एक्चुअली तो [03:25] इटालियन लैंग्वेज है। अगर हम ये मान ले कि [03:29] स्क्रिप्ट जबान है तो ये तो सब सारी यूरोप [03:33] की आधी जो यूरोप है वो तो मांगे कि [03:36] स्क्रिप्ट पे काम कर रहा [03:38] है। तो [03:42] क्या जुबान वोकैबलरी [03:45] है? [03:47] अच्छा ये ऑल एयर कंडीशंड है। मैंने [03:51] अंग्रेजी बोली। [03:55] चार लफ्ज थे। यह हॉल एयर कंडीशन है। इसमें [03:59] जो ज्यादा इंपॉर्टेंट लफज़ थे वो था हॉल और [04:02] एयर [04:03] कंडीशन। तो क्या मैं अंग्रेजी बोल रहा था? [04:06] नहीं। क्यों नहीं बोल रहा था? इसलिए कि [04:10] इधर ये लगा है और उधर है लगा [04:13] है। तो ना स्क्रिप्ट, न वोकैबलरी। [04:18] अल्टीमेटली जबान अपना सिंटेक्स है, अपना [04:22] ग्रामर है। लफज़ तो कहीं से भी आ जाते हैं। [04:26] मैं माफी चाहता हूं कि ये जो एक पैराग्राफ [04:30] मुझे रट गया है। मैंने इतनी बार सुनाया [04:32] है। तो ये एक रटाई बात मैं बोलने वाला [04:34] हूं। लेकिन वो अभी भी असर करती है। तो मैं [04:40] आपसे अर्ज करता हूं। मैं एक छोटा सा [04:43] पैराग्राफ बोलूंगा। [04:46] उसमें किसी को भी इस हॉल में कोई लफ्ज [04:49] मुश्किल लगे तो हाथ उठा [04:52] दीजिएगा। एक मकान के एक कमरे में एक गोरा [04:56] चिट्टा आदमी और एक नन्हा मुन्ना बच्चा [04:59] बाल्टी से [05:01] नहाए। बावरची ने नाश्ता दिया जिसमें उड़द [05:05] की दाल और तो थे। आदमी उठा चीख हटाई संदूक [05:11] खोला। उसमें से पिस्तौल निकाला। दीवार पर [05:15] टकी बंदूक [05:16] ली और बाहर खड़े रिक्शे में बैठ के चला [05:20] गया। [05:23] बच्चा बेबस देखता [05:26] रहा। कोई [05:29] मुश्किल कोई भी मुश्किल [05:32] नहीं। अब इसे जरा स्कैन करते [05:37] हैं। एक मकान मकान अरेबिक। [05:41] एक कमरे में [05:43] इटालियन कमरा इज [05:46] इटालियन बाल्टी इज [05:49] पोर्चुगीज गोरा चिट्टा आदमी में चिट्टा [05:52] पंजाबी [05:54] नन्हा मुन्ना नन्हा मुन्ना बच्चा में [05:57] नन्हा [05:58] गुजराती बच्चा [06:02] परशजियन बावरची [06:04] टर्किश नाश्ता [06:07] परशियन उर [06:09] तमिल टोस्ट इंग्लिश [06:12] टोस्ट चिक टर्किश संदूक टर्किश पिस्तौल [06:17] इंग्लिश दीवार परशियन बंदूक टर्किश रिक्शा [06:24] जैपनीज रिक्शा इज अ जैपनीज [06:28] वर्ड और [06:30] बेबस है विवश [06:34] संस्कृत इतने सिंपल से चार लाइनों में [06:39] हमने 12 13 लैंग्वेज के वर्ड इस्तेमाल [06:45] किए जो हम बोलते हैं हमें मालूम ही नहीं [06:49] है कि कौन सा शब्द कहां से आया है और कब [06:53] आया है और कैसे आ गया। [06:56] अभी मैं पढ़ रहा था कि एक साहब ने रिसर्च [07:00] की है कि मराठी में तकरीबन 30% वर्ड जो है [07:05] वो परर्शियन बेस्ड है। हैरत की बात नहीं [07:08] है। वैसे हमें मालूम नहीं था कि जो पोर्ट [07:11] एरियाज होते हैं उनमें बड़ी आराम से बाहर [07:13] के लफ्ज़ आते हैं। सेलर सिर्फ सामान नहीं [07:16] लाते। वो लफज़ भी लाके छोड़ देते हैं और वो [07:20] लफज़ अपना लिए जाते [07:23] हैं। कमाल यह है कि लफज़ हम या कोई भी [07:26] लैंग्वेज एज इट इज नहीं लेते। जैसे का [07:31] तैसा वैसे नहीं लेते। उसे हम अपने [07:33] सिंटेक्स में अपने ग्रामर में डाल देते [07:35] हैं। मतलब हवा परिजयन है [07:40] लेकिन हवाएं परिशियन नहीं [07:42] है। हवाओं पर नहीं [07:45] है। दोस्त पर्शियन है। दोस्ती परशियन नहीं [07:49] है। और दोस्तों भी पर्शियन नहीं है। और [07:52] दोस्तों भी पर्शियन नहीं है। दोस्तों और [07:56] दोस्तों में भी फर्क है। ये गलती हमारे [07:58] पॉलिटिकल लीडर बहुत करते रहते हैं। जहां [08:02] दोस्तों बोलना चाहिए वहां दोस्तों बोलते [08:04] हैं। जहां दोस्तों बोलना चाहिए वहां [08:06] दोस्तों बोलते हैं। दोस्तों सेकंड पर्सन [08:08] से बोल सकते हैं। मेरे [08:11] दोस्तों, मेरे भाइयों, मेरी बहनों, लेकिन [08:16] जब आप थर्ड पर्सन बनाएंगे उसे तो मैंने [08:19] अपने भाइयों से कहा, अपने दोस्तों से कहा, [08:23] नेजल थर्ड पर्सन में आता है। बिना नेज़ल [08:27] सेकंड पर्सन। [08:29] खैर इतना ज्यादा एक्सपेक्ट नहीं करना [08:32] चाहिए। ठीक है जैसे भी काम चल रहा है चलने [08:38] दो। [08:40] तो सवाल ये है कि ये उर्दू क्या है? ये [08:46] कहां से आई? ये कैसे बनी? इसके बारे में [08:50] भी अजीब अजीब कहानियां हैं। अजीब अजीब [08:52] किस्से हैं। मुझे एक मैं अच्छी खासी पढ़ी [08:56] लिखी औरत हमारी दोस्त हैं। बड़ी अच्छी [08:59] पेंटर [09:00] हैं। मुंबई में रहती हैं। तो मुझसे [09:03] उन्होंने बड़ी हम लोग बड़े गहरे दोस्त [09:05] फैमिली फ्रेंड। तो एक दिन उन्होंने ख्याल [09:07] आ गया। तो मुझसे पूछा उन्होंने के जावेद [09:11] ये उर्दू तो बाबर के साथ आई थी ना। तो मैं [09:14] हां उसके ही घोड़े पे पीछे बैठी हुई थी [09:16] बुर्का पहने। [09:19] और बस वो उसने बाबर ने उसे यहां उतार [09:21] दिया। वो तो कुछ दिनों बाद मर गया। यह इधर [09:23] ही रह गई। तो मतलब देखिए इल्म की कोई [09:26] लिमिट हो तो हो। जियालत की कोई लिमिट नहीं [09:30] है। दुनिया की हर गलत चीज की कोई लिमिट [09:33] नहीं। शराफत की लिमिट तो हो। कमी की लिमिट [09:36] नहीं है। तो हर चीज जो बुरी है और गलत है [09:40] वो इनफिनाइट [09:42] है। [09:44] तो ये जुबान ये प्योरली हिंदुस्तान की [09:48] जुबान है। इसलिए कि जब मैं कहता हूं तुम [09:51] खाना खाओगे? पानी पियोगे? घर जा रहे हो? [09:56] भूख तो नहीं लग रही। ये कौन सी जुबान [10:00] है? ये अगर देवनागरी में लिख दोगे तो [10:03] हिंदी हो जाएगी। नस्ताख में लिख दोगे तो [10:06] उर्दू हो जाएगी। और वो लोग यूपी में जिनकी [10:10] आज भी कमी नहीं है जो ना हिंदी लिख सकते [10:13] हैं ना उर्दू लिख सकते हैं ना कुछ पढ़ [10:15] सकते हैं। वो जब ये कहते हैं तुम कहां जा [10:17] रहे हो? तो कौन सी जबान बोल रहे हैं? वो [10:20] कौन सी जुबान है? तो कोई हैरत नहीं है कि [10:25] तकरीबन 300 350 साल तक इस जुबान का नाम [10:28] हिंदवी था। [10:31] जमाने हिंदुस्तान जब यह दखन में गई तो उसे [10:34] जुबाने हिंदुस्तान कहते थे। [10:41] हिंदुस्तानी अब ये पैदा कहां हुई? पहली [10:44] बार इसने जन्म कहां लिया? इस पे बहुत सारे [10:47] क्लेम [10:49] है। पंजाब से लेकर दकन तक क्लेममेंट्स [10:53] मौजूद है। आपको एक किताब है महमूद शरानी [10:58] या शामी या शेरी मुझे सरनेम उनका ठीक से [11:02] याद नहीं। उर्दू इन [11:04] पंजाब। उनका कहना है कि उर्दू पंजाब से ही [11:08] शुरू हुई। [11:09] इसलिए कि वहां जो बाहर के लोग आए तो सबसे [11:13] पहले पंजाब में आए और वहां रहे और ठहरे और [11:16] वहां से ट्रेड कर रहे थे और जो हरियाणा तो [11:20] उस समय पंजाबी था तो वो जो हरियाणवी थी और [11:23] जो पंजाबी थी वो मिलके एक जुबान धीरे-धीरे [11:27] डेवलप हुई जो फिर नीचे ट्रिकल डाउन [11:31] हुई जो यूपी वाला है वो तो कहता है भाई [11:35] उन्होंने भी किताबें लिखी हुई है कि यह तो [11:38] खड़ी बोली है जो हमारे वेस्टर्न यूपी में [11:41] बोली जाती है। दिल्ली में बोली जाती है। [11:44] उसी में अलग-अलग जबानों के शब्द आ गए हैं। [11:46] लेकिन ग्रामर तो हमारी है खड़ी बोली की। [11:49] तुम जा रहे हो मैं आ रहा हूं। खाना खाओगे, [11:52] पानी पियोगे तो खड़ी बोली है। इसी में [11:55] डिफरेंट लैंग्वेज के वर्ड जमा करके एक [11:58] जबान बन गई नई। अवेलेबल स्क्रिप्ट उस [12:01] जमाने में जैसे आज अंग्रेजी है। तो लिंगवा [12:04] फ्रंका ऑफ़ द एलिट वाज़ फारसी हिंदुस्तान [12:08] में कोई 7 800 साल [12:10] तो ऑफिशियल लैंग्वेज कोर्ट लैंग्वेज ही [12:14] पर्शियन रही है। उन लोगों की जिनकी मदद [12:16] टंग परशियन नहीं थी। [12:19] लेकिन वो पढ़े लिखे लोगों की जबान कहलाती [12:22] थी। पूरे सेंट्रल एशिया में भी उसी को ये [12:25] दर्जा हासिल था। तो वो स्क्रिप्ट अवेलेबल [12:29] थी। तो ये डायलक्ट उसमें लिखा जाने लगा। [12:33] यह कोई 13वीं सदी में शायद जाहिर एक दिन [12:37] में तो नहीं हुआ होगा लेकिन जो ट्रेसेबल [12:39] है जो हिस्ट्री में मेंशन होते हैं बहुत [12:42] से लोग नहीं मेंशन होते वो अपना काम करके [12:44] चले जाते हैं उनका कभी पता ही नहीं [12:48] लगता वो हम अमीर खुसरो को कहते हैं कि भाई [12:53] अमीर खुसरो जो पटियाली में पैदा हुए थे [12:57] दिल्ली में रहते थे कोई आठ या नौ बादशाहों [13:01] के साथ काम भी किया उन्होंने [13:03] उन्होंने [13:05] उन्होंने ये डायलग जो था लेके और ये डायलग [13:09] जो आज हम उर्दू सुन रहे हैं वैसा नहीं था। [13:11] ये तो वक्त के साथ पॉलिश होती रही बदलती [13:14] रही। वरना आंखें तरसतीियां हैं। इस तरह की [13:17] भी लैंग्वेज होती थी। ये कैसी बस्तियां [13:20] हैं कि जिनको देखने को आंखें तरसियां हैं। [13:23] तो ये सब चला गया धीरे-धीरे करके। [13:26] वली मुझ मन मने आवे ख्याल ऐर तो यह मने [13:33] में मने था पहले तो फिर वो में बना तो [13:36] इसमें धीरे-धीरे इंप्रोवाइजेशन और उसको [13:39] ज्यादा ज्यादा सफिसिकेट किया गया क्लीन [13:42] किया गया लेकिन इसकी बिगिनिंग जो है वो [13:45] हमें मिलती है खुसरो के [13:48] यहां जो कि अच्छा वो भी समान देखिए क्या [13:52] है कि सखी पिया की मैं क्या बताऊं ना आप [13:56] आवे ना भेजे [13:58] पतियां तो अच्छा फिर उसमें कहीं फारसी के [14:01] लफ्ज़ भी आ जाते हैं। कहीं एक लाइन आधी [14:03] फारसी में और आधी अवधि में तो धीरे-धीरे [14:07] एक चीज फोकस में आ रही [14:09] है। ये दौर गया उसके बाद एक अचानक हम [14:14] देखते हैं कि यहां ये सब तो हो रहा है। [14:16] लेकिन जो पहला [14:18] साहिब अह दीवान जिसने पहला दीवान छपा [14:22] उर्दू का पोएट्री का वो छपा दक्कन में तो [14:27] ये दकन कैसे कूद-पांध के पहुंच [14:32] गई। ये मुझे हमेशा डिस्टर्ब करता था। इसकी [14:35] दो थ्यरीज है। मुझे दूसरी ज्यादा ठीक लगती [14:38] है। हो सकता है उसमें मेरे यूपी वाले होने [14:41] का कहा। [14:42] कि एक तो उनका यह कहना है कि देखिए वो [14:45] खड़ी बोली यहां तक आ गई थी लेकिन बाकी [14:48] उर्दू खड़ी बोली बनी इसलिए कि हमारे तरफ [14:52] भी दोनों तरफ वो है समंदर और हमारे पास भी [14:56] सेलर्स आते थे हमारे यहां भी ट्रेड होती [14:58] थी अरब्स भी आते थे टर्क भी आते थे [15:01] ईरानियन भी आते थे और उनके शब्द धीरे-धीरे [15:04] यहां आए और उसके बाद लोग भी आए और वो जबान [15:09] धीरे-धीरे बनी हमने इसको बनाया [15:12] दखनी उसके बाद बाकी लोगों ने सीखी ये तो [15:15] सही है कि कुलू कुतब शाह जो थे वो पहले [15:19] साहिब दीवान शायर उर्दू के थे। लेकिन [15:22] हकीकत क्या है कि [15:24] ये 13 सेंचुरी में अलाउद्दीन खिलजी जो था [15:29] जिसे अभी एक फिल्म में भी दिखाया गया है। [15:31] क्या नाम था उस फिल्म का? हां। अलाउद्दीन [15:35] खिलजी रणवीर सिंह जैसा बिल्कुल नहीं था। [15:39] वो काफी डिफरेंट था। कभी उसके बारे में [15:42] बात [15:44] करेंगे। उसने बहुत से ऐसे काम किए हैं जो [15:47] दुनिया में पहली बार हुए हैं। हैरत [15:50] तंगेज। तो ये पहला बादशाह था जो इतना डीप [15:53] गया और इन्होंने मेरे ख्याल [15:57] से 1303 या कुछ ऐसे ही था मुझे। आई एम [16:00] वेरी बैड एट रिमेंबरिंग नंबर्स। मुझे तो [16:02] अपना कार नंबर नहीं याद रहता। अब [16:04] अलाउद्दीन कब गए थे ये कहां से याद होगा। [16:07] लेकिन बहरहाल ये 14वीं सदी की बात है जब [16:11] वो गए थे वहां [16:13] ईवी [16:15] तो वहां पर बहुत लोग रह गए उसी के एक [16:19] अराउंड 50 इयर्स बाद फिर ये तो आ गए फिर [16:23] वहां बहुत से लोग सेटल हो गए वहां जो इधर [16:25] के थे फिर उसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक के [16:29] जमाने में वो दौलताबाद को पूरा दिल्ली [16:31] लेके चले गए थे वो तो मालूम हुआ बाकी सब [16:34] कुछ है पानी नहीं है तो एक से उनके जो [16:37] फैसले हुआ करते थे तो फिर सब वापस आ गए। [16:39] बहुत से लोग फिर भी रह [16:41] गए। तो ये जो यहां गया था और जब ये तुगलक [16:48] सरकार कमजोर पड़ी हुकूमत तो वहां [16:52] बहमनी उन्होंने खुद मुख्तारी का ऐलान कर [16:55] दिया। बहमनी नाम का एक जनरल था जो बादशाह [16:58] बन गया और वो भी कुछ एक 50 साल के अंदर [17:01] टूट गया और पांच डिफरेंट स्टेट्स बन गई [17:04] जिनमें से दो थी गोलकंडा। [17:07] और [17:08] बीजापुर इन्होंने इस जबान को बहुत ज्यादा [17:12] सवारा और आगे [17:14] बढ़ाया कुली कुतुब शाह गोलकंडा का [17:17] था और वही अब वो देखिए फिर वही जमाना पिया [17:22] बाज प्याला पिया जाए ना पियाबाज यक पल [17:26] जिया जाए ना अब ये ये ये अपने पालने में [17:30] है [17:32] उर्दू एक और था जो पैदा तो वहां हुआ था [17:38] वली दक्कनी जिसे कहते हैं लेकिन उसका [17:42] ज्यादातर जिंदगी गुजरात में [17:45] गुजरी और वहीं गुजरात में वो मरा तो उसे [17:50] वली गुजराती भी कहते हैं वो अली दनी भी [17:53] कहते हैं। उसकी कब्र अहमदाबाद में थी। थी [17:58] इसलिए कह रहा हूं कि वो 2002 में उसको [18:03] तोड़ के वहां सड़क बना दी गई। [18:07] आहिस्ताआहिस्ता पहली बार यह रदीफ उसी ने [18:10] इस्तेमाल की [18:13] थी। ये धीरे-धीरे धीरे-धीरे जो वली से एक [18:18] दिल्ली भी वली आए और वली का एक बहुत बड़ा [18:21] कंट्रीब्यूशन इसलिए कि पहले ये जो शायर थे [18:23] वो बड़े-बड़े शायर हुए हैं। लेकिन उनका फोकस [18:27] गज़ल पे नहीं था। [18:29] यह वली का एक बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन है। [18:32] इन अ वे ही यू कैन बी ही कैन बी कॉल्ड एस [18:35] द फर्स्ट पोएट ऑफ गजल इन [18:38] उर्दू। और उसके बाद गजल का एक रिवाज शुरू [18:42] हुआ जो धीरे-धीरे बड़ा पॉपुलर हुआ। इससे [18:45] पहले कि अभी ये सब हिस्ट्री में चले। गजल [18:49] के बारे में कुछ बात करते [18:51] हैं। गजल बड़ा पॉपुलर आज भी जॉन है। [18:57] लेकिन ये है [18:59] क्या? मुझे ऐसा ख्याल है कि काफी लोग ये [19:04] बात नहीं जानते कि गज़ होती क्या है? इसलिए [19:07] कि बहुत बार उन्होंने मेरी नज़्म को कहा सर [19:10] वो जो आपकी गज़ल है ना वो गज़ल थी ही [19:15] नहीं। गज़ल क्या चीज है? यह एक बड़ी [19:18] इंटरेस्टिंग चीज है। यह स्टार्ट तो हुई है [19:20] अरब से लेकिन जो हिंदुस्तान [19:23] पहुंचतेपहुंचते तक बदल गई [19:27] हो। शायरी में दुनिया की शायरी में हो [19:30] चाहे अंग्रेजी शायरी हो संस्कृत हो, [19:33] अरेबिक [19:35] हो, फ्रेंच हो, इनमें रम होता है। काफिया [19:40] जिसे हम कहते [19:42] हैं। और अरेबिक पोएट्री में भी काफिया [19:45] होता है। हमारे ट्रेडिशनल दो हैं। उनमें [19:48] भी काफिया होता [19:50] है कि रहीमन मुश्किल ला पड़ी टेढ़े दो काम [19:56] सीधे से जग ना मिले उल्टे मिले ना राम तो [20:00] अब काम और राम आपके पास हैं। अ स्टार बाय [20:03] मौसी स्टोन हाफ हिडन फ्रॉम द आई फस द [20:06] स्टार दैट ओनली वन इज़ शाइनिंग ऑन द [20:09] स्काई स्काई एंड आई [20:13] यही अरेबिक पोएट्री है। यही संस्कृत में [20:17] है। एक चीज नई [20:20] आई जो काफी है के बाद होती [20:24] है। इसका नाम है [20:26] रदीफ। ये अरब्स की नहीं है। ये कहीं [20:30] परशिया में इन्वेंट हुई। उन्होंने बदल [20:33] लेके उसको इसमें एक नई चीज डाली वक्त के [20:38] साथ। दिल नाजा तुझे हुआ क्या है? आखिर इस [20:42] दर्द की दवा क्या है? तो यह हुआ और दवा तो [20:46] रम हो गया काफिया हो गया यह क्या है क्या [20:50] है यह रदीफ है कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई [20:56] सूरत नजर नहीं आती तो दर दर ये तो काफिया [21:03] हो गया नहीं आती क्या है ये रदीफ है [21:08] ये हमने इन्हहेरिट किया वर्जन पोएट्री से [21:12] आज हिंदुस्तान में पंजाबी में में भी [21:14] शायरी होती है। गज़ लिखी जाती है। गुजराती [21:17] में भी गज़ लिखी जाती है। मराठी में भी गज़ [21:21] लिखी जाती है। उर्दू में तो लिखी जाती है। [21:23] हिंदी में भी लिखी जाती है। और वो रदीफ [21:26] इसमें होता [21:27] है। कुछ भी कुछ उन भी राह आखियां सन कुछ [21:33] गले गमादा तो थी। कुछ शहर लोग भी जालिम [21:37] था। कुछ सर शौक भी थी। ये सी जो है ये [21:42] रदीफ है। [21:44] वरना शौक और टॉक पे खत्म हो जानी चाहिए [21:47] बात। [21:48] सी तो हर जुबान में यह जो हमारे यहां गज़ [21:53] लिखी जाती है एक बात कि इसमें रदीफ भी [21:56] होती है। हालांकि नहीं भी हो लेकिन तो कोई [21:59] जेल नहीं भेजेगा लेकिन आमतौर से होती है। [22:03] ऐसी भी गज़ें हैं जिनमें नहीं है। मगर वो [22:06] बहुत कम होती [22:07] है। और बड़े-बड़े शायरों ने ऐसी गज़ें लिखी [22:11] हैं। जिसमें रदीफ नहीं है। जिगर का शेर है [22:15] तेरा तसवुर शब हम शब खिलवते गम भी बस्म [22:19] तरब तो शब तरब कोई रदीफ नहीं लेकिन आमतौर [22:24] से नहीं होता 99 फीसदी गज़लों में आपको [22:28] मिलेगी रदीफ ये तो एक बात हुई दूसरे इसमें [22:33] एक और चीज है जो इसको बहुत यूनिक बनाती है [22:36] इस फॉर्म को वो है कि [22:40] गजल एक बिस्किट के डिब्बे जैसी है [22:44] जिसके अंदर तरह-तरह के बिस्किट हैं। कुछ [22:46] मीठे हैं, कुछ नमकीन है, कुछ क्रीम वाले [22:49] हैं, [22:50] कुछ सादे हैं। किसी में जैम लगा हुआ है, [22:54] किसी में नहीं लगा है। अलग-अलग टेस्ट के [22:57] बिस्किट है मगर एक डिब्बे में [22:59] है। इसमें हर दो लाइनें अपने अंदर मुकम्मल [23:04] है। उनका पहली दो लाइनों से या बाद की दो [23:08] लाइनों से कोई संबंध, कोई ताल्लुक हो, कोई [23:11] जरूरी नहीं। [23:13] सो इट इज अ पैकेज ऑफ एक्टिक थॉट्स एंड [23:18] स्टेटमेंट्स जो कुछ भी हो सकते हैं। तो [23:21] व्हाट इज पुटिंग देम [23:23] टुगेदर? दो चीजें हैं। एक बहर जिसे कहते [23:28] हैं मीटर कि मीटर एक है। दूसरे रदीफ और [23:34] काफिया। रदीफ तो सेम चलती रहेगी लेकिन [23:37] काफिया बदलते रहेंगे। [23:39] मीटर रम रदीफ यह एक होगा और हर दो लाइनें [23:44] अपने अंदर कंप्लीट होंगी जिनका आगे पीछे [23:48] से कोई वास्ता हो नहीं हो कोई फर्क नहीं [23:52] पड़ता दैट मे गज़ल वेरी [23:55] कोर्टेबल कि दो लाइन में आप पूरी बात कह [23:58] देते [23:59] हैं किसी ने सर्वे किया था हिंदुस्तान की [24:02] पार्लियामेंट में जब बातचीत हुआ करती थी [24:05] तो तो [24:08] जो [24:09] ज्यादातर ऑलमोस्ट अबव 90% जो पोएट्री कोट [24:14] हुई है वो उर्दू गल की [24:19] है। इसलिए कि दो लाइन में आप पूरी बात कह [24:21] देते [24:22] हैं। और उसके बाद अगली दूसरी लाइन में कुछ [24:25] और [24:26] होगा। मैं ऐसी मिसाल के तौर पर अपनी एक दो [24:30] शेर बताता हूं जिसमें एक दूसरे से कोई [24:32] ताल्लुक नहीं [24:34] होगा। कल जहां दीवार थी [24:38] है आज एक दर [24:41] देखिए कल जहां दीवार थी है आज एक दर देखिए [24:47] क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए अब [24:51] इसमें सेल सी बात ये है कि ये जो दर बना [24:54] है ये दीवाने के सर से बना है। तो यहां [24:57] अपने चुपके से सर का प्रेजेंस डाल दिया कि [25:01] ये इसने सर मार मार के दीवार को दर कर [25:03] दिया। अब अगला शेर क्या है? पुरसुकून लगती [25:07] है कितनी झील के पानी पे [25:11] बान पुरसुकून लगती है कितनी झील के पानी [25:14] पे [25:16] बैरों की बेताबियां पानी के अंदर देखिए [25:21] तो देखिए देखिए है [25:24] रदीफ सर दर [25:28] अंदर काफिया चल रहा है लेकिन टॉपिक्स तो [25:32] बिल्कुल [25:33] अलग तो इस तरह आप कोई भी गज़ देखेंगे तो [25:37] उसमें आमतौर से हो सकता है मूड एक हो [25:40] लेकिन शेर अलग-अलग होंगे। उनका आपस में [25:43] कोई वास्ता नहीं है और वास्ता ढूंढने की [25:44] कोशिश करने से सिर्फ कंफ्यूजन होगा आपको। [25:47] हर शेर को अपने अंदर एंजॉय कीजिए [25:50] उसे। अब ये जो दौर आया था इन लोगों के बाद [25:54] जब वली दनी ने और इस तरह के दूसरे शायरों [25:58] ने गज़ल की तरफ भेजा उर्दू पोएट्री [26:03] को। मैं उर्दू प्रोथ्स के बारे में [26:07] बात करूंगा लेकिन इसलिए कि वह जरा बेचारी [26:11] रनर अप है उर्दू लिटरेचर में वो भी [26:15] इंपॉर्टेंट है और बहुत अच्छे काम हुए [26:17] लेकिन फिर भी उर्दू इज़ अल्टीमेटली नोन बाय [26:21] इट्स [26:22] पोएट्री तो [26:26] ये कौन सी होगी [26:29] सदी 18वीं सदी 17वीं सदी जैसा या इसके बीच [26:34] में कि जब दर्द [26:37] जुर्रत [26:39] मीर जिसको शहंशाह सुखन कहते हैं जिसको [26:45] गालिब तक ने माना [26:48] है और सौदा ऐसे बड़े शायर पैदा हुए। अच्छा [26:53] इस बीच में यह मेरे ख्याल से यह बाद में [26:57] हुआ है। 17वीं सदी में हुआ है। 18 सेंचुरी [27:01] में एक शाह हातिम थे जिन्होंने उर्दू को [27:04] एक नया नाम दिया। [27:07] रेख्ता आजकल यहां तो बहुत सुनते हैं ना आप [27:10] रेख्ता। बड़ा [27:11] जबरदस्त यहां एक ऑर्गेनाइजेशन है और [27:15] दुनिया की सबसे बड़ी जो उर्दू साइट [27:19] है नेट पे वो रेख्ता है। संजीव सराफ की [27:24] बनाई हुई। वी शुड बी वेरी प्राउड ऑफ [27:28] दिस। तो रेख्ता का मतलब [27:31] है [27:36] अ जो उसको क्या बोलूं? दो पौधे मिला के जो [27:40] बनाते हैं आप उसे क्या ब्रीडिंग क्या कहते [27:42] हैं? [27:44] हाइब्रिड। रेख्ता का मतलब है [27:47] हाइब्रिड। बिकॉज़ ये जो जुबान है इसने इतनी [27:51] जगहों से शब्द लिया वो खड़ी बोली की [27:54] वोकैबलरी लेके इतनी जबानों के शब्द हैं [27:57] इसमें कि इसे हाइब्रिड। उन्होंने कहा कि [27:59] ये तो हाइब्रिड [28:01] है। तो ये रेख्ता नाम पड़ा जिसको उसके 100 [28:05] 150 साल बाद गालिब ने ये वर्ड इस्तेमाल [28:07] किया है। मीर के बारे में रेख्ता के तुम [28:10] ही उस्ताद नहीं हो [28:12] गालिब। कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर [28:15] भी था। [28:18] और मीर था। मीर के जमाने में एक और भी [28:21] शायर थे जिनका इतना नाम आपने नहीं सुना [28:24] होगा। मगर वह उस वक्त बड़े शायर थे कायम। [28:27] वो दिल्ली के नहीं थे तो शायद इस वजह से [28:29] नाम नहीं हुआ [28:33] इतना नहीं मेरा ये मतलब नहीं [28:39] था एक बात जिस पे मैं क्योंकि मेरी मदद [28:43] टंग उर्दू [28:45] है हालांकि इसमें भी एक झंझट है वो [28:48] बताऊंगा भी आपको मैं बहुत फक्र करता हूं [28:51] कि दुनिया की जितनी ज़बाने हैं जब उसमें [28:54] पोएट्री शुरू हुई उनकी हिस्ट्री में आप [28:57] जाइए तो वो शुरू हुई हिम से चर्च में [29:01] टेंपल [29:02] में इन प्रेज़ ऑफ़ द डेटीज और गॉड द सुपर [29:06] पावर और [29:08] व्हाटएवर एंड धीरे-धीरे [29:11] ट्रांसेंडेंट एंड वेंट टू अदर एवेन्यूस मे [29:15] बी लव [29:17] रोमांस सेंस ऑफ़ लोनली एंड सो ऑन वो बीबी [29:20] फर्स्ट पर्सन सेकंड पर्सन तक रहा और बहुत [29:23] दिनों बाद फिर वो जाके उसमें सोशल इशूज़ [29:25] आए। [29:26] है उर्दू इज वन लैंग्वेज इन द [29:30] वर्ल्ड जो पहले दिन से इरिलजस और सेकुलर [29:34] थी। पहले दिन [29:38] से ये कायम अमीर जिनका मैं जिक्र कर रहा [29:41] हूं। इनके शेर आप सुनेंगे तो हैरान होंगे। [29:44] आज पता नहीं किसी शायर की हिम्मत होगी [29:46] स्टेज पे थे शेर पढ़ने की कि नहीं। जो उस [29:49] जमाने में [29:51] लिखे 18 सेंचुरी [29:54] में कायम का शेर है। काबा जो ढह गया है तो [29:59] क्या जाए गम है शेर। अगर काबा टूट गया है, [30:03] डिमोलिश हो गया है तो इसमें कौन से गम की [30:05] बात [30:06] है? कुछ कसरे दिल नहीं, कोई दिल का महल [30:10] नहीं है जो बनाया ना [30:15] जाए। मीर कैसा [30:17] है? निजात मतलब [30:21] मोक्ष। जाए है जी निजात के गम में। [30:25] ऐसी जन्नत गई जहन्नुम [30:29] में। मीर के दीनों मजहब का क्या पूछते हो [30:34] कि उन्होंने तो कशका खींचा दैर मंदिर दैर [30:39] में बैठा कबका करके इस्लाम [30:43] किया। ये ऐसी पोएट्री और एक ये तो मैं एक [30:47] दो सुना रहा हूं आपको। यानी इसी पे अकेले [30:50] एक पूरा शाम गुजारी जा सकती है। एक एंटी [30:55] फंडामेंटलिज्म एंटीजिस्ट [30:59] रिलॉजिसिटी एक हर जगह एक रिवोल्ट और एक [31:02] फॉरवर्ड लुकिंग एटीट्यूड दिखता है उर्दू [31:06] पोएट्री में। परहप्स वि द एक्सेप्शन ऑफ़ [31:09] वन। आई एम वेरी एम्बरेस्ड अबाउट दैट। वो [31:12] बड़ी इज्जत होती है उनके अखबार की। मैं तो [31:14] नहीं [31:15] करता। तो [31:19] हर स्टेज पे हुआ। [31:22] गालिब मुझे याद है एक गालिब के बारे में [31:25] आपको एक बात बता लेकिन उससे पहले मैं बता [31:26] दूं कि मेरे क्रेडेंशियल भी इधर डाउटफुल [31:29] है। हुआ ये कि एक बहुत बड़े उर्दू के शायर [31:32] थे वो दुनिया में नहीं रहे तो उनका नाम [31:33] लेना मुनासिब नहीं है। मैंने उनसे कहा [31:36] किसी बात पे बहस हो रही थी जुबान पे। तो [31:38] मैंने उनसे कहा माफ़ कीजिएगा आपको वो जो [31:39] मिश्रा है वो जबान के हिसाब से सही नहीं [31:41] है। गलती है उसमें। कह आप मुझे गलती बता [31:45] रहे हैं। आप कैसे बता सकते हैं? आप जहां [31:48] के हैं वहां के लोगों को मैं अहले जबान [31:49] नहीं मानता हूं। लिंग्विस्ट तो मैंने कहा [31:53] इसे कहां मालूम होगा? मैं तो लखनऊ में पला [31:55] पढ़ा हूं सारी जिंदगी। तो कह मैंने कहा [31:57] मैं कहां का हूं? कहने आप ग्वालियर के [32:00] हैं। ये तो सच है कि मैं ग्वालियर में ही [32:03] पैदा हुआ था। लेकिन दो-चार महीने का था तो [32:05] चला आया। [32:07] तो मैंने कहा अच्छा हुजूर एक बात बताएं कि [32:10] बिल्लियों की बहुत आदत होती है अक्सर जाके [32:12] ओवन में बच्चे दे देती हैं तो उन बच्चों [32:14] को आप बिस्किट कहते हैं [32:16] क्या तो [32:19] भाई कहां पैदा हुए इससे क्या मतलब है कहां [32:21] पले पड़े वो देखो [32:27] हैं तो अब ये देखिए जहां गालिब है एक मेरी [32:31] बहस हो गई थी एक आज वो दुनिया में नहीं है [32:34] मनीक कॉल बहुत अच्छा फिल्म बड़ा फिल्म [32:36] मेकर [32:37] था। वो अलग तरह की फिल्में बनाते थे और हम [32:42] लोग तो मेन स्ट्रीम कमर्शियल सिनेमा में [32:44] थे। ही यूज्ड टू मेक टोटली एक्सपेरिमेंटल [32:47] अनकन्वेंशनल फिल्म्स। और उस जमाने में [32:50] मैंने उसकी वो इज्जत नहीं की जो अब करता [32:52] हूं। उसने एक पिक्चर वाली थी उसकी रोटी। [32:56] तो मुझे किसी ने पूछा वो मनी कॉल की [32:57] पिक्चर देखी उसकी रोटी। मैंने कहा नहीं [33:00] मैं तो अपनी रोटी देख रहा हूं। [33:03] तो वो अलग बात है। लेकिन अब ख्याल होता है [33:06] कि वाकई कितने अच्छे-अच्छे काम किए उसने। [33:09] एक जगह हम दोनों बैठे थे उस जमाने में मैं [33:11] भी शराब पीता था। [33:14] तो बहस हो गई हमारी गालिब पे। और वो ये कह [33:19] रहे थे कि गालिब वाज़ पॉसिबल ओनली इन [33:23] इंडिया। और मैं उनसे कह रहा था कि भ एक [33:25] जीनियस था। वो कहीं भी पैदा होता जीनियस [33:27] ही होता। बट ही वाज़ राइट एंड आई वाज़ रोंग। [33:30] मैंने अभी एक किताब रिसेंटली की है। उसमें [33:32] मैंने इस किस्से का जिक्र किया। मैंने कहा [33:34] आई विश यू वुड हैव बीन अ गालिब तो मैं [33:36] जाके उसे अपोलजाइज [33:38] करता। गालिब को आप अगर सीरियसली पढ़िए तो [33:42] आपकी समझ में आता है कि ये तो हिंदुस्तान [33:45] के अलावा कहीं हो नहीं सकता था। [33:48] देखिए सिमिटिक रिलीजंस में क्रिएशन और [33:51] क्रिएटर अलग है। क्रिएटर जो है वह पैदा भी [33:55] करता है। फिर कास्टेंटली एक आप पे वॉच [33:58] रखता है। फिर आपने कोई भी गलती की तो एक [34:00] दिन वो फिर हिसाब लेता है आपसे। पूछता है [34:02] भाई तुम उस दिन वहां कैसे चले गए थे? ये [34:05] तुमने क्या किया? वगैरह-वगैरह उसके हिसाब [34:07] से फिर आपको जन्नत या दो भेजता है। वाइल [34:12] इन वैदिक कासेप्ट फिलॉसफी क्रिएटर और [34:16] क्रिएशन [34:18] दो आइडेंटिटीज नहीं [34:21] है। वो सब एक है। मैं डॉक्टर साहब के [34:24] सामने बोल रहा हूं। मेरी हिम्मत देखिए आप [34:26] कि ये बैठे हैं और मैं वेदांत के बारे में [34:29] बात कर रहा हूं। लेकिन आजकल ऐसे गलत काम [34:32] बहुत होते हैं। एक और [34:33] सही। तो [34:36] बहुत से लोग जिन्हें नहीं बोलना चाहिए [34:38] बोलते हैं। [34:41] तो वो कांसेप्ट अलग है। वो आप [34:45] मैनिफेस्टेशन उसी सुप्रीम पावर के हैं। [34:49] एंड द मोमेंट यू विल गेट बैक दैट पोरिटी। [34:52] यू विल गो एंड असिमिलेट इंटू इट। तो ये एक [34:57] अलग तजिया मास्टर [34:59] और पीपल और मे बी स्लेव का कांसेप्ट नहीं [35:02] है। [35:05] ना था कुछ तो खुदा था। कुछ ना होता तो [35:09] खुदा होता। डुबोया मुझको होने ने ना मैं [35:13] होता तो क्या [35:15] होता। अब ये तो हिंदुस्तान में ही लिख [35:18] सकता है [35:20] आदमी। जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया [35:24] होगा। कुरेदते हो जो अब राग जो सुजू क्या [35:28] है? यह जिस्म कहां जलता है? यह राख कहां [35:32] कुरेदी जाती है? कजाकिस्तान में, ईरान [35:36] में, इजिप्ट में, इराक में, [35:41] कहां? ये तो ये दो मिसाले मैं यहां दे रहा [35:44] हूं। आप कदम कदम पे आप देखेंगे कि उसका जो [35:48] बेसिक अंडरस्टैंडिंग है वो एक अजीब तरह का [35:53] सिंथेसिस है जो परशियन लिटरेचर की [35:56] स्टेटिक्स हैं जो उसकी नफासतें हैं [35:58] नजाकतें हैं वो और जो गहराई और जो डेप्थ [36:02] है वेदांत की वो उसकी शायरी में मौजूद है। [36:06] तो उसने दोनों तरफ से फॉर्म और कंटेंट का [36:11] एक ऐसा कॉम्बिनेशन बनाया ही वास द फर्स्ट [36:13] पोएट जिसने [36:15] थॉट दिए है। इमोशनल रिएक्शनंस मिले हैं [36:19] बहुत लेकिन उर्दू पोएट्री में और शायद [36:22] किसी भी पोएट्री में। म इतनी डीप थॉट जो [36:26] उसके शेरों में मिलती है और दो लाइन [36:30] में वो वो दैट इज व्हाई पवन जी ने लिखा है [36:34] और मैं बिल्कुल इन ऑल ह्यूमिलिटी एक्सेप्ट [36:37] करता हूं कि मैं इनसे आधा भी गालिब के [36:39] बारे में नहीं जानता हूं। इन्होंने जो कहा [36:41] है लिखा है तो मैं बिलीव करूंगा। कि [36:45] गालिब वाज़ द ग्रेटेस्ट पोएट ऑफ द वर्ल्ड [36:48] इन 19 सेंचुरी। जो 19 सेंचुरी के जो शायर [36:51] थे ये नहीं सामने ऑल द टाइम उससे पहले [36:55] बड़े-बड़े उस्ताद पैदा हुए हैं भाई। लेकिन [36:57] ये कि 19 सेंचुरी का वो सबसे बड़ा दुनिया [37:00] का बड़ा शायर था। [37:04] अनबिलीवेबल। उसकी दो-दो लाइनों में जो [37:06] बातें हैं कि देखिए बड़ी वो उस जमाने में [37:10] अब तो छोड़िए। उस जमाने में भी उसकी [37:12] लैंग्वेज जो है डिफिकल्ट मानी जाती थी और [37:14] बहुत ही मतलब डेंस मानते थे वो लोग बड़ा [37:18] इरिटेट होते थे उसकी बहुत बुराई होती थी [37:21] गालिब की तो तंग आके उसने शेर कहा था कि [37:25] ना सताइश की तमन्ना ना सिले की परवाह अगर [37:28] नहीं है मेरे अशार में माने ना [37:32] सही शेर देखिए [37:34] उसका हूं [37:37] गर्मी तसवुर फरदा से नगमा [37:43] मसंज मैं अंधली पे गुलशन ना अफरीदा हूं। [37:48] मैं तो कल जो गुलशन बनने वाला है उसके [37:53] इमेजिनेशन से गा रहा हूं। मैं वो बर्ड [37:56] हूं। मैं [37:57] वो कोयल हूं जो इमेजिनेशन से इतना [38:02] एक्साइटमेंट है उसे कि कल का गुलशन कैसा [38:05] होगा। उसको याद करके गा रहा हूं। मैं एक [38:09] ऐसे गार्डन का बुलबुल हूं। आई एम अ लार्क [38:12] ऑफ अ गार्डन दैट इज येट टू बी [38:18] मेड। अब देखिए कहां है कि ईमां मुझे खींचे [38:22] हैं तो ईचा ईमा मुझे रोके हैं तो खींचे [38:25] हैं मुझे [38:27] कुफ्र। काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे। [38:31] यह सिंबल्स [38:35] हैं। आइए सर आइए जाइए इधर ही किस्सा खत्म [38:39] हो। पार्टनरशिप में मैंने बहुत दिनों काम [38:41] किया [38:43] है। ऐसी क्या बात? [38:50] ये जो गहराई है यह उसके यहां मिलती है कि [38:55] वो कह रहा है देखिए सिंबल्स है और गजल में [38:58] सिंबल ही होते हैं इसलिए कि यहां काबा जो [39:02] है वो उस चौकोर डब्बे का नाम नहीं है जो [39:05] काले कपड़े में होता है। ये काबा जो है वो [39:09] ट्रेडिशनल ट्रेडिशन का और कंजर्वेटिव [39:13] थॉट्स का और बिलीफ का सिंबल बनता है। [39:16] कलीसा इज नॉट द चर्च। इट हैज़ नथिंग टू डू [39:19] दिस कलीसा हैज़ नथिंग टू डू क्रिश्चियनिटी [39:22] बट द यूरोपियन नॉलेज। बट द [39:27] मॉडर्निज़्म। कि मुझे ये रोक रहा है और वो [39:31] मुझे खींच रहा है। ये मेरे पीछे है कलीसा [39:35] मेरे आगे। [39:37] तो उसकी ये सिंबल्स है। अच्छा वजह क्या है [39:41] कि जैसा कि मैंने आपसे अर्ज किया था कि दो [39:43] मिनट में दो लाइनों में पूरी बात कहनी है। [39:47] तो दो लाइनों में जब बात कहनी हो तो यू [39:50] नीड सिंबल्स कि भाई मैं ये वर्ड इस्तेमाल [39:53] करूं तो समझ जाना कि इसके क्या मतलब है। [39:56] और पूरी उसकी डिटेल समझ जाना। हम लोग आपस [39:59] में भी जब धीरे-धीरे बहुत क्लोज होते हैं [40:02] एक दूसरे से तो कुछ सिंबल्स बना लेते हैं [40:04] लैंग्वेज में कि चार आदमी हो उनके सामने [40:06] भी आप कह दे तो किसी की समझ में ना आए [40:09] मेटाफर में बात कर [40:11] ली अब मिसाल के तौर पे आमतौर से लोग का ये [40:14] ख्याल है अरे साहब वो क्या है वो शराब [40:17] मैखाना और साखी ये सब होता है उसमें उर्दू [40:21] पोएट्री में यही सब है शराब [40:26] का ये जो गज़ सिंगर हैं। इनको छोड़ दीजिए। [40:30] इन्होंने गजल की बड़ी ऐसी की तैसी की है। [40:34] तो उन्होंने तो वाकई शराब को शराबी गाया [40:36] है। और महखाने को महखाना ही गाया है। [40:38] इसलिए कि बहुत ही बेचारे क्या कहूं मजबूर [40:43] से शायरों का लिखा हुआ है। लेकिन जो रियल [40:46] पोएट्री है उसमें शराब का मतलब कभी शराब [40:49] नहीं है। उसमें महखाने का मतलब महखाना [40:52] नहीं है। उसमें हरम तो कहते मस्जिद को [40:56] मस्जिद नहीं है। [40:58] ये अलग है। ये या दर मंदिर नहीं है। यह [41:04] सिंबल्स है। या [41:08] जो आशिक है वो सिर्फ आशिक नहीं है। ये [41:12] सिंबल्स यूज़ करते हैं ताकि आप एक बात कहीं [41:14] समझ में आ। मिसाल के तौर पे मैं एक शेर [41:16] सुनाता [41:18] हूं। जिन्हें प्यास है उन्हें कम से कम। [41:22] जिन्हें प्यास कम उन्हें दम बदम। [41:26] जिन्हें प्यास है उन्हें कम से कम जिन्हें [41:29] प्यास कम उन्हें दम बदम मेरे साखिया तेरे [41:32] महकदे का निजाम है कि मजाक है क्या बात है [41:36] ये क्या शराब के बारे में है [41:40] ये एक अनफेयर इकोनॉमिक सिस्टम पे [41:44] है या मीर के आपको जो शेर मिलते हैं वो [41:49] क्या दिल के बारे में [41:53] है ये वो जमाना था। जब अब्दाली के हमले [41:57] हुए हैं। उसने लुटते हुए दिल्ली को देखा। [42:00] बर्बाद होते देखा। एक ऐसा वक्त आया कि उसे [42:02] माइग्रेट करना पड़ा। वो लखनऊ चला गया। [42:06] सौदा जो दूसरा बड़ा शायर था वो भी लखनऊ [42:08] चला गया। होता क्या है कि इनकी रोजी [42:11] रोटियां जो है चलती हैं। जागीर चलती थी। [42:13] जागीरदारों, जमींदारों, राजाओं, [42:15] महाराजाओं, नवाबों बादशाहों से। जब वही [42:18] बर्बाद हो जाए तो इनकी तो रोजी रोटी अवस [42:20] फिर भी उस वक्त बेहतर हालत में था। एंड इट [42:23] वास इमर्जिंग एट अ रिच स्टेट। तो ये सब [42:26] धीरे-धीरे करके वहां शिफ्ट हो रहे थे। [42:28] इसलिए यहां तो सब लुट गया था दिल्ली में। [42:31] अब उसके शेर [42:32] देखिए। ये क्या उसके दिल के बारे में [42:37] है? दिल की बर्बादी का क्या मशकूर हूं। [42:40] क्या बयान करूं? ये नगर 100 मर्तबा लुटा [42:46] गया। दिल की आबादी की इस हद है खराबी कि [42:50] ना पूछ। [42:53] कि जो दिल की आबादी थी उसकी क्या हालत हो [42:55] गई है ना पूछ दिल की आबादी की इस हद है [43:00] खराबी कि ना पूछ जाना जाता है कि इस राह [43:04] से लश्कर [43:07] गुजरा अब देखिए वो टेकन फॉर ग्रांटेड है [43:11] कि जहां से फौज गुजरती है वहां क्या होता [43:14] है तो उसने बार-बार जब लखनऊ भी गया था तब [43:19] उसने वो लिखा क्या बोश पूछो बहु पूरब के [43:22] साकिनों हमको गरीब जान के हस पुकार के [43:26] दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतखाब हम [43:29] रहने वाले हैं उसी उछड़े दया [43:32] के [43:33] तो ये जो दुख है सदा ने लिखे हैं शेर अशोभ [43:38] शेर अशोभ एक अलग फॉर्म है एक जोन है [43:41] पोएट्री का कि जिसमें आप एक जो पूरा समाज [43:45] में बर्बादी आई है जो शहर में बर्बादी आई [43:49] है रियासत में बर्बादी आई है उसका उसका [43:51] डिस्क्रिप्शन भी उसको शहर अशोक कहते सौदा [43:53] ने उसी जमाने में लिखा कि क्या हाल है [43:56] हमारा क्या हो गया [43:58] है सौदा आजकल है नहीं तो [44:02] [संगीत] [44:03] खैर तो [44:05] तो ये कॉन्शियसनेस आपको दिखाई देती है [44:11] पोएट्री में मगर सही मानो में हालांकि मीर [44:15] ने भी लिखा है गालिब ने भी लिखा है बहुत [44:18] कुछ और दूसरे शायरों ने भी लिखा है लेकिन [44:21] फ्रंट फुटेज और क्लियर विदाउट एनी [44:24] कन्फ्यूजन और इनबिशन अगर सोशियोपॉलिटिकल [44:28] कॉन्शियसनेस उर्दू पोएट्री ने ली तो वो [44:32] अर्ली 20थ सेंचुरी में ली। उससे पहले एक [44:36] ऐसा भी वक्त आया था कि बहुत अच्छे-अच्छे [44:39] शायर हुए। दाग थे। क्या जुबान थी उनकी [44:42] बड़ी खूबसूरत रोमांटिक पोएट्री करते थे कि [44:47] खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। [44:50] साहब छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं [44:55] तो बदली निगाह तौर से बेतौर हो गए तुम तो [45:00] जवान होते ही कुछ और हो गए तो ऐसी मजे-मजे [45:04] की खासतौर से लखनऊ में अच्छा ये ये एक बात [45:08] आगे चलते हुए तरक्की पसंद तहरीक जो [45:09] प्रोग्रेसिव मूवमेंट है उसे जाने से पहले [45:12] मैं दो चार बातें और अर्ज करूं आपसे ये [45:15] जुबान जो पंजाब में [45:17] थी ये जबान [45:20] जो यूपी में थी, दिल्ली में थी और लखनऊ [45:24] में थी। यह जुबान जो दखन में थी, ये थी तो [45:30] उर्दूएं लेकिन सबको अपना अलग रंग [45:33] था। सबका अलग अंदाज था। [45:37] मिसाल के तौर पर इंटरेस्टिंग बात यह है [45:41] के जैसे पंजाब खासतौर से लेट 19थ एंड 20थ [45:48] सेंचुरी पर्टिकुलरली अर्ली जिस तरह की [45:51] शायरी पंजाब ने की है वो कहीं नहीं हुई। [45:56] मुझे ऐसा लगता है कि अगर आपकी मदद टंग कुछ [46:00] और है और दूसरी जमानत बहुत अच्छी तरह [46:03] जानते हैं तो जो फोनेटिक्स का सेंस आपको [46:06] होगा वो उसको नहीं हो सकता जिसकी मदद टंग [46:08] भी वही [46:09] है। इसलिए कि कितना भी पास आए एक हल्का सा [46:13] फासला रहता है। और जब वो फासला होता है तो [46:16] सिर्फ माने नहीं समझ में आते। लफ्ज की [46:18] साउंड भी समझ में आती है ज्यादा। हमारे [46:22] यहां तो जैसे उन्होंने कहा जो साहब ने कि [46:24] भाई उर्दू तो हमारे घर की लौंडी थी तो [46:26] प्रॉब्लम यह हुआ कि अक्सर लोगों ने उसके [46:28] साथ ट्रीटमेंट भी वैसे ही किया। [46:31] लेकिन यहां पर जो फ्रेशनेस ऑब्जेड आपको [46:35] पंजाब के शहरों में दिखती है वो यूपी में [46:39] नहीं मिली आपको तब ये प्रेजर सीकिंग हो गई [46:42] थी लखनऊ की पोएट्री बहुत ज्यादा। [46:45] तो उसमें मीन मे बहुत थी इसलिए कि वो [46:49] नफासत और नजाकतें लखनऊ के कल्चर की कि यह [46:52] लफज़ यू जायज़ है और यूं जायज नहीं है। इसका [46:54] तलफुज़ ये है और ये हद तो ये है कि ये जो [46:57] जेंडरर्स हैं हमारी जुबान में ये भी लखनऊ [47:00] में बने हैं। और [47:02] ये दो चार बड़े शायर थे आतश और दूसरे [47:05] जिन्होंने तय किया है बैठ के कि [47:08] साहब खिड़की होती है और दरवाजा होता [47:12] है। अच्छा भाई खिड़की क्यों होती है? [47:15] इसमें इ लगी है उसमें तो फिर सिपाही क्यों [47:18] होता है? उसमें भी तो ई लगा है और खदांची [47:21] क्यों होता है? वो भी होती तो ठीक था। कुछ [47:24] नहीं ये तय हो गया और अब आप इससे इधर-उधर [47:27] गए तो गलत है। तो जेंडरर्स तय किए गए हैं [47:31] लखनऊ में। और ये जेंडर इसीलिए नाराज होते [47:35] हैं लखनऊ वाले। हैदराबादियों से भी और [47:37] पंजाबियों से भी। उनके जेंडर जरा फर्क हो [47:39] जाते हैं। नहीं साहब ये नहीं होगा। यह गलत [47:42] है। [47:43] तो ये ये आपस के बायसेस और प्रिजसेस बहुत [47:46] हैं। तो कहीं यह हो गया था कि उर्दू [47:49] पोएट्री वाकई धीरे-धीरे सिर्फ प्लेजर [47:51] स्पीकिंग हो रही थी। एंड देन अ मेजर [47:55] हैपनिंग टू प्लेस। दैट वाज़ इन परहेब [47:59] 36 ये लंदन के एक छोटे से रेस्टोर में बात [48:03] शुरू हुई। जहां मुल्क राजानंद सज्जाद जहीर [48:06] ज्योतिमर घोष और भी एक तमिल के भी राइटर [48:11] इनका नाम इस वक्त मेरे दिमाग से स्लिप हो [48:13] रहा है। इन लोगों ने बैठ के बात की यह बात [48:16] है 34 की 1934 की कि इस वक्त मुल्क को [48:21] जरूरत है कि हमारे जो कलम है हमारी [48:26] पोएट्री हमारा आर्ट हमारा लिटरेचर हमारी [48:29] शॉर्ट स्टोरीज हमारे नवेल्स ये मुल्क में [48:32] एक तो पोलिटिकल अवेयरनेस के [48:36] लिए और सोशल इनजस्टिस के खिलाफ वुमेन [48:40] एंपावरमेंट के लिए यह कलम इस्तेमाल होने [48:42] चाहिए। [48:45] सज्जाद जहीर को यह रिस्पांसिबिलिटी दी गई [48:47] कि वो [48:48] उसका तैयार करें मेनिफेस्टो व्हिच ऑलमोस्ट [48:52] टूक टू इयर्स एंड इन 36 ही केम ही सेंड वन [48:55] कॉपी टू [48:57] गुरुदेव मेट प्रेमचंद जी एंड [49:02] अथर्स राइटर्स फ्रॉम डिफरेंट [49:05] लैंग्वेजेस और 1936 लखनऊ [49:10] में एक बहुत ह्यूज कॉन्फ्रेंस हुई जिसको [49:13] प्रसाइड किया मुंशी प्रेमचंद ने। मैंने [49:15] मुंशी प्रेमचंद का अभी तक आपसे जिक्र नहीं [49:17] किया इसलिए कि मैं प्रोज़ की तरफ नहीं गया [49:22] हूं। वो ही वाज़ द फादर ऑफ़ उर्दू नवेल एंड [49:27] पर्टिकुलरली उर्दू शॉर्ट स्टोरी। उर्दू [49:30] में शॉर्ट स्टोरी का कांसेप्ट ही नहीं था [49:33] प्रेमचंद से [49:35] पहले। और वहां पर उनका गुरुदेव का [49:39] ब्लेसिंग आई। उन्होंने एक खत भेजा कि यह [49:42] बहुत अच्छा कदम है और ये बहुत जरूरी है और [49:44] बहुत अच्छा कर रहे हैं आप और बहुत अच्छी [49:47] स्पीच उन्होंने दी मुंशी प्रेमचंद ने यहां [49:49] बताया कि आज हमारे कदम ये हुस्न और इश्क [49:52] और ये शराब और महक गदा ये सब जो कि सचमुच [49:56] हो गए थे जैसे कि मैंने आपसे अ किया इसे [49:58] छोड़िए और अब मुल्क के लोगों को जगाने के [50:01] लिए मुल्क के लोगों को उठाने के लिए हमारे [50:04] कलम इस्तेमाल होने चाहिए। [50:08] हर जुबान में इस तरह के राइटर आए बंगाली [50:11] में, मराठी में, गुजराती [50:15] में। मैं क्योंकि उर्दू मेरे जमाने में [50:19] उर्दू के बारे में जानता हूं। मैं ये बात [50:22] बहुत ही फक्र से कहता हूं कि इस एक लंबी [50:25] जो पहली जो कतार थी फौज की उस पे आपको [50:30] उर्दू के कितने शायर और कितने अदीब दिखाई [50:33] दे थे। [50:35] मतलब उस वक्त जो बड़ा पोएट या बड़ा राइटर [50:38] था वो इसी मोमेंट में था और उसने अपने कलम [50:42] को अपनी पोएट्री को अपने अफसाने को अपने [50:45] नवेल को इस कॉज के लिए इस्तेमाल किया। [50:49] मुंशी [50:51] प्रेमचंद राय सिंह बेदी इस्मत जुताई कृष्ण [50:55] चंद्र अहमद नदीम कासमी फैज अहमद फैज मजाज [51:00] सरदार जाफरी जानसर अख्तर कैफी आजमी [51:06] ताहिर [51:07] लुधियावी [51:09] मजरू मतलब ये अब भी मैं कुछ नाम भूल रहा [51:12] होगा [51:13] शायद वो तो भैया कैसे भूलूंगा कैसी बात कर [51:17] रहे हो [51:19] मरवाएंगे [51:22] तो तो [51:29] ये प्रोज़ में मंटो इस्मत [51:33] मैं उन्हें तरीके पसंद नहीं [51:35] मानता। मैं मुझे दुख है वो बहुत गजब के [51:39] मतलब मैं कौन होता हूं उनके बारे में राय [51:41] रखने वाला लेकिन हम सबके बारे में राय [51:42] रखते हैं तो उनके बारे में रखें। [51:45] है क्या कि वो शुरू बहुत उनकी पहली किताब [51:47] है बांगेदरा बांगेदरा में बिल्कुल ठीक थे [51:50] सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा बहुत [51:53] अच्छी-अच्छी उन्होंने की नया शिवाला [51:56] क्या-क्या सच कह दूं ब्राह्मण अगर तू बुरा [51:59] ना माने और वो पूरा [52:02] उसमें शेख को भी उन्होंने एड्रेस किया और [52:06] ब्राह्मण को भी ये सब उसके बाद उनको पता [52:09] नहीं कुछ गड़बड़ हो गई उनकी वो उनके इन [52:12] ताजा खुदाओं में बड़ा सबसे वतन है। जो [52:15] पैरान इसका है वो मजहब का कफ़न है। तो ठीक [52:19] है भाई आप अपने रास्ते खुश रह। हमारा तो [52:22] वो रास्ता नहीं है। और हम अब पहले पैदा [52:26] हुए थे बड़े आदमी हैं। पाकिस्तान में तो आप [52:29] शायरे कौम कहलाते हैं जो भी है वहां। उनकी [52:32] कब्र पे चारों तरफ चार फौजी खड़े रहते हैं [52:35] सुबह से शाम तक। पता नहीं किसका खतरा है [52:37] उन्हें। तो तो [52:41] लेकिन ये है कि वो मैं जरा एम्बरेस हूं इस [52:43] बात से कि इतना मतलब उनके टैलेंट में कोई [52:46] शक नहीं। फैक्ट ये है कि बहुत सारे तरक्की [52:48] पसंद शायर वुड यूज़ टू प्रज़ हिम ओनली फॉर ह [52:53] क्राफ्ट एंड ह वोकैबलरी एंड ह फ्लो नॉट [52:56] फॉर ह कंटेंट। वो शुरू में था और ठीक है [53:00] ये जो अच्छी वो शायरी थी कि उठो मेरी [53:04] दुनिया के गरीबों को जगा दो का उमरा के [53:08] ताज क्या ताज हिला दो और जिस खेत से दहखा [53:12] को मैसन हो रही उठी उस खेत के हर खुश [53:15] गंदुम को जला दो वगैरह वगैरह तो यहां तक [53:18] तो ठीक बात थी फिर उसके बाद वो पता नहीं [53:21] क्या लिखने लगे कि रहमतें हैं तेरी अयार [53:24] के काशानों पर बर गिरती है तो बेचारे [53:26] मुसलमानों पर तो वो मैंने तो बहुत लोगों [53:30] पे गिरती देखी है तो मैं कैसे मानूं कि [53:32] सिर्फ मुसलमानों पे गिरती है ऐसा नहीं है [53:35] तो वो हमें जरा कुछ कहीं अपील नहीं करती [53:38] बात लेकिन बहरहाल अब ऐसा भी होता है नजर [53:43] का टीका भी चाहिए होता है तो जहां तक इनका [53:48] ताल्लुक है इन शायरों का इन अदीबों का [53:51] मतलब एसएफ जो है स्टूडेंट फेडरेशन 50ज में [53:54] एक सर्वे किया गया सच तो यह है कि जो [53:58] प्रोज़ राइटर है उन्होंने जो असर डाला है [54:02] वो अनबिलीवेबल है अनसंग है टू अ ग्रेट [54:05] एक्सटेंट शायरों को तो हम पढ़ते रहते हैं [54:07] फैज की शायरी सबको याद है साहिर की शायरी [54:10] सबको याद है लेकिन हम ये नहीं जानते कि [54:12] कृष्ण चंद्र ने क्या [54:14] किया इन 50 परहेप्स 55 56 एक उस जमाने में [54:19] कुछ मेरे ख्याल से अराउंड 50 52 [54:22] यूनिवर्सिटीज थी पूरे हिंदुस्तान में तो [54:24] वहां जो स्टूडेंट फेडरेशन के मेंबर्स थे। [54:28] उनको एक सर्वे किया गया उनमें कि भाई आप [54:31] लेफ्टिस्ट क्यों है? [54:33] तो उन्होंने यह नहीं कहा कि हमने [54:34] कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ा है। ना [54:37] उन्होंने यह कहा कि हमने डांस कैपिटल पढ़ा [54:39] है। ना उन्होंने यह कहा कि हमने माओ की [54:43] रेड बुक पढ़ी है। उन्होंने कहा हमने कृष्ण [54:46] चंद्र को पढ़ा है। हम कृष्ण चंद्र को [54:48] पढ़ते हैं इसलिए हम रेप्टिस्ट [54:50] हैं। ये बात बहुत कम लोगों को मालूम है। [54:54] क्या लोगों ने क्या काम किए [54:57] हैं। यह शुरू हुआ था 30 से और समझिए 70 तक [55:01] आते-आते। होता क्या है कि हर चीज [55:04] अल्टीमेटली आदमी [55:08] मूवमेंट [55:10] पार्टी इज वक्त के साथ अपना करकेचर बन [55:14] जाते हैं। और उनके अंदर वही बातें आ जाती [55:18] हैं जिनके खिलाफ वो लड़े थे। कमाल ये है। [55:22] तो यही होता है वो एक वो [55:25] जो सख्ती आ जाती है। और उसमें जो [55:28] एक्सट्रीम एटीट्यूड आ जाता है वो फिर उसको [55:31] तबाह कर देता है। आप तो लड़े थे ना [55:33] एक्सट्रीम एटीट्यूड के खिलाफ उससे ही तो [55:36] आपने बगावत की थी उन्हीं वैल्यू सिस्टम से [55:40] तो आपने रिवोल्ट किया था। अब आपके वैल्यू [55:42] सिस्टम ऐसे हो गए कि जरा सा कोई हिले तो [55:44] आप उसको फांसी पे चढ़ाने को तैयार हो जाए [55:47] तो ये तो ठीक बात नहीं [55:49] है। मतलब फैज ने जो हिंदुस्तान की आजादी [55:54] पे नल्म लिखी थी। हिंदुस्तान की आजादी के [55:58] साथ एक हादसा हुआ था। यह मुल्क के टुकड़े [56:01] हुए थे। हजारों लाखों लोग मरे थे, कत्ल [56:04] हुए थे, बेघर हुए थे। [56:06] तो फैज ने नज़्म लिखी थी यह दाग दाग उजाला [56:10] यह शबदा शहर यह रात की डसी हुई सुबह ये [56:16] उजाला जो दागदाग है जिस पे स्पॉट्स पड़े [56:19] हुए हैं ये शब ये शहर जिसको डसा हुआ है [56:24] रात में ये वो शहर तो नहीं जिसकी आरजू [56:27] लेकर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं ना [56:31] कहीं इस नज्म पे उसको क्रिटिसाइज किया [56:37] कि ये आप क्या बोल रहे हैं कि ठीक नहीं [56:39] है। आजादी परफेक्ट नहीं आई है। मतलब क्या [56:42] है आपका? आप हिंदू राष्ट्र चाहते हैं। ये [56:45] कम्युनिस्ट पार्टी उससे पूछ रही है फैब [56:48] से। वो गम कर रहा है कि मुल्क के टुकड़े [56:51] हो [56:51] गए। तो इस तरह की सख्तियां आई कहीं कहीं [56:56] लोग एक इतनी खूबसूरत नज़्म है फैज की रकीब [57:00] से। इट्स अ ब्रांड न्यू एंगल। [57:04] जो है कि आके वाबस्ता है उस हुस्न की [57:07] यादें तुझसे जिसने इस दिल को परीखाना बना [57:10] रखा था। [57:12] तुझ पे भी उठी है वो खोई हुई जाहिर आंखें [57:16] तूने भी ये मतलब और क्या तुझको मालूम है [57:20] कि उम्र गवा दी हमने क्यों रकीब से मेरा [57:23] रिश्ता क्या है या तो वो जानता है ये मैं [57:25] जानता हूं कि हम किसके दीवाने हैं तो मेरा [57:28] तुम्हारा कुछ कॉमन है ये कितना नया एंगल [57:31] है कि एड्रेसिंग द [57:34] राइवल अब ये भाई नज़्म कंप्लीट हो गई थी [57:37] मगर ये कि कहीं खौफ था सर पे तो तीन चार [57:40] फिर आगे लगा दिए ये और देख बाजार में [57:43] बिकता हुआ मजदूर का गोश्त ये अरे भाई इस [57:45] नज़्म का कोई ताल्लुक नहीं उस बात से तो ये [57:49] सख्तियां कहीं आई जिसके खिलाफ रिवोल्ट भी [57:52] हुआ फिर एक रिवोल्ट जो है वो भी एक एक [57:54] तरफ़ा हो गया जब तक तुम दुनिया की बात [57:57] करोगे समाज की बात करोगे गलत है ये सब [58:02] एक्सटर्नल बातें हैं। ये माइंड की बातें [58:06] हैं। गो इनटू योर ओन वर्ल्ड। अंदर जाओ [58:10] अपने अंदर ढूंढो। मुझे शक है कि किसी ना [58:13] किसी हद तक जो इंपीरियस पावर जो वेस्टर्न [58:17] पार्ट्स काम करती हैं और ये ऐसा कोई [58:20] पैरानोया की बात नहीं है। ये कहीं [58:23] उन्होंने इन चीजों को इनकरेज किया वेस्ट [58:26] में भी और यहां भी कि जहां शायरी पॉलिटिकल [58:29] कॉन्शियसनेस के साथ ना हो। अरे भाई ये तो [58:31] प्रोपेगेंडा है। पॉलिटिकल सोशियो और [58:34] पॉलिटिकल कॉन्शियसनेस से आप शायरी कर रहे [58:35] हैं। तो ये तो माइंड से कर रहे हैं हम। [58:38] आपके अंदर जो इंसान छुपा हुआ है जो आपके [58:41] अंदर है आपकी रूह, आपकी आत्मा, आपका [58:44] सबकॉन्शियस उसमें जाइए और वहां ढूंढिए कौन [58:48] है, क्या है अपनी दुनिया में। तो मतलब यह [58:52] है कि आप दुनिया के काम के नारा है। और [58:54] ऐसी भी बहुत शायरी हुई। बहुत ज्यादा, फिर [58:57] एक वक्त आया के यह हुआ कि भई क्यों? व्हाई [59:00] शुड पोएट्री बी डिपेंडेंट ऑन [59:02] वर्ल्ड? व्हाई कांट वी हैव पोएट्री विदाउट [59:05] वर्ड्स? [59:08] चमक चमकारने शबशीर ने के मजे मोह का मल [59:11] पिंजीर ने के कुछ मतलब नहीं है सिर्फ [59:14] फाउंड है ऐसी लिखी [59:17] गई अंदर से नया हो के निकलता हुआ जैसे साए [59:22] से जुदा हो के वो दालान में आया क्या बोल [59:24] रहे हो भाई एक शेर सुने मैं मजाक कर रहा [59:28] हूं ये सीरियस एक पोएट उस जमाने के पोएट [59:30] का शेर [59:33] है कुत्ते पर खरगोश आया [59:37] तब जाके अहमदाबाद बना। ये शेर [59:41] है। तो ये ये पागलपन भी हुआ कुछ दिनों। [59:45] लेकिन थैंकफुली अल्टीमेटली पेंडुलम बीच [59:48] में आ गया। और आज जो पोएट्री हो रही है [59:51] उसके ऊपर कोई अंकुश नहीं है। लेकिन बहुत [59:54] अच्छी शादी कर रहे हैं लोग। जो यंग जनरेशन [59:57] है उनके मैं शेर सुनता हूं तो मैं बहुत [59:59] एनवी करता हूं। [01:00:01] और ये है कि जहां तक इसका प्रोज़ का [01:00:06] ताल्लुक है मुंशी प्रेमचंद हो ये जिन [01:00:08] लोगों के मैंने नाम लिए इनको आप देखिए एक [01:00:11] और शक्ल है टुवर्ड्स द एंड कितनी देर हो [01:00:14] गई [01:00:21] मतलब मुझे पता नहीं चलना चाहिए मुझे आप [01:00:24] बाद में ना [01:00:25] बताइएगा [01:00:27] तो थैंक यू सो काइंड ऑफ यू [01:00:35] तो जी हां प्रो जो है वो उसका इतना नहीं [01:00:41] किया गया है। दूसरा जो रुख है हिंदुस्तान [01:00:43] की उर्दू पोएट्री के बारे में लोग नहीं [01:00:46] जानते। वो है कि हिंदुस्तान के कई 100 साल [01:00:50] की जो फ्रीडम मूवमेंट [01:00:53] रहा 1857 से और उससे पहले से टिल [01:01:00] 15th ऑफ अगस्त और आफ्टर दैट द आफ्टर मार्च [01:01:03] ऑफ द [01:01:04] पार्टीशन इसके ऊपर उर्दू में क्या पोएट्री [01:01:07] है? [01:01:09] हर जो मूवमेंट आया चाहे वह नॉन कोऑपरेशन [01:01:13] का हो चाहे कोई सा भी हो चाहे सेलर्स की [01:01:18] रिवोल्ट हो चाहे कोई भी चोराचोरी का [01:01:21] किस्सा हो जो भी हो जो भी इतने दिनों में [01:01:25] हिंदुस्तान में अंग्रेज से इंटरेक्ट किया [01:01:30] आजादी के मत वालों ने आजादी की कोशिश करने [01:01:33] वालों में वहां आपको उस सिचुएशन पे उर्दू [01:01:37] क्या पोएट्री मिलती [01:01:41] है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान जब बन गए तो [01:01:45] क्या पोएट्री उर्दू की आपको मिलती है उस [01:01:49] पे। जो उस वक्त लिखी गई और क्या अफसाने [01:01:53] मिलते हैं वो भी है। क्या नवेल्स मिलते [01:01:56] हैं एक गद्दार नाम का एक नवेल है वो हिंदी [01:02:00] में भी अवेलेबल है करण चंद्र का। वो मैंने [01:02:03] छह सात बार पढ़ा। मैं पढ़ ही नहीं सकता [01:02:05] उसे बिना रोए। और मैं आप लोग को बहुत [01:02:07] स्ट्रांगली रिकमेंड करूंगा कि वो नवेल [01:02:09] पढ़िए आप पार्टीशन पे। [01:02:15] गद्दार हिंदुस्तान के जितने डटीज हैं देवी [01:02:19] देवता जितने त्यौहार हैं जितने शहर हैं [01:02:22] जितने मौसम हैं उन पे उर्दू में जो [01:02:25] पोएट्री है कई 100 साल [01:02:29] की वो पोएट्री आप पढ़िए और मैं आपको [01:02:32] बताऊंगा सब आपको मिल जाएगी एक ही [01:02:35] जगह मेरे फादर ने कई बरस लगा के दो [01:02:40] वॉल्यूम एडिट किए थे जिनका नाम है [01:02:42] हिंदुस्तान हमारा और वो यहां राजकमल में [01:02:46] हिंदी में देवनागरी में अवेलेबल [01:02:49] है। किस-किस जमाने की पोएट्री होली पे मैं [01:02:53] दावा करता हूं कि हिंदुस्तान में कितनी [01:02:55] जमाने हैं। उर्दू से बेटर होली पे तो आपको [01:02:58] पोएट्री नहीं मिल सकती। ये मैं गारंटी से [01:03:01] बोलता हूं। जो होली पे नज़्में लिखी गई है। [01:03:04] दिवाली पे, जन्माष्टमी पे। [01:03:10] क्षमावनी एक त्यौहार है जैनों का जो मुझे [01:03:12] उर्दू पोएट्री से मालूम हुआ। मुझे पता ही [01:03:14] नहीं था। क्षमावनी पर लिखी हुई है [01:03:19] पोयम। राम कृष्ण ओ कृष्ण और राधा पे तो [01:03:23] कितनी पोएट्री कोई एंड नहीं है। एंड ही [01:03:25] लेंड हिमसेल्फ टू पोएट्री। तो कितनी शायरी [01:03:28] है और कब की बनारस के घाटों पे जो शायरी [01:03:32] लिखी गई। मतलब आप हैरान होंगे। और दूसरी [01:03:37] तरफ झांसी की रानी पर भी है और टीपू [01:03:40] सुल्तान पर भी है वहां भी ऐसी पोएट्री है [01:03:43] कि आप पढ़े तो रोंगटे खड़े हो जाए और जो [01:03:46] हमारे त्यौहार कल्चर ट्रेडिशन बसंत और जो [01:03:50] जो रस्में हैं उन पे जो शायरी है और वो आज [01:03:54] की लिखी हुई नहीं है। [01:03:57] आई वोंट मिंस माय वर्ड। आज तो हो सकता है [01:03:59] पॉलिटिकल कंसीडरेशन से [01:04:02] और एक्सपीडेंसी से आदमी ऐसी बात [01:04:06] लिखते। 300 बरस [01:04:09] पहले और उसका मुझे क्या फायदा हुआ? एक [01:04:12] पिक्चर बन रही थी युगानंद नाम था [01:04:14] उसका। [01:04:16] तो लक्ष्मीकांत प्यारेलाल म्यूजिक [01:04:19] डायरेक्टर थे उसके और एन चंद्रा एक [01:04:23] प्रोड्यूसर डायरेक्टर। बड़े कामयाब अपने [01:04:24] वक्त के वो उसके डायरेक्टर थे। तो दो-तीन [01:04:28] गाने हो चुके थे। तो फिर हमारी एक सिंग [01:04:31] थी। मैं गया तो एन चंद्रा और लक्ष्मीकांत [01:04:33] बैठे थे तो थोड़े से ऑकवर्ड थे। हां जी [01:04:37] बताइए क्या सिचुएशन है? तो उन्हें बताना [01:04:41] चाहिए कि भाई सिचुएशन क्या है? नहीं असल [01:04:43] में क्या था कि ऐसा सोच रहे थे हम लोग कि [01:04:46] मतलब यहां पर अगर एक वो आ जाता तो क्या आ [01:04:50] जाता? क्या सोच रहे थे? नहीं नहीं मतलब [01:04:52] ऐसा आईडिया आया था कि बहुत ही हां हूं [01:04:57] नहीं करके अल्टीमेटली उन्होंने बताया कि [01:04:59] हम सोच रहे हैं कि यहां एक कृष्ण की आरती [01:05:01] रखते [01:05:02] हैं। तो उन्होंने कहा कितना भी हो यह [01:05:05] काफिर मुझे यथ है तो मुसलमान नाम तो जावेद [01:05:10] अख्तरी है ना तो मैंने कहा अच्छा सुनाइए [01:05:14] क्या ट्यून है कोई तो उन्होंने मुझे ट्यून [01:05:17] दी और बहुत ही मतलब चलो अब ये रस्म अदा कर [01:05:21] देते हैं दे देते हैं इन्हें जब नहीं लिख [01:05:23] पाएंगे तो हम कहेंगे हम किसी से लिखा लेते [01:05:25] हैं ना तो मैंने कहा ठीक है दो दिन बाद [01:05:28] मिलते हैं मैं दो दिन बाद गया फिर दोनों [01:05:31] बैठे थे तो मैंने कहा मैंने मैंने वो लिख [01:05:34] लिया है। लेकिन आपने मुझे जो ट्यून दी थी [01:05:36] वो आरती की नहीं थी। वो एक गाने की ट्यून [01:05:39] थी। आरती में एक क्रिसेंडो होता है। आपने [01:05:43] क्रिसेंडो मुझे दिए ही नहीं। वो तो दो तीन [01:05:46] अंतरे खत्म। एक क्रिसेंडो चाहिए जहां पर [01:05:49] वो ऊपर जाए। वो कहां है? हर आरती टेमो [01:05:54] इनक्रीस होता है उसका। वो है ही नहीं [01:05:56] उसमें। वो मैंने अपनी तरफ से लिख दिया है। [01:05:58] आप उसे कंपोज कर लीजिए। कली जी बहुत अच्छा [01:06:02] क्या लिखा आपने मैंने कहा मैंने कुछ भी [01:06:04] नहीं लिखा मैंने तो सिर्फ नाम जमा कर दिए [01:06:07] उसमें सिर्फ कृष्ण के नाम है अपनी तरफ से [01:06:09] कुछ नहीं है तो कह [01:06:12] सुनाइए तो मैंने उन्हें सुनाया आपको भी [01:06:14] सुना देता [01:06:16] हूं वो कृष्ण कन्हैया मुरलीधर मनमोहन कान [01:06:20] मुरारी है गोपाल मनोहर दुख भंजन गोपाल [01:06:24] मनोहर दुख भंजन दुख [01:06:28] भंजन एक बार अब अटल बनवारी है वो कुंज [01:06:32] फिरैया सांवरिया नंदलाला कान मुरारी है बन [01:06:35] कुंज फिरैया [01:06:37] सांवरिया नंदलाला कान मुरारी है वो वो कंस [01:06:41] विनाशक महारथी सुदर्शन चक्रधारी है हर रूप [01:06:45] निराला है उसका हर उसकी लारी है वो [01:06:48] गोपीनाथ मदन मोहन वो श्याम पीतांबर आएगा [01:06:52] आएगा जो अंध आएगा आएगा जो अंदर आएगा तू तो [01:06:56] बड़े परेशान हुए कहने आप इतने नाम तो हमें [01:07:00] नहीं पता है तो आपको कैसे पता है? मैंने [01:07:04] कहा दो ही वजह हैं। एक मैं लखनऊ का हूं [01:07:06] जहां सबसे ज्यादा महिमा कृष्ण की है और [01:07:09] दूसरे ये कि मुझे उर्दू आती है। शुक्रिया। [01:07:13] [प्रशंसा] [01:07:21] चलिए थैंक यू। [01:07:29] वंडरफुल एस यू वांटेड टू टेक अ फ्यू [01:07:31] क्वेश्चन लाइक टू देयर एंड वी कैन नहीं [01:07:35] नहीं देखिए खड़े रहने में क्या होता है [01:07:36] भागना आसान रहता है तो अगर कभी बुरा वक्त [01:07:39] आ जाए आप यहीं से करिए बोलिए कुड आई हैव [01:07:43] सम वाटर हां जी [01:07:48] वन सेकंड वन सेकंड प्लीज प्लीज देखिए यहां [01:07:51] सब किशोर जी की इजाजत से होगा आप पहले [01:07:54] उनसे पूछ [01:07:55] मैं आपको सिर्फ दो तीन चीज़ याद दिलाना [01:07:58] चाहूंगा [01:08:02] जी खून जग में डुबोली नहीं खूने दिल में [01:08:06] खू दिल में डुबोली है उंगलियां मैंने और [01:08:08] जुबान पे मोहर लगी है तो क्या कि रख दी है [01:08:11] हर एक खलके जंजीर में जुबां मैंने बिल्कुल [01:08:14] एक तो ये है एक वो उनका प्रजन का जो वो था [01:08:18] रोशन ना उससे उन्होंने दो लिखी है एक तो [01:08:22] शाम के पेचो खम सितारों जीना जीना उतर रही [01:08:25] है रात यूं सभा पास से बह जाती है जैसे कह [01:08:29] दी किसी ने प्यार की [01:08:31] बात अच्छी बात मुझे आधा थैंक यू सो मच [01:08:36] थैंक यू नहीं नहीं कोई बात नहीं कैन आई [01:08:39] जस्ट टेक अ मोमेंट टू से दैट वी डू वांट [01:08:41] टू थैंक जावेद साहब वेरी मच फॉर दैट रियली [01:08:44] एंटलाइटनिंग लेक्चर एंड समथिंग सो अ बिग [01:08:48] राउंड ऑफ़ अप्लॉज़ [01:08:56] आई वुड आल्सो लाइक जावेद साहब जस्ट अ मिनट [01:08:59] टू आस्क माय ब्रदर दीपक रोशा टू कम ऑन [01:09:02] स्टेज एंड ही कैन कंडक्ट द नेक्स्ट राउंड [01:09:05] ऑफ़ टू ऑर थ्री क्वेश्चन्स ओनली प्लीज एंड [01:09:08] वी वुड लाइक यू टू जस्ट रिमेन विथ इन द [01:09:11] टॉपिक दैट जावेद साहब हेज़ जस्ट अह स्पोकन [01:09:14] अबाउट एंड आफ्टर अह [01:09:17] हां दीपक यू कैन टेक दिस अह द [01:09:20] माइक्रोफोन ओके। ओके। ah एंड सो इफ देयर [01:09:24] आर एनीबडी देयर इज़ एनीबडी विथ अ क्वेश्चन [01:09:26] इफ यू कैन जस्ट रेज़ योर हैंड प्लीज देन वी [01:09:28] कैन हैव जस्ट अ मिनट। द माइक्रोफोन विल कम [01:09:31] टू यू एंड दीपक यू कैन कंडक्ट दिस एंड [01:09:33] आल्सो गिव द थैंक्स गिविंग। थैंक यू। सो [01:09:37] एनी क्वेश्चन्स? एनीबडी? यस, द लेडी देर [01:09:40] प्लीज। [01:09:43] जी, उर्दू के पॉपुलर के लिए तवाइफ़ों का [01:09:46] क्या रोल रहा? [01:09:48] उर्दू को पॉपुलराइज करने में तवाइफों का [01:09:51] क्या कोई रोल रहा? [01:09:55] पॉपुलर तवाइफों का [01:09:57] रहा। तो सबका नहीं जो पॉपुलर थी। देखिए [01:10:01] क्या है कि जो पोएट्री गाई जाएगी और उस [01:10:04] जमाने में तो औरतों में तो सिर्फ तवाइफें [01:10:07] ही गा सकती थी। न जाने कितनी अच्छी [01:10:09] सिंगर्स होंगी जिनका गला घरों में घोट [01:10:12] दिया गया। तो कम से कम तवाइफ के पास ये [01:10:15] राइट तो था कि वो गा सकती थी। तो जब वो [01:10:17] गाएगी तो अच्छी शायरी ही गाएगी तो कोई [01:10:19] हैरत की बात नहीं कि वो उर्दी गज़ें गाती [01:10:21] थी और यकीनन जब गा के कोई सुनाता है चाहे [01:10:25] वो मेदी हसन हो और वो चाहे जगजीत सिंह हो [01:10:28] तो गज़ल बहुत दूर तक पहुंचती है। वन लास्ट [01:10:31] क्वेश्चन फ्रॉम जेंटलमैन देयर सर उर्दू के [01:10:36] जेनिस्ट के बारे में आपने दिल्ली की [01:10:38] थ्योरी जो है उसको नजरअंदाज कर दिया कि ये [01:10:41] उर्दू जो है वो जो टर्किश सिपाही आते थे [01:10:44] उनके कैंप्स होते थे। और उर्दू बाजार के [01:10:47] अंदर इस जो दिल्ली में उर्दू बाजार है [01:10:50] वहां पर जो कैंप्स की लैंग्वेज थी वो [01:10:52] उर्दू के जेनेसिस में थी। तो इस पर आपकी [01:10:55] कोई राय और दूसरा हसरत मोहानी साहब का जो [01:10:58] कंट्रीब्यूशन था हिंदुस्तान में इंकलाब [01:11:00] लाने के बारे में। बहुत सही। इंकलाब [01:11:02] जिंदाबाद तो नारा ही हसरत मोहानी का बनाया [01:11:05] हुआ है। और आपको एक और बताऊं उर्दू की एक [01:11:07] और भी डिस्टिंशन है। हिंदुस्तान में जो [01:11:10] पहला शायर अपनी शायरी की वजह से फांसी पे [01:11:12] चढ़ा है। वो इसी शहर दिल्ली में था। ये [01:11:15] जमाने में एक फर्रुख सियर नाम का बादशाह [01:11:17] था यहां जिसके जमाने में एक शायर था जाफर [01:11:21] जटली जो कि उस बादशाह के खिलाफ और उसकी [01:11:26] पॉलिसीज के खिलाफ और जिस तरह से वो [01:11:28] एक्सप्लइट कर रहा था लोगों को उसके खिलाफ [01:11:30] पोएट्री करता था एंड अल्टीमेटली ही वाज़ [01:11:32] कॉट एंड ही वाज़ हैंड। [01:11:35] हमारे दूसरे भी जो शायर हैं वो फैज हो, [01:11:38] सरदार जाफरी हो, मजरू हो, कैफी हो सब जेल [01:11:41] गए हुए हैं। यह अंग्रेज के जेल गए हैं। तो [01:11:46] ये जो रेवोलशनरी फरवर था वो उर्दू पोएट्री [01:11:49] में हर दौर में रहा है। [01:11:52] लेकिन उर्दू जैसे वर्ल्ड जो है इट इज़ अ [01:11:55] टर्किश [01:11:56] वर्ल्ड। जिसका मतलब है कंटोनमेंट एरिया। [01:11:59] नाउ कंटोनमेंट एरिया को आज हम समझते हैं [01:12:01] कि जहां सिर्फ सिपाही रहते हैं। दरअसल [01:12:04] जिसे आज आप सिविल लाइंस कहते हैं उस वक्त [01:12:06] तो कोई सिविल लाइंस का कांसेप्ट नहीं था। [01:12:08] तो वो सब सिविल लाइन का हिस्सा है। इट वाज़ [01:12:12] बाय एंड लार्ज एन अर्बन लैंग्वेज एन अर्बन [01:12:16] फिनोमना। तो उसका नाम तरहतरह के नाम पड़े [01:12:20] जैसे के हिंदवी फिर [01:12:23] ये ज़बाने उर्दू है मोहल्ला तो वो वो तो [01:12:29] जुबान और मोहल्ला तो गिर गए उर्दू बची तो [01:12:33] ये इस तरह से है [01:12:35] लेकिन सिपाही जो है [01:12:39] वो लिटरेचर नहीं बना [01:12:41] देते वो इतना सिंपल नहीं होता वो जब [01:12:45] सोसाइटी में चली जाती जाती है। जब मिडिल [01:12:48] क्लास के पास जाती है, जब यह सेंसिटिव [01:12:50] लोगों के पास जाती है तबान तब लिटरेचर [01:12:52] क्रिएट होता है। [01:12:55] सिपाही और तवा से जी सिपाही और तवा से [01:13:00] मिलके आपकी राय है मेरी नहीं [01:13:03] है। आजकल भी सिपाही तवाइयफों से बहुत [01:13:06] मिलते हैं। तो शैल वी एक्सपेक्ट अनदर [01:13:09] लैंग्वेज? [01:13:14] वेल, आई एम सॉरी। आई डोंट थिंक बिकॉज़ ऑफ़ [01:13:16] शॉर्टेज ऑफ़ टाइम वी कैन टेक मोर [01:13:18] क्वेश्चंस। [01:13:21] ओके वन लास्ट वन द यंग जेंटलमैन देयर। [01:13:27] आई होप यू हैव टू टर्ड सर। नहीं नहीं मगर [01:13:29] मैं आपको एक बात बताना चाहूंगा। आप देखिए [01:13:32] इसको [01:13:33] बरसों स्टेट पे ट्रेन नहीं मिली है। ये [01:13:37] जवान जिंदा क्यों है? यह सिपाहियों की वजह [01:13:39] से जिंदा है। या तवाों की वजह से? यह जबान [01:13:42] इसलिए जिंदा है कि आप यहां बैठे हुए [01:13:48] हैं। आपको उससे दिलचस्पी है। और अगर शेर [01:13:52] आपको कोई भी याद होगा तो उर्दू ही का याद [01:13:55] होगा। [01:13:56] है कि नहीं? [01:13:59] देयर इज़ अ यंग जेंटलमैन देयर हो। लाइक टू [01:14:01] आस्क यू सर। सर थैंक यू फॉर द लेक्चर। सर [01:14:04] इट वास रियली फुल ऑफ़ अवेकनिंग। अह सर, जो [01:14:08] एक 20 से 50ज़ में जो एक सरियलिज्म का जो [01:14:12] मूवमेंट था उसका इफेक्ट उर्दू पर क्या था? [01:14:17] जो वर्ल्ड वॉर के टाइम पे सरियलिज्म बहुत [01:14:21] ज्यादा नहीं मैं आपसे अर्ज किया लेकिन [01:14:23] उसमें क्या होता है? एव्री फैशन बिकम्स [01:14:24] इट्स ओन कार्टून। तो भाई सेलिज्म ठीक है। [01:14:27] सिंबॉलिज्म भी ठीक है। एब्स्ट्रैक्शन भी [01:14:30] ठीक है। लेकिन उसमें क्या होता है? लोग हद [01:14:33] से आगे गुजर जाते हैं। और यह इल्जाम मैं [01:14:35] सिर्फ इन पे ही नहीं लगा रहा। मैंने तो [01:14:36] प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट पे भी लगाया [01:14:38] है। यही इल्जाम हद से मत आगे बैलेंस तो [01:14:41] रखो। अब मिसाल के तौर पे एक किस्सा सुनाता [01:14:43] हूं आपको और ये सच्चा इंसिडेंट है। एक [01:14:45] छोटी सी लिटरेरी कॉन्फ्रेंस थी। [01:14:48] कॉन्फ्रेंस क्या मीटिंग थी वो 50-60 आदमी [01:14:51] थे उसमें। तो उसमें एक जो सरल आप पोएट बोल [01:14:55] रहे हैं ना सर स्टिक वो खड़े हुए और [01:14:57] उन्होंने एक नज़्म सुनाई कि जिसका सेंस कुछ [01:14:59] ऐसा था कि मेरे घर के आंगन में एक अलगनी [01:15:03] है उस एलगनी पे कल मैंने एक सफेद चादर [01:15:05] टांगी थी सूखने के लिए लेकिन एक कौवा आया [01:15:08] उस पे बैठा उस पे बीट करके उड़ गया। बस ये [01:15:11] उनकी पोएम थी। तो फैज साहब इत्तेफाक से [01:15:14] उसे प्रिसाइड कर रहे जब वो माइक से हटने [01:15:17] लगे पोएट तो फैज साहब ने रोक लिया उन्हें [01:15:19] और कहा कि देखिए मैं अपनी जिहालत मानने को [01:15:22] तैयार हूं। इस नज़्म की सिंबॉलिज्म मैं [01:15:24] नहीं समझा हूं तो मैं चाहूंगा कि शायर [01:15:26] थोड़ा एक्सप्लेन कर दे। तो इससे पहले अगर [01:15:29] शायर कुछ बोलता ऑडियंस में से एक आदमी [01:15:32] खड़ा हो गया। और कहने लगा कि साहब सिंपल [01:15:35] सी नज़ आपकी समझ में क्यों नहीं आई? मुझे [01:15:38] कल ही इन शायर ने मेरे दोस्त हैं ये। [01:15:40] इन्होंने मुझे इस पोयम के मीनिंग बताए [01:15:43] हैं। तो शायर ने कहा बैठ जाइए। मैंने [01:15:45] मीनिंग चेंज कर [01:15:53] दिए। सो अह जावेद साहब, लेडीज एंड [01:15:58] जेंटलमैन, आई एम स्टैंडिंग बिफोर यू विथ [01:16:01] लॉट ऑफ विंग्स फीलिंग्स। वन ऑन द वन साइड [01:16:04] इज़ जावेद साहब, हु हैज़ डिलीवर सच अ [01:16:06] डिलाइटफुल टॉक एंड सच सो विथ सो मच [01:16:09] एलेक्वेंस। एंड ही हैज़ लेफ्ट अस स्पेल [01:16:12] बाउंड एंड इनथ्रोल्ड। एंड ऑन दी अदर साइड, [01:16:15] आई एम रिमेंबरिंग माय फादर हु लिव्ड ऑन [01:16:18] दिस प्लेनेट फॉर 100 इयर्स। जावेद साहब, [01:16:21] इफ ही हैड एवर मेट यू, ही वुड हैव बीन [01:16:24] रियली हैप्पी टू कन्वर्स फॉर आवर्स विथ यू [01:16:26] ऑन द नोसेस ऑफ़ सम गजल्स एंड ऑन सम शेयर्स [01:16:30] बट इट वास नॉट टू बी। लेडीज एंड जेंटलमैन, [01:16:34] अमंग यू आई सी मेनी फ्रेंड्स, फैमिली एंड [01:16:37] फ्रेंड्स ऑफ माय फादर आल्सो। एंड टू ऑल ऑफ [01:16:40] यू आई थैंक यू वि ऑल आवर हार्ट फ्रॉम माय [01:16:43] मदर साइड आल्सो जावेद साहब हमारे पास मां [01:16:46] भी है। जी जी [01:16:49] सो आई थैंक यू ऑल फॉर कमिंग हियर [01:16:53] एंड गिविंग अस सच अ मेमोरेबल टाइम एंड [01:16:57] जावेद साहब वंस मोर थैंक यू [01:17:00] [प्रशंसा]